यमुनानगर शहर

Yamunanagar City

हरियाणा राज्य के उत्तर-पूर्व मे स्थित यमुनानगर जिला हरियाणा का एक सीमावर्ती जिला है। यमुनानगर को मध्यकाल में ‘अब्दुल्लापुर मण्डी’ के रूप में जाना जाता था। महाभारतकाल में जगाधरी को ‘योगेन्द्र’ या ‘योगेन्द्री’ कहा जाता था। जगाधरी कस्बा यमुनानगर जिला मुख्यालय से सटा हुआ है। इसलिए इसे ‘जगाधरी-यमुनानगर’ (Jagadhri-Yamunanagar) भी कहा जाता है।

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यमुनानगर जिले की स्थापना एवं परिचय (Establishment and introduction of Yamunanagar district)

 1 नवम्बर, 1989 को अंबाला जिले के जगाधरी क्षेत्र को काटकर एक नया जिला बनाया गया। इस प्रकार 1 नवम्बर, 1989 को अंबाला जिले के विभाजन के उपरान्त, यमुनानगर जिला हरियाणा के 16वें जिले के रूप में अस्तित्व में आया (Yamunanagar district came into existence as the 16th district of Haryana)। इसी दिन रेवाड़ी, पानीपत और कैथल जिले भी अस्तित्व में आए थे। 1,756 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में विस्तृत यमुनानगर जिले के उत्तर दिशा में हिमाचल प्रदेश, पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण में करनाल, दक्षिण-पश्चिम में कुरूक्षेत्र, पश्चिम तथा उत्तर-पश्चिम में अम्बाला जिले की सीमाएँ लगती हैं। 2 जिले का प्रशासनिक परिदृश्य यमुनानगर जिला प्रशासनिक दृष्टि से अंबाला मंडल का भाग है। पुलिस प्रशासन की दृष्टि से यह जिला अंबाला पुलिस रेंज के अन्तर्गत आता है। यमुनानगर जिले का जिला मुख्यालय यमुनानगर में है।

यमुनानगर जिले में तीन उपमण्डल-जगाधरी, बिलासपुर तथा रादौर हैं। रादौर को 2016 में उपमण्डल का दर्जा दिया गया है। यमुनानगर जिले में चार तहसील, 3 उप-तहसील तथा 7 विकास खण्ड हैं। खिजराबाद को वर्ष 2016 में खण्ड तथा उपतहसील का दर्जा दिया गया। संसदीय लोकतंत्र की दृष्टि से यह जिला अंबाला लोकसभा क्षेत्र का भाग है। जिले में चार (04) विध नसभा क्षेत्र-यमुनानगर, जगाधरी, रादौर तथा सढौरा (सुरक्षित) हैं। यमुनानगर जिले में प्रदेश में सर्वाधिक 655 गांव हैं जिनमें 473 ग्राम पंचायत हैं। स्थानीय प्रशासन की दृष्टि से जिले में 7 पंचायत समिति तथा 18 जिला परिषद् वार्ड हैं। यमुनानगर तथा जगाधरी शहरों के विकास के लिए ‘यमुनानगर नगर निगम’ बनाया गया है।

यमुनानगर जिले का ऐतिहासिक परिदृश्य (Historical landscape of Yamunanagar district)

शिवालिक की गोद में बसा यमुनानगर जिला एक ऐतिहासिक क्षेत्र है। यमुनानगर से सटे जगाधरी कस्बे का जिक्र महाभारत काल में मिलता है। महाभारत काल में जगाधरी को ‘योगेन्द्र’ या ‘योगेन्द्री’ कहा गया है। जिले के जगाधरी, सुघ, यमुनानगर आदि स्थानों से महत्वपूर्ण सामग्री प्राप्त

यमुनानगर जिले के तोपड़ा से सम्राट अशोक का एक स्तंभ अभिलेख प्राप्त हुआ है। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि तथा प्राकृत भाषा में लिखा हुआ है। इस अभिलेख से सिद्ध होता है कि यमुनानगर का क्षेत्र प्राचीनकाल में मौर्य साम्राज्य का भाग था। इस स्तंभ को फिरोजशाह तुगलक ने 1356 ई. में तोपड़ा से उखड़वा कर दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में गड़वा दिया। यमुनानगर जिले के सुघ से एक अन्य प्राचीन अभिलेख मिला है। यहां पर मिट्टी की एक छोटी सी मूर्ति में एक छोटे बच्चे को तख्ती पर स्वर एवं व्यंजन अक्षरों का लेखन करता हुआ दिखाया गया है। प्रसिद्ध इतिहासकार डा. के.सी. यादव के अनुसार दूसरी शताब्दी इस्वी पूर्व का यह अभिलेख समस्त भारत में बारहखड़ी की लिखाई का सबसे प्राचीन अभिलेख है।

यमुनानगर जिले के जगाधरी, बुड़िया तथा सुघ से भारी मात्रा में कुणिंद गण के सिक्के प्राप्त हुए हैं। इन सिक्कों से प्रमाणित होता है कि गुप्त साम्राज्य के पतन के उपरान्त यह क्षेत्र कुणिंद साम्राज्य के अधिकार में भी रहा था। सिक्कों के अलावा सुघ के क्षेत्र से शुंगकालीन मूर्तिया प्राप्त हुई हैं। इन ऐतिहासिक साक्ष्यों से यमुनानगर जिले के ऐतिहासिक महत्व का पता चलता है।

इस क्षेत्र में 7वीं सदी तक बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था। तोपड़ा तथा सुध का क्षेत्र पूरे देश में प्रसिद्ध बौद्ध केन्द्र था। बौद्ध साहित्य के अनुसार महात्मा बुद्ध ने सुघ की यात्रा की थी तथा यहां पर प्रवचन दिए थे। 7वीं सदी तक इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव रहा। 605 ई. में वर्धन वंश के शासक हर्षवर्धन के समय यह क्षेत्र अपने वैभव के चरम पर था। जगाधरी के क्षेत्र से प्राप्त दिल्ली के तोमर तथा चौहान शासकों के सिक्के सिद्ध करते हैं कि 11वीं सदी में यह क्षेत्र तोमर शासकों के अधीन था।

1192 ई. में तराईन (तरावड़ी) के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी के हाथों पृथ्वीराज चौहान की हार के उपरान्त भारत की गुलामी का दौर आरंभ हो गया। शेष हरियाणा की तरह यमुनानगर का क्षेत्र भी दिल्ली सल्तनत के अधीन आ गया।

21 अप्रैल, 1526 को पानीपत के प्रथम युद्ध में जहीरूद्दीन बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली सल्तनत का अंत करके भारत में मुगल वंश के शासन की नींव रखी। धीरे-धीरे करके उसने पूरे हरियाणा को अपने अधिकार में ले लिया। 1540 ई. में हुमायुं को हराकर शेरशाह सूरी गद्दी पर बैठा। उसके शासनकाल में हरियाणा का क्षेत्र चार ‘सरकारों’-दिल्ली, मेवात, हिसार तथा सरहिन्द में विभाजित था। मध्यकाल में “सरकार’ आधुनिक जिले जैसी इकाई होती थी। अंबाला, यमुनानगर तथा थानेसर का क्षेत्र सरहिन्द की सरकार के अधीन आता था।

1556 ई. में पानीपत की दूसरी लड़ाई के बाद दिल्ली का सिंहासन अकबर को मिल गया। उसने हरियाणा प्रदेश की प्रशासकीय व्यवस्था | में गहरी दिलचस्पी ली। उसकी यह व्यवस्था काफी हद तक शेरशाह की व्यवस्था से मिलती-जुलती थी। उसने अपने साम्राज्य को सूबों में बांटा | हुआ था। 1602 ई. में उसके राज्य में 15 सूबे थे। हरियाणा का अधिकतर क्षेत्र (महेन्द्रगढ़, नारनौल तथा मेवात को छोड़कर) दिल्ली सूबे के

अन्तर्गत आता था। उस समय खिजराबाद, साढौरा तथा मुस्तफाबाद के परगने दिल्ली सबे की सरहिन्द सरकार के अधीन थे। अकबर के शासनकाल में इस क्षेत्र में पूर्ण शांति बनी रही। मुगल वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक औरंगजेब था। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के उपरान्त मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया। उसके उत्तराधिकारी नकारा सिद्ध हुए। फलस्वरूप, हरियाणा में बल्लभगढ़, रेवाड़ी, फर्रुखनगर, कुजपुरा आदि अनेक रियासतें स्वतंत्र हो गई।

गुरू गोबिन्द सिंह से प्रेरणा पाकर बाबा बन्दा बहादुर ने मुगलों को चुनौती दी। उन्होंने सोनीपत के निकट सेहरी खाण्डा को अपना मुख्यालय बनाया तथा कैथल, थानेसर, कुंजपुरा, शाहबाद आदि स्थानों पर मुगल सेनाओं को टक्कर दी। 22 मई, 1710 को बन्दा बहादुर ने सरहिंद पर | हमला किया तथा यहां के फौजदार वजीरखां को मार डाला। बंदा बहादुर की चुनौती से निपटने के लिए बादशाह बहादुरशाह ने फिरोज खां मेवाती की सहायता से करनाल और इंद्री के बीच बन्दा बहादुर से युद्ध किया। इस युद्ध में बन्दा बहादुर की करारी हार हुई। चौतरफा चुनौतियों

के बीच बन्दा बहादुर ने यमुनानगर के सढ़ौरा नामक कस्बे को अपना मुख्यालय बना लिया। फर्रुखसियर ने गद्दी पर बैठते ही बन्दा बहादुर को | सबक सिखाने के लिए शाही सेना भेजी। शाही सेना के आगमन की सूचना पाकर बन्दा बहादुर सढ़ौरा से 17 कि.मी. दूर लोहगढ़ के किले में आ गया।

बन्दा बहादुर बड़ी बहादुरी से लड़े परन्तु, अक्तूबर 1713 में उन्हें लोहगढ़ का किला छोड़ना पड़ा। कुछ समय पश्चात् बादशाह फर्रुखसियर ने बन्दा बहादुर को गिरफ्तार करके उनकी हत्या करवा दी।

14 जनवरी, 1761 को पानीपत की तीसरी लड़ाई में हार के उपरान्त मराठा सेनाओं की कमर टूट गई। परन्तु, अब्दाली भी इस विजय का लाभ नहीं ले पाया। उसे वापिस लौटना पड़ा। हरियाणा से मराठों के पतन तथा अब्दाली की वापसी के उपरान्त उत्तरी हरियाणा तथा सरहिंद के क्षेत्र में सिख एक बड़ी शक्ति बनकर उभरे। जनवरी 1764 में सिख सेनाओं ने सरहिंद के गवर्नर जैन खां की हत्या करके हरियाणा तथा पंजाब के एक बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया। यमुनानगर जिले का क्षेत्र भी इसमें सम्मिलित था। सरदार देसूसिंह अहलूवालिया ने मुस्तफाबाद तथा अरनोली के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। रामसिंह भंगी के पुत्रों ने बूड़िया, जगाधरी, दामला के 204 गांवों पर कब्जा कर लिया। 1780-81 में बादशाह शाहआलम के प्रधानमंत्री मिर्जा नज़फ खां ने सिखों को नियंत्रित करने का प्रयास किया। परन्तु वह असफल रहा। अंत में मजबूर होकर उसे सिखों से संधि करनी पड़ी। इस संधि के अनुसार मिर्जा नज़फ ने सिखों को अंबाला (जिसमें यमुनानगर का क्षेत्र भी सम्मिलित था), कुरुक्षेत्र और करनाल जिलों का स्वामी मान लिया।

1782 ई. में मिर्जा नज़फ खां की मृत्यु के बाद बादशाह शाह आलम का सिंहासन पुनः डोलने लगा। मजबूर शाह आलम को अपना सिंहासन बचाने के लिए पुनः महादजी सिंधिया की सहायता लेनी पड़ी। महादजी सिंधिया ने सन् 1789 के अंत में सिख सरदारों पर हमला करने के लिए अंबाजी इंग्ले के नेतृत्व में सेनाएँ भेजी। कई महीने तक चले युद्ध में सिखों ने बड़ी वीरता से मराठा सेनाओं का मुकाबला किया। अतंत: दोनो पक्षों को संधि करनी पड़ी। मराठों ने पंचकूला, अंबाला, थानेसर, कैथल तथा जींद के क्षेत्र पर सिखों के अधिकार को मान्यता दे दी। इस संधि के अनुसार यमुनानगर का क्षेत्र सिखों के अधिकार में बना रहा।

दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के उपरान्त 30 दिसंबर, 1803 को मराठा सरदार दौलतराव सिंधिया और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सर्जी अंजनगांव की संधि हुई। इस संधि के अनुसार हरियाणा के क्षेत्र पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। मराठों ने बेशक ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि कर ली थी परन्तु उत्तरी हरियाणा के सिख शासको ने अंग्रेजों के सामने समर्पण नहीं किया। सिख शासकों ने लाड़वा के शासक गुरूदत्त सिंह तथा थानेसर के शासक भंगासिंह के नेतृत्व में एक शक्तिशाली संघ बनाकर अंग्रेजों का प्रबल विरोध किया। अंग्रेजी कमांडर कर्नल बर्न के नेतृत्व में अंग्रेजी सेनाओं से सिख संघ के संघर्ष में बुड़िया के शासक शेरसिंह ने कई सिख योद्धाओं के साथ शहादत दी। लाडवा के शासक गुरूदत्तसिंह अंत तक अंग्रेजों से संघर्ष करते रहे। 20 अप्रैल, 1805 को करनाल में कर्नल बर्न की सेनाओं के साथ उनकी अन्तिम मुठभेड़ हुई। इसमें गुरूदत्त सिंह को हार का सामना करना पड़ा। अंग्रेजों ने गुरूदत्तसिंह के साथ विनम्र व्यवहार किया। करनाल के परगने को छोड़कर संपूर्ण लाडवा का क्षेत्र उसे वापिस मिल गया।

समय के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी की भूख बढ़ती गई। 1818 ई. में रानी रामकौर की अयोग्यता का बहाना बनाकर अंग्रेजों ने छछरौली की रियासत पर कब्जा कर लिया। 1828 ई. में रादौर के शासक दुलचासिंह की विधवा सरदारनी इंदकौर की मृत्यु के उपरान्त अंग्रेजों ने रादौर को भी हथिया लिया। इस प्रकार धीरे-धीरे यमुनानगर के संपूर्ण क्षेत्र पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया।

अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति, आर्थिक दोहन, सामाजिक तथा धार्मिक हस्तक्षेप से क्षुब्ध जनता ने 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी के कुशासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। वर्तमान यमुनानगर जिले का क्षेत्र उस समय अंबाला जिले का भाग था। अंबाला के क्षेत्र में क्रान्ति की ज्वाला प्रबल थी। सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति का झंडा बुलंद किया। अंबाला जिले में लगभग 200 लोगों ने शहादत दी। क्रान्ति असफल हो गई परन्तु अत्याचार सहकर भी जनता के हौसले पस्त नहीं हुए। क्रान्ति के बाद उत्तर-पश्चिमी प्रदेश से हरियाणा का क्षेत्र पृथक करके पंजाब में विलय कर दिया गया। इस नई प्रशासकीय व्यवस्था में भी यमुनानगर जिले का क्षेत्र अंबाला जिले का भाग बना रहा। 1966 में हरियाणा गठन के समय भी अंबाला जिले का दर्जा बरकरार रहा। 1 नवंबर, 1989 को रेवाड़ी, पानीपत और कैथल जिलों के साथ-साथ यमुनानगर भी जिला बना। अंबाला जिले के जगाधरी उपमण्डल का क्षेत्र वर्तमान में यमुनानगर जिले के रूप में जाना जाता है।

यमुनानगर जिले के कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कस्बे (Some important historical towns of Yamunanagar district):

  • बूड़िया
  • बिलासपुर

बूड़िया (Boodiya)

इस ऐतिहासिक कस्बे को ऐतिहासिक साहित्य में सूप, संकू तथा सरधना के नाम से जाना जाता था। मुगलकाल में हुमायुं ने इस कस्बे का पुननिर्माण करवाया था। 1764 ई. में सिख नेताओं ने सरहिंद के अफगान गर्वनर जैन खां की हत्या करके सरहिन्द के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। बूड़िया तथा जगाधरी के क्षेत्र पर रामसिंह भंगी के पुत्रों ने अधिकार जमा लिया। बाद में यह रियासत-बूड़िया तथा दामला, दो भागें में बंट गई। बूड़िया में एतिहासिक पातालेश्वर महादेव मन्दिर है। इस मन्दिर को महाभारतकालीन बताया जाता है। बूड़िया में बौद्ध धर्म का एक बहुत बड़ा प्रचार केन्द्र भी होता था। यहां पर अकबर के ‘नवरत्नों’ में से एक बीरबल ने ‘रंगमहल’ का निर्माण करवाया था। ‘ सढ़ौरा: अंबाला जिले के नारायणगढ़ उपमण्डल के दक्षिण-पूर्व में यमुनानगर जिले का सढौरा कस्बा है। कस्बे के विषय में मान्यता है कि साधु-सन्यासी हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए जाते समय यहां ठहराव करते थे।

स्थानीय लोग मानते थे कि ‘साधुराह’ शब्द अपभ्रंश होकर ‘सढ़ौरा’ बन गया। मध्यकाल में यह एक महत्वपूर्ण कस्बा होता था। 1716 ई. में सढौरा का संबंध पीर बुद्ध शाह से भी माना जाता है। बुद्धशाह जी के नाम से यहां एक गुरूद्वारा भी बना हुआ है। बाबा बंदा बहादुर के संघर्ष के निशान भी सढौरा में देखे जा सकते हैं। जब सोनीपत के सेहरी-खांडा में बंदा बहादुर के लिए परिस्थितियां कठिन होने लगी तो बंदा बहादुर ने सढौरा में अपना मुख्यालय बना लिया था। यहां से 17 कि.मी. की दूरी पर लोहगढ़ के किले से बाबा बंदाबहादुर ने शाही सेनाओं का मुकाबला किया था। साढ़ौरा में तीन प्राचीन मन्दिर-‘गागरवाला’, ‘मनोकामना’ तथा ‘तोरांवाला’ हैं। इस कस्बे में सैयद कादिर शाह कुमैशुलआजम की दरगाह भी बनी हुई है।

बिलासपुर (Bilaspur)

बिलासपुर कस्बा यमुनानगर से 35 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। इस कस्बे का संबंध महर्षि वेदव्यास से माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस कस्बे का प्राचीन नाम ‘ब्यासपुर’ था। ब्यासपुर का अपभ्रंश होकर बिलासपुर हो गया। यहां से तीसरी सदी के सिक्के तथा ग्यारहवीं शाताब्दी की उमा-महेश्वर की एक मूर्ति तथा 12वीं सदी की एक गणेश प्रतिमा मिली है। बिलासपुर में कपालमोचन मन्दिर तथा कपालमोचन सरोवर है। सरोवर के पूर्व दिशा में गुरू गोबिन्द सिंह जी का ‘गुरूद्वारा कपालमोचन’ है। कहा जाता है कि 1687 ई. में गुरू जी ने 52 दिन तक यहां पड़ाव डाला था तथा मुगलों के साथ युद्ध के उपरान्त अपने शस्त्र धोए थें।

बिलासपुर के उत्तर में शिवालिक की पहाड़ियों में आदिबद्री गांव बसा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार आदिबद्री को ही ऐतिहासिक सरस्वती नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। आदि बद्री से गणेश की प्रतिमा तथा कई बौद्ध मूर्तियां मिली हैं। विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी पर अनुसंधान तथा इसे पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में हरियाणा सरकार द्वारा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड की स्थापना की गई। इसी वर्ष (2015) हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष कंवरपाल सिंह द्वारा यमुनानगर जिले के मुगलवाली गांव से सरस्वती नदी की खुदाई और इस पुनरोद्धार कार्य का शुभारंभ किया गया। हरियाणा सरकार द्वारा इस क्षेत्र को तीर्थ स्थल तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है।

यमुनानगर जिले का सामाजिक परिदृश्य (Social landscape of Yamunanagar district)

अंबाला जिले से जगाधरी उपमण्डल को अलग करके 1 नवंबर, 1989 को यमुनानगर को जिला बनाया गया। जिले का कुल क्षेत्रफल 1,756 वर्गकि.मी. है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की कुल जनसंख्या 12,14,205 है। जिले में पुरूषों की संख्या 6,46,718 तथा महिलाओं की संख्या 5,67,487 है। जनसंख्या की दृष्टि से यमुनानगर जिले का हरियाणा में 8वां स्थान है। जिले का लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 877 महिलाएँ हैं 0-6 वर्ष के आयुवर्ग में लिंगानुपात 807 है। यमुनानगर जिले की साक्षरता दर 78.0% है। जिले में पुरूषों की साक्षरता दर 83.8% तथा महिलाओं की साक्षरता दर 71.38% है। जिले में जनसंख्या का घनत्व 687 है।

यमुनानगर जिले की लगभग 61.06% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर जनसंख्या कृषि तथा इससे संबद्ध गतिविधियों से जुड़ी हुई हैं।

यमुनानगर जिले का भौगोलिक परिचय (Geographical introduction of Yamunanagar district)

हरियाणा के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित यमुनानगर जिला प्रदेश का एक महत्वपूर्ण जिला है। शिवालिक की पहाड़ियों की तलहटी में बसा यमुनानगर जिला प्राकृतिक दृष्टि से एक समृद्ध क्षेत्र है। जिले का उत्तरी क्षेत्र एक गिरिपादीय मैदान है। इस क्षेत्र की मृदा में बालू, चीका तथा बजरी की प्रधानता मिलती है। जगाधरी तहसील में इस प्रकार की मृदाओं को ‘कंधी’ कहा जाता है। जिले के मध्य क्षेत्र में चीका युक्त भारी दोमट मृदा मिलती है। स्थानीय भाषा में इसे ‘डाकर’ कहा जाता है। वर्षा के दौरान यह मृदा चिपचिपी हो जाती है तथा शुष्क मौसम में यह मृदा सख्त हो जाती है। ये मृदा कम सुप्रवाहित है इस तरह की मृदा में चावल, गेहूँ तथा जौ की कृषि की जाती है।

यमुनानगर जिले के दक्षिणी तथा दक्षिण पश्चिमी भागों में सामान्यतः भारी दोमट मृदा मिलती है जिसे स्थानीय भाषा में ‘खादर’ कहा जाता है। यमुनानगर जिले के पूर्वी किनारों पर यमुना नदी के साथ लगते क्षेत्रों में प्रतिवर्ष बाढ़ के जल द्वारा बहाकर लाई गई सिल्टयुक्त मृदा मिलती है जिसे ‘नवीन खादर’ कहा जाता है।

जिले के उत्तरी भाग में स्थित गिरिपादीय मैदान में पहाड़ी वनस्पति मिलती है तथा जिले के शेष मैदानी क्षेत्र में धान, गन्ना, गेहूँ, सूरजमुखी आदि फसलों का उत्पादन होता है। जिले में आम का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।

यमुनानगर जिले की जलवायु एवं वर्षा (Climate and rainfall of Yamunanagar district)

यमुनानगर जिले की जलवायु महाद्वीपीय प्रकार की है। जिले में मार्च से जून तक गर्मी रहती है। जून का महीना वर्ष का सबसे गर्म महीना है। जून के महीने में तापमान 45° से. तक चला जाता है। जून का अन्तिम सप्ताह जिले में मानसून का आगमन काल माना जाता है। जुलाई से सितंबर तक का समय यमुनानगर जिले में वर्षा का मौसम रहता है। यमुनानगर जिले में वर्षा का वार्षिक औसत 100 से.मी. है। कुल वार्षिक वर्षा की लगभग 75% वर्षा जुलाई-सितंबर माह के बीच होती है। जिले में वर्षा दक्षिण-पूर्वी मानसून से होती है। सर्दियों में भी पश्चिमी विक्षोभ के कारण हल्की वर्षा होती है। यह वर्षा गेहूँ की फसल के लिए वरदान मानी जाती है। जनवरी का महीना वर्ष का सबसे ठण्डा महीना होता है। इस महीने में कोहरे के साथ कड़ाके की सर्दी रहती है तथा तापमान 1.5° से. तक चला जाता है।

यमुनानगर जिले में कृषि तथा वन (Agriculture and Forests in Yamunanagar District)

शिवालिक की तलहटी में बसा यमुनानगर जिला प्राकृतिक रूप से बहुत समृद्ध है। यमुना नदी कलेसर के क्षेत्र से हरियाणा में प्रवेश करती है

और यमुनानगर जिले के पूर्वी किनारे के साथ-साथ प्रवाहित होती है। यमुनानगर जिले के आदिबद्री को सरस्वती का उद्गम स्थान माना जाता है। जिले के उत्तरी भाग में लाल मिट्टी पाई जाती है। जिले के अधिकांश क्षेत्र में सिल्टयुक्त भारी मृदा मिलती है। यमुनानगर जिले का गन्ना उत्पादन में पूरे राज्य में प्रथम स्थान है। यहां राज्य का 26.96% गन्ना उत्पादन होता है। इसके अलावा यहाँ गेहूँ, चावल, मक्का तथा सूरजमुखी आदि का भरपूर उत्पादन होता है। इस जिले में फलों (विशेषकर आम) और सब्जियों की खूब पैदावार होती है।

वनक्षेत्र की दृष्टि से यमुनानगर जिले का राज्य में पंचकूला के बाद दूसरा स्थान है। यमुनानगर जिले के लगभग 12.17% क्षेत्र पर वन हैं। जिले में लगभग 86 वर्ग कि.मी. का क्षेत्र सघन वन क्षेत्र है। कुल मिलाकर यमुनानगर जिले में 217 वर्ग कि.मी. का क्षेत्र वन क्षेत्र है जिस पर उपोष्ण कटिबंधीय वन पाए जाते हैं। जिले का कलेसर का क्षेत्र सघन वन्यक्षेत्र है। 5098 हेक्टयर क्षेत्र में फैले कलेसर के वन में साल व चिनार के वृक्ष मिलते हैं। कलेसर एक वन्य जीव अभयारण्य भी है। यह उद्यान लाल जंगली मुर्गों के लिए प्रसिद्ध है। दिसम्बर, 2003 में कलेसर को राष्ट्रीय पार्क घोषित किया गया।

यमुनानगर जिले का आर्थिक परिदृश्य (Economic scenario of Yamunanagar district)

यमुनानगर जिले में बर्तन उद्योग मुगलकाल से ही आरंभ हो गया था। मध्यकाल में ‘अब्दुल्लापुर मंडी’ के नाम से प्रसिद्ध वर्तमान यमुनानगर उत्तर भारत की एक प्रसिद्ध टिंबर मार्केट होती थी। यहां का धातु उद्योग पिछले 400 वर्षों से पूरे भारत में प्रसिद्ध है। यहां पर मशीनी पुर्जे, पीतल, तांबे, स्टील तथा एल्युमीनियम के बर्तन विदेशों तक में निर्यात किए जाते हैं।

यमुनानगर जिले के कुछ प्रमुख उद्योग यहां सूचीबद्ध किए गए हैं (Some of the major industries of Yamunanagar district are listed here.)

  • बल्लारपुर पेपर मिल (बिल्ट)
  • सरस्वती शुगर मिल
  • भारत स्टार्च केमिकल लिमिटेड
  • यमुना गैसेज लिमिटेड
  • रेलवे कैरिज एड वैगन वर्कशाप – जगाधरी
  • दीनबंधु छोटूराम तापीय विद्युत परियोजना यमुनानगर

बल्लारपुर पेपर मिल (बिल्ट) (Ballarpur Paper Mill)

1929 ई. में इस मिल की स्थापना मैसर्स पंजाब पल्प एण्ड पेपर मिल अब्दुल्लापुर लिमिटेड के नाम से हुई थी। इस मिल में उच्च स्तर के लिखने व मुद्रण करने के कागज का उत्पादन होता है।

सरस्वती शुगर मिल (Saraswati Sugar Mill)

इस चीनी मिल की स्थापना 1933 ई. में लाहौर में की गई थी। यमुनानगर में स्थापित यह मिल ‘सरस्वती औद्योगिक सिंडिकेट लि.’ की एक युनिट है।

भारत स्टार्च केमिकल लिमिटेड (Bharat Starch Chemical Limited)

इसकी स्थापना 1938 ई. में की गई थी। इस मिल में मक्के से स्टार्च और इसके उत्पाद तैयार किए जाते हैं।

यमुना गैसेज लिमिटेड (Yamuna Gases Limited)

1973 में औद्योगिक गैसों के उत्पादन के लिए इस रासायनिक उद्योग की स्थापना का इसका नाम बदलकर ‘यमुना गैसेस एंड केमिकल्स’ कर दिया गया।

रेलवे कैरिज एड वैगन वर्कशाप – जगाधरी (Railway Carriage And Wagon Workshop – Jagadhri)

जगाधरी स्थित रेलवे की यह वर्कशाप भारत की एकमात्र वर्कशाप है जहा शताब्दी एक्सप्रेस की मरम्मत का कार्य होता है। हरियाणा डिस्टिलरी-इस डिस्टिलरी की स्थापना 1969 ई. में जगाधरी में की गई थी। यहाँ पर उच्च गुणवत्ता की एल्कोहल तथा स्पिरिट का उत्पादन होता है।

दीनबंधु छोटूराम तापीय विद्युत परियोजना यमुनानगर (Deenbandhu Chhoturam Thermal Power Project Yamunanagar)

यमुनानगर जिले में अवस्थित यह तापीय विद्युत परियोजना 14 अप्रैल, 2008 को प्रारंभ की गई। यह राज्य की प्रथम विद्यत परियोजना है जिसे किसी निजी कंपनी को सौंपा गया है। इस परियोजना के अंतर्गत 300 MW प्रति युनिट की दो युनिट चल रही हैं जिन की कल विद्यत उत्पादन क्षमता 600 MW है। इसका प्रथम युनिट का निर्माण कार्य केवल 27 महिने में पूर्ण हुआ जो भारत में किसी भी ग्रीनफील्ड परियोजना के लिए सबसे कम समय है। हरियाणा सरकार यमुनानगर जिले में परियोजना विस्तार के रूप में 800 MW क्षमता का एक सुपर क्रिटिकल थर्मल पॉवर प्लांट स्थापित करने
की योजना बना रही है जिस पर शीघ्र ही कार्य आरंभ होने की संभावना है।

यमुनानगर जिले के प्रमुख शिक्षण संस्थान (Major educational institutions in Yamunanagar district)

यमुनानगर जिले में साक्षरता दर 78.0% है जो राज्य की औसत साक्षरता दर से 2% अधिक है। इसके बावजूद जिले में कोई भी राष्ट्रीय स्तर का प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है। यमुनानगर जिले में डी.ए.वी. कॉलेज यमुनानगर, गुरूनानक खालसा कॉलेज़ यमुनानगर, मुकन्दलाल नेशनल कॉलेज यमुनानगर जैसे महाविद्यालय चल रहे हैं परन्तु ये सभी स्थानीय स्तर के शिक्षण संस्थान है।
यमुनानगर जिले के हथनीकुण्ड बैराज के निकट चौ. रणबीर सिंह हुडडा सिंचाई एवं ऊर्जा संस्थान स्थापित किया गया है।
यमुनानगर जिले में कोई भी विश्वविद्यालय नहीं है। हाल ही में डी.ए.वी. प्रबंधन समिति द्वारा यमुनानगर में एक महिला विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की गई है। यह विश्वविद्यालय यमुनानगर जिले का प्रथम विश्वविद्यालय तथा प्रदेश का दूसरा महिला विश्वविद्यालय होगा।
यमुनानगर जिले का जवाहर नवोदय विद्यालय खिजराबाद के निकट गुलाबगढ़ गांव में है। यह नि:शुल्क, पूर्णतया आवासीय विद्यालय 2005 में स्थापित किया गया था।

यमुनानगर जिले के प्रमुख स्थान (Major places in Yamunanagar district)

  • गुरुद्वारा कपाल मोचन (Gurudwara kapal mochan)
  • बीरबल का रंगमहल – बूड़िया (Birbal Rang Mahal – Boodiya)
  • आदिबद्री (Adibadri)
  • बसन्तूर (Basantur)
  • हथनी कुण्ड (Hathni Kund)
  • ताजेवाला कांपलेक्स (Tajewala Complex)
  • चिटटा मंदिर (Chitta Temple)

गुरुद्वारा कपाल मोचन

यमुनानगर जिले के बिलासपुर में यह गुरुद्वारा स्थापित है। माना जाता है कि 1687 ई. में गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 52 दिन तक यहाँ पड़ाव डाला था। यह गुरुद्वारा कपाल मोचन सरोवर के पूर्व में स्थित है।

बीरबल का रंगमहल (बूड़िया)

बीरबल का यह रंगमहल यमुनानगर से लगभग 12 किलोमीटर दूर बूड़िया नामक प्राचीन कस्बे के निकट है। कहा जाता है कि उस समय बीरबल ने घने जंगल में अपने आमोद-प्रमोद के लिए यह रंगमहल बनवाया था। यहाँ एक संस्कृत विद्यालय भी होता था।

आदिबद्री

आदिबद्री एक पौराणिक गाँव है। बिलासपुर के उत्तर में स्थित इस गाँव के निकट ऐतिहासिक सरस्वती नदी का उदगम स्थल माना जाता है। हरियाणा सरकार ने हाल ही में इसे एक विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है।

बसन्तूर

यमुनानगर जिले के उत्तर-पूर्व में बसन्तूर नामक महाभारत-कालीन कस्बा है। इसका संबंध महाराज शान्तन से माना जाता है।
कस्बे में एक कुआँ है जिसका जल गंगाजल की तरह पवित्र माना जाता है।

हथनी कुण्ड

इसकी स्थापना वैदिक काल की मानी जाती है। माना जाता है कि पाण्डवों ने अपने वनवास पाण्डवा ने अपने वनवास का कुछ समय यहाँ भी व्यतीत किया था। हथनी कुण्ड के निकट दादूपुर में यमुना के जल को नियंत्रित करने की व्यवस्था की गई

ताजेवाला कांपलेक्स

यमुनानगर जिले में जगाधरी-पावटा मार्ग पर ताजेवाला एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यहाँ यस बनाया गया है जहाँ से पश्चिमी व पूर्वी यमुना नहर निकलती है।

चिटटा मंदिर

इस मन्दिर का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। लगभग 70 वर्ष पूर्व इस मंदिर में स्थापित की गई थी। हनुमान जी की इस श्वेत प्रतिमा का नाम समय के साथ चिट्टा मंदिर पड गया।

यमुनानगर के कुछ अन्य प्रसिद्ध स्थल (Some other famous places of Yamunanagar)

  • पंचमुखी हनुमान मंदिर
  • बद्रीनारायण मंदिर
  • भगवान परशुराम सर्वधर्म मंदिर
  • चनेटी के बौद्ध स्तूप
  • सूर्यकुण्ड, कपाल मोचन
  • लक्कड़हारा मंदिर
  • जगाधरी सूर्यकुण्ड मंदिर, अमादलपुर

 

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