पानीपत की लड़ाई कब और कैसे हुई

तथ्यों के आधार पर पानीपत में मुख्य रूप से तीन लड़ाइयां लड़ी गई| जिनका उल्लेख हम अपने इस लेख में विस्तार पूर्वक बारी-बारी करेंगे

  • पानीपत का प्रथम युद्ध – (पहली लड़ाई – 1526)
  • पानीपत का द्वितीय युद्ध – (दूसरी लड़ाई – 1556)
  • पानीपत का तृतीय युद्ध – (तीसरी लड़ाई – 1761)

पानीपत का प्रथम युद्ध और मुगलों का आगमन

16वीं शताब्दी के आरंभ में भारत में एक और विदेशी शक्ति ने अपने पैर पसारने आरंभ किए। यह शक्ति इतिहास में ‘मुगल वंश’ के नाम से प्रसिद्ध है। भारत में मुगल वंश का संस्थापक ‘जहीरूद्दीन मुहम्मद बाबर’ था। वह पिता की ओर से तैमूर और माता की ओर से चंगेजखाँ के वंश से संबंधित था। इसीलिए इतिहासकार लेनपून ने बाबर के विषय में कहा था, ‘उसकी रगो में मध्य एशिया के दो क्रूर वीरों का रक्त बहता है।’ वह मध्य एशिया के एक छोटे से राज्य फरगना का शासक था।

बाबर का जन्म 24 फरवरी, 1483 को फरगना में उमर शेख मिर्जा और कुतलुगनिगार खानम के घर पर हुआ। बाबर प्रारंभ से ही महत्वाकांक्षी था। उसने भारत पर कई आक्रमण किए। दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए वह 1525 ई० में काबुल से चला। यह आक्रमण बड़ा ही प्रबल था। इसी आक्रमण के दौरान वह हरियाणा में प्रविष्ट हुआ। जब सुलतान इब्राहिम लोदी को बाबर के आक्रमण की सूचना मिली तो वह एक विशाल सेना लेकर आगे बढ़ा। इसके अतिरिक्त, उसे रोकने के लिए हरियाणा से दो सेनाएँ और आई-एक मेवात के सरदार हसन खाँ मेवाती की और दूसरी हिसार के फौजदार हमीद खाँ की। हमीद. खाँ की सेना बडी ताकतवर मानी जाती थी क्योंकि इसमें अधिकाशंत: हरियाणवी सैनिक थे। बाबर को इब्राहिम और हमीद खाँ की सेनाओं से एक साथ लडने में कोई भलाई नजर नहीं आई।

हमीद खाँ से लड़ने के लिए उसने शहजादे हुमायूँ को भेजा। हुमायूँ और हमीद खाँ के मध्य फरवरी 1526 ई० में जमकर युद्ध हुआ। इस युद्ध के बाद हिसार पर मुगलों का कब्जा हो गया। विजय से प्रसन्न होकर बाबर ने हुमायूँ को हिसार की जागीर प्रदान की। 5 मार्च, 1526 को हुमायूँ अंबाला में पुनः बाबर की सेनाओं से आ मिला। अगले दिन वह शाहबाद से होता हुआ घरोंडा पहुँच गया। यहाँ बाबर की सेनाओं ने कुछ दिन विश्राम किया। बाबर को इब्राहिम शाह की सेनाओं से युद्ध के लिए पानीपत का मैदान बड़ा उचित लगा। पानीपत पहुँचकर उसने 12 अप्रैल, 1526 से यहाँ मोर्चे बनाने आरंभ कर दिए। दो दिन बाद 14 अपैल, 1526 को इब्राहिम लोदी ने भी पानीपत पहुँच कर मोर्चे बनाने आरंभ कर दिए। परन्तु, वह कुशल सेनापति नहीं था। उसकी सेना भी प्रशिक्षित नहीं थी। आठ दिन तक इंतजाम करने के उपरान्त 21 अप्रैल, 1526 को बाबर ने अपनी सेनाओं को आक्रमण का आदेश दे दिया। दोपहर तक बाबर ने इब्राहिम शाह की सेना की कमर तोड़ दी।

पानीपत की पहली लड़ाई का परिणाम

इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि पानीपत की प्रथम लड़ाई 21 अप्रैल 1556 ईस्वी को इब्राहिम लोदी और बाबर के बीच हुई| बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच हुई पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हरा दिया और इस प्रकार से पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर की विजय हुई|

इब्राहिम शाह लोदी भी युद्ध में मारा गया। संयोग की बात देखिए कि तरावड़ी के युद्ध (1192 ई०) से उदय हुआ दिल्ली सल्तनत का सूर्य केवल 50 कि.मी. दूर पानीपत में अस्त हो गया। लगभग सात दिन तक बाबर पानीपत में ही ठहरा रहा। धन-संपति और इब्राहिम के अस्त्र-शस्त्रों पर अधिकार करने के उपरान्त उसने सुलतान मुहम्मद उगली को पानीपत का हाकिम नियुक्त कर दिया। जहाँ पर इब्राहिम लोदी का शव मिला था उस स्थान पर बाबर ने उसकी याद में इब्राहिम लोदी की कब्र बनवा दी।

इसके साथ ही बाबर ने इस स्थान पर एक बगीचा, एक मस्जिद और एक तालाब का निर्माण भी करवा दिया। इस बाग को ‘काबुली बाग’ के नाम से जाना जाता है। इसके उपरान्त, बाबर ने सोनीपत और दिल्ली पर कब्जा जमा लिया। इन दोनों ही स्थानो पर उसे किसी बड़े विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। यहां उसने काफी धन-संपति हथिया ली। परन्तु, बाबर की असली परीक्षा अभी बाकी थी। हरियाणा की वीर जनता पर अधिकार करना बड़ा कठिन कार्य था। मेवात में हसनखां मेवाती अपने समस्त सरदारों के साथ जंग के लिए तैयार था। हिसार के अफगान सरदार भी हमीदखां सारंगवानी नेतत्व में संघर्ष की तैयारी कर रहे थे।

21 नवंबर, 1526 को हिसार के निकट अफगान सेनाओं और बाबर की सेनाओं में भयंकर युद्ध हो इसमें भी बाबर को सफलता मिली और हिसार पर बाबर का अधिकार हो गया। बाबर ने पानीपत में बन्दी बनाए गए हसन खाँ मेवाती के पर नाहर खाँ को छोड़ दिया और हसन खाँ मेवाती को साथ आने के लिए निमंत्रण भेजा। परन्तु, हसन खाँ मेवाती ने बाबर का निमंत्रण ठुकरा दिया और राणा सांगा का साथ देने का निश्चय किया। 17 मार्च, 1527 को हसन खाँ ने हजारों मेवातियों के साथ खानवा में बाबर के साथ भयंकर युद्ध किया। हसन खाँ और उसके साथी बाबर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। खानवा के युद्ध के उपरान्त बाबर ने मेवात पर अधि कार कर लिया। बाबर ने मेवात का प्रबंध चीन तैमूर नाम के अपने एक विश्वस्त सैन्य संरदार को सौंप दिया। उसने हसन खाँ मेवाती के बेटे नाहर खां को माफ कर दिया और उसे मेवात से दूर एक बड़ी जागीर दे दी।

प्रशासन को ठीक प्रकार से चलाने के लिए बाबर ने हरियाणा के नवविजित प्रदेश को चार सरकारों (आधुनिक जिलों के समकक्ष) में बांट दिया। ये सरकार थे-(1) दिल्ली, (2) मेवात, (3) हिसार और (4) सरहिंद। उसने अहसान तैमूर को नारनौल और बुगरा सुलतान को समसाबाद की जागीर सौंप दी।

मंढारों का विद्रोह

बाबर के शोषणकारी राज को हरियाणा की जनता बिल्कुल भी पसन्द नहीं करती थी। फलस्वरूप, प्रदेश के कई क्षेत्रों में जनता ने विद्रोह किया। इनमें सबसे तीव्र विद्रोह 1530 ई० में कैथल में हुआ। कैथल के मंढार राजपूतों ने अपने नेता मोहन सिंह मंढार के नेतृत्व में संगठित होकर बाबर को चुनौती दी। बाबर ने सरहिन्द के गवर्नर अलीकुली हमदान के नेतृत्व में सेना भेजी। शुरूआती हार के बाद बाबर की सेना ने कैथल पर कब्जा कर लिया और मंढार विद्रोहियों का भयंकर कत्लेआम किया गया।

हुमायूँ का राज्यकाल

मंढार विजय के कुछ समय उपरान्त 26 दिसंबर, 1530 को बाबर की मृत्यु हो गई। उसका अधिकतर समय युद्धों और विद्रोहों पर काबू करने में ही निकल गया वह कुछ भी उल्लेखनीय नहीं कर पाया। परन्तु बाबर ने भारत में एक शक्तिशाली मुगलवंश की नींव रख दी और भारतीयों की लगभग 327 वर्ष की मुगलों की गुलामी की पटकथा भी साथ ही लिखी गई। बाबर के बाद उसका पुत्र हुमायुं दिल्ली की गद्दी पर बैठा। हुमायूँ ने हरियाणा का प्रशासन पूर्ववत् बनाए रखा। उसने इस क्षेत्र की सभी सरकारों में अपने परिजनों और चहेते सरदारों को हाकिम नियुक्त किया। परन्तु, हुमायुं 1540 ई० में हरियाणा सहित अपना संपूर्ण राज्य अफगान सरदार शेरशाह सूरी के हाथों गंवा बैठा।

शेरशाह का हरियाणा प्रदेश से पुराना संबंध था। उसका दादा इब्राहिम सूरी पेशावर के निकट का रहने वाला था। वह बहलोल लोदी के काल में हरियाणा आया था। अपने गुजारे के लिए उसने हिसार के जागीरदार के पास नौकरी कर ली। जल्दी ही वह नारनौल के पास एक छोटी सी जागीर का मालिक बन गया। नारनौल में ही 1486 ई० में इब्राहिम सूरी के घर शेरशाह का जन्म हुआ। शेरशाह का बचपन का नाम ‘फरीद’ था। फरीद ने अफगान शासकों के पास नौकरी कर ली और शीघ्र ही वह एक सामान्य सैनिक से उन्नति करके बिहार का शासक बन गया। शेरशाह ने 1539 ई० में चौसा के युद्ध में तथा 1540 ई० में कन्नौज के युद्ध में हराकर हुमायूँ को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया। इस प्रकार उसका हरियाणा और दिल्ली पर अधिकार हो गया।

शेरशाह ने अपनी जन्मभूमि हरियाणा के शासन प्रबंध में विशेष रूचि ली। उसने भी पूर्ववत् चार सरकारों-दिल्ली, मेवात, हिसार और सरहिन्द को बनाए रखा। शेरशाह ने प्रत्येक सरकार का प्रबंध मुख्यतः दो अधिकारियों-शिकदार (शिकदार-ए-शिकदारान), जिसका मुख्य कार्य रक्षा एवं शांति व्यवस्था बनाए रखना था तथा मुख्य मुन्सिफ (मुन्सिफ-ए-मुन्सिफ), जिसका मुख्य कार्य न्यायिक व्यवस्था थी, में बांध दिया। सरकार को परगनों (आधुनिक तहसील) में बांट दिया गया। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी जिसका मुखिया ‘मुकद्दम’ कहलाता था। वह राजस्व इकट्ठा करता था तथा चौकीदार की सहायता से कानून और व्यवस्था कायम रखता था।

पटवारी गांव के भूमि संबंधी रिकार्ड देखता था। शेरशाह ने कृषकों के हित के लिए अनेक कदम उठाए उसने कृषि योग्य भूमि की पैमाइश करवाई। शेरशाह ने राजस्व की ठीक गणना के लिए कृषि की उपज मापने का निश्चय किया। वह कृषि उपज का 1/4 भाग कर के रूप मे लेता था। उसका कर्मचारियों को आदेश था कि ‘लगान निश्चित करते समय नर्मी से काम लो परन्तु, लगान एकत्र करते समय नर्मी न दिखाओं’। दुर्भाग्य से वह अधिक समय राज्य नहीं कर सका और 1545 ई० में युद्ध के समय कालिंजर के स्थान पर एक सुरंग फटने से वह मारा गया।

उसके उत्तराधिकारी इस्लाम शाह (1545-53 ई०) तथा आदिल शाह (1553-55 ई०) नकारा सिद्ध हुए। चारों ओर अव्यवस्था फैल गई। इस स्थिति का हुमायँ ने पूरा लाभ उठाया और 15 वर्ष बाद 1555 ई० में पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लिया। परन्तु, इसके कुछ ही समय उपरान्त 26 जनवरी, 1556 को हुमायुं पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर चल बसा। हुमायुं का पुत्र अकबर उस समय पंजाब में था। 13 वर्ष की आयु में उसके संरक्षक बैरम खां ने 14 फरवरी, 1556 को कलानौर (पंजाब) में अकबर का राज्याभिषेक कर दिया। उस समय वह चारों ओर शत्रुओं से घिरा हुआ था।

हेमचन्द्र (हेमू)

हेमचन्द्र (हेमू) हरियाणा की प्रसिद्ध नगरी रेवाड़ी का रहने वाला था। उसके पिता का नाम पूर्णदास था और वह जाति से दूसर था। हेमचन्द्र एक चतुर व्यक्ति था। पिता की आर्थिक शक्ति अच्छी ना होने के कारण बचपन से ही उसने सूर शासक के अधीन नौकरी कर ली। अपनी योग्यता के बल पर हेमचन्द्र एक सरकारी फेरी वाले से ‘शाहनगा-ए-बाजार’ (राज्य के बाजार का प्रबन्धक) के पद तक पहुँच गया।

सूर शासक इस्लामशाह राज्य के सभी विषयों पर हेम् से विमर्श करके कार्य करता था 30 अक्तूबर, 1553 को इस्लामशाह की मृत्यु के उपरान्त आदिलशाह शासक बना। वह भी हेमू की योग्यता का कायल था। हेमचन्द्र धार-धार आदिलशाह का प्रधानमंत्री बन गया। आदिलशाह की कमजोरी का लाभ उठाते हुए अनेकों सामन्त सरदार उसके विरूद्ध खडे हा गए था इन पर नियंत्रण करने हेतु हेम् ने कुल 22 युद्ध लड़े और उन सबमें विजयी रहा।

हुमायूँ की मृत्यु के पश्चात् आदिलशाह ने हमू को दिल्ली के खाली पड़े सिंहासन पर अधिकार करने भेजा। हेम ने 7 अक्तूबर, 1556 को मुगल सेनापति तारदीबेग की सेना को खदड़ कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। दिल्ली में प्रविष्ट होते ही हेमचन्द्र ने शाही छत्र के नीचे बैठ कर महाराजा “विक्रमादित्य’ का उपाधि के साथ खुद को भारत का सम्राट घोषित कर दिया। इसके साथ ही उसने प्रशासन पर अपनी पकड़ बनानी आरंभ कर दी।
वह दिल्ली का अंतिम हिन्दू शासक था।

पानीपत की दूसरी लड़ाई

दिल्ली पर हेमू के अधिकार की सूचना मिलते ही मुगल सरदारों में खलबली मच गई। परन्तु बैरमखां ने मुगल सरदारों को हेमचन्द्र से युद्ध के लिए उत्साहित किया। 1556 ई० में दोनों सेनाएं पानीपत के मैदान में आ डटी। 5 नवंबर, 1556 को दाना सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। हेमू का पलड़ा भारी था और उसकी जीत निश्चित थी। तभी दुर्भाग्यवश एक तीर हेमू की आंख को भद गया। वह मूर्छित हो गया और उसकी सेना में भगदड मच गई। चेतना वापस लौटने पर हेमू ने आंख से तीर को निकाला और युद्ध में जुट गया। परन्तु उसकी बची-खुची सेना मुगलों का सामना नहीं कर पाई। हेमू को बंदी बना लिया गया और अकबर ने तुरंत उसका वध करवा दिया।

हेमू के सिर को बैरमखां ने काबुल में ‘लोहे के द्वार’ पर टंगवा दिया। हेमू के वध के उपरान्त उसके 80 वर्षीय पिता पूर्णदास और अन्य परिजनों को कारागार में डाल दिया गया। हेमू की विधवा को पकड़ने के लिए अकबर की सेना ने बहुत प्रयास किए परन्तु, वह बैजवाड़ा के जंगलों में चली गई। पूर्णदास को इस्लाम स्वीकार करने से इंकार करने पर अकबर ने कत्ल करवा दिया।

हेमचंद्र की वीरता के बारे में इतिहासकार डा० के० आर० कानूनगो कहते हैं, “राणा सांगा को छोड़कर अन्य किसी भी हिन्दू यौद्धा के शरीर पर युद्धस्थलों में मिले इतने वीरतापूर्ण घाव नहीं थे।” पानीपत की विजय के उपरान्त अकबर की सेनाओं ने बड़ी आसानी से हरियाणा पर अधिकार कर लिया। प्रारंभिक शासन काल में अकबर एक क्रूर, वहशी और व्याभिचारी शासक था। परन्तु समय के साथ उसने अपनी धार्मिक नीति और कूटनीति में बहुत सुधार किया। 1564 ई० में हिन्दुओं की संतुष्टि के लिए अकबर ने जजिया कर समाप्त कर दिया।

हरियाणा में अकबर की प्रशासन व्यवस्था

हरियाणा की शासन व्यवस्था में अकबर ने गहरी रूचि दिखाई। उसका प्रशासनिक ढाँचा शेरशाह सूरी के प्रशासन के काफी हद तक मेल खाता था। अकबर के काल में प्रशासन इस प्रकार व्यवस्थित था

  1. केन्द्र (प्रशासक : बादशाह)
  2. सूबा (प्रशासक : सूबेदार)
  3. सरकार (प्रशासक : फौजदार)
  4. परगना (प्रशासक : शिकदारा
  5. गांव (परंपरागत प्रशासन)

मुगल बादशाह की शक्तियाँ असीमित तथा अविभाज्य थी। राज्य सूबों में विभाजित था। 1602 ई० में सूबों की संख्या 15 थी। हरियाणा का बहुत बड़ा भाग दिल्ली सूबे में आता था। कुछ भाग आगरा सूबे के अन्तर्गत भी आता था। सूबे आधुनिक प्रान्त की तरह होते थे। प्रशासन की दृष्टि से सूबे को सरकारों में विभाजित किया गया था।

बाद में शाहजहाँ ने तिजारा और नारनौल सरकारों को आगरा सूबे से हटाकर दिल्ली सूबे के अधीन कर दिया था। शासन सबसे छोटी इकाई गाँव थी। इसका प्रबंध मुकद्दम और पंचायतें देखती थी। मुकद्दम गाँव का भूमि-कर उगाहता था तथा की सहायता से शांति कायम करता था। पंचायतों में गाँव के बुद्धिमान व्यक्ति होते थे।

पंचायतें गाँव की सामान्य व्यवस्था अकबर ने शेरशाह की राजस्व प्रणाली में सुधार करके नई भूमिकर व्यवस्था लागू की। उसने मुजफ्फर खाँ और टोडरमल की से जो नई भमिकर व्यस्था कायम की उसे “जब्ती प्रणाली’ अथवा ‘टोडरमल का बंदोबस्त’ कहा जाता था। कुछ लोग ‘आइन-ए-दससाला’ भी कहते हैं। यह प्रणाली केवल आठ सूबों में लागू की गई थी। जिनमें आगरा और दिल्ली सबा भी साम थे।

भूमि कर की दर भूमि की गुणवत्ता के अनुसार कहीं उपज का 1/3 भाग तो कहीं उपज का % भाग होता था। कभी पास कारणों से फसल खराब हो जाती थी तो लगान घटा दिया जाता था। न्याय व्यवस्था विभिन्न स्तरों पर विभाजित थी। केन्द्रीय न्याय व्यवस्था को बादशाह स्वयं देखता था। इसके अतिरिक्त सरकार. पण तथा नगर के स्तर पर न्याय व्यवस्था वहाँ के संबंधित अधिकारियों के द्वारा होती थी।

मुगल दरवार के अधिकारी

  • सरकार – काजी, कोतवाल, फौजदार
  • परगना – शिकदार (फौजदारी)
  • आमिल (दीवानी मामले)

जहांगीर और शाहजहां

1605 ई. में अकबर की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र सलीम जहांगीर के नाम से शासक बना। उसने 22 वर्ष तक शासन किया। जहांगीर ने हरियाणा में अकबर द्वारा लागू की गई प्रशासनिक व्यवस्था को बरकरार रखा। उसने अपने शासन के प्रथम वर्ष में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में वृक्ष लगाने के आदेश जारी किए। जहांगीर ने यात्रियों की सुविधा के लिए प्रत्येक 12 मील पर सराय आदि बनवाए तथा अन्य सुविधाएँ दीं। उसने ‘निसार’ नाम के सिक्के का प्रचलन आरंभ किया। जहांगीर ने फारसी भाषा में अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’ की रचना की। 1614-15 ई. में जहांगीर के शासनकाल में प्लेग की भयंकर बीमारी फैली। उस वक्त जहांगीर ने खुलकर जनता की सहायता की।

1606 ई. में जहांगीर के पुत्र खुसरो ने विद्रोह कर दिया। जहांगीर ने उसको पकड़वाकर अंधा करवा दिया और खुसरो की सहायता करने के कारण सिक्खों के 5वें गुरु अर्जुन देव को फांसी की सजा दी। जहांगीर के शासनकाल में कैप्टन हॉकिंस के नेतृत्व में (1608-11 ई.) प्रथम ब्रिटिश मिशन भारत आया परन्तु, कैप्टन हॉकिंस व्यापारिक अनुमति हासिल नहीं कर सका। सर टॉमस के नेतृत्व में दूसरा मिशन (1615-1618 ई.) भारत आया और जहांगीर से व्यापारिक अनुमति हासिल करने में सफल रहे।

1613 ई. में अंग्रेजों ने सूरत में प्रथम व्यापार केन्द्र की स्थापना की। जहांगीर के काल में जितने भी यात्री हरियाणा में आए सभी ने इसे एक समृद्ध और सुशासित क्षेत्र बताया था।

1627 ई. में जहांगीर की मृत्यु के उपरान्त शाहजहाँ भारत का सम्राट बना। उसका ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह हरियाणा को बहुत पसंद करता था। वह प्रायः फरीदाबाद के निकट पलवल में रहता था। यहीं पर सुलतानपुर गाँव में 6 मार्च, 1635 को उसके यहाँ एक पुत्र पैदा हुआ जिसका नाम सिपहर शिकोह था। यहीं दारा की सेवा में मेवात का प्रसिद्ध सरदार फिरोज खां मेवाती भी रहता था। इसके साथ-साथ उस समय दारा के पास हिसार-ए-फिरोजा की फौजदारी भी थी। शाहजहाँ ने प्रशासनिक व्यवस्था में भी कुछ परिवर्तन किए। उसने प्रशासन की एक नई इकाई बनाई जिसे चकला कहते थे। कुछ परगनों को मिलाकर एक ‘चकला’ बनता था। चकले का जिक्र हिसार के सन्दर्भ में देखने को मिलता है। किसी कृपाराम (गौड़) को हिसार के चकले • का हाकिम नियुक्त किया गया था। शाहजहाँ ने प्रशासन की सुविधा के लिए तिजारा और नारनौल की सरकारों को आगरा सूबे से निकाल कर दिल्ली सूबे से संबद्ध कर दिया। उसने सिंचाई व्यवस्था में भी सुधार के प्रयास किए। परन्तु, फिर भी शाहजहाँ के शासनकाल में जनता खुश नहीं थी।

शाहजहाँ को थानेसर से बड़ा लगाव बताया जाता है। यहाँ उसका धर्म गुरु शेख चेहली रहता था जिसकी सेवा में शाहजहाँ अक्सर यहा आया करता था। शहजादा दारा शिकोह भी शेख चेहली को अपना गुरु मानता था। शेख चेहली की मृत्यु के पश्चात् दारा शिकोह ने ही थानसर में शेख चेहली का संगमरमर का मकबरा बनवाया था। शेख चेहली का यह भव्य मकबरा ‘हरियाणा का ताजमहल’ कहलाता है। दारा शिकाह के साथ हरियाणा की जनता का बड़ा आत्मीय संबंध बताया जाता है। दारा और औरंगजेब के बीच उत्तराधिकार के युद्ध में भी हरियाणा का जनता दारा शिकोह के साथ खड़ी थी। मेव सरदार फिरोज खाँ मेवाती ने अन्तिम समय तक दारा की मदद की।

औरंगजेब का राज्यकाल और हरियाणा के विद्रोह

उत्तराधिकार के युद्ध में औरंगजेब को सफलता मिली। उसने शाहजहा का में डाल दिया और दारा की हत्या कर दी। इस प्रकार 1658 ई. में औरंगजेब ने दिल्ली के सिहांसन पर अधिकार कर लिया। हा की जनता औरंगजेब से घृणा करती थी। उसके शासनकाल (1658-1707 ई.) में कभी भी शान्ति कायम नहीं हो सका ने लोगों पर कमरतोड़ कर लगाए और अनेकों धार्मिक ज्यादतियाँ की। फलस्वरूप, इस क्षेत्र में उसके विरुद्ध लगातार विद्रोह उभरते रहे|

रेवाड़ी का रियासत के रूप में उदय

-हरियाणा में औरंगजेब को सर्वप्रथम चुनौती मिली सानहोला निवासी सांवलिया मेव के नेतृत्व
में मेवों की सेना से। वह औरंगजेब की सेनाओं पर गुरिल्ला हमले करता था। इसी प्रकार दहना गाँव (वर्तमान बादशाहपुर) निवासी हाथी सिंह बड़गूजर ने भी राजपूतों की सेना को इकट्ठा करके औरंगजेब से लोहा लिया। हाथी सिंह से निपटने के लिए औरंगजेब ने गढ़ी बोलनी (रेवाड़ी) के ठिकानेदार राव नंदराम की सहायता ली।

राव नंदराम ने हाथी सिंह बड़गूजर को बंदी बनाकर औरंगजेब को सौंप दिया। इससे प्रसन्न होकर औरंगजेब ने रेवाड़ी के क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकार नंदराम को दे दिए। इस प्रकार रेवाड़ी रियासत नींव पड़ी। सांवलिया मेव को निपटाने के लिए औरंगजेब ने कूटनीति से काम लिया। उसने हाथी सिंह के सामने उसकी रिहाई के बदले सांवलिया मेव की हत्या की शर्त रखी। हाथी सिंह बड़गूजर ने रिहा होते ही सांवलिया मेव की हत्या कर दी। सांवलिया मेव की चुनौती समाप्त होते ही औरंगजेब ने घासेड़ा की 11 गाँवों की जागीर ईनामस्वरूप हाथी सिंह को दे दी।

नारनौल में सतनामियों का विद्रोह (1672 ई०)

नारनौल के कई क्षेत्रों में 16वीं-17वीं सदी में सतनामी संप्रदाय के लोग शांतिप्रिय ढंग से रहते थे। 1672 ई. में सतनामी संप्रदाय से संबंधित एक किसान की एक सरकारी ओहदेदार से झड़प हो गई। सतनामियों ने मिलकर उसे पीटकर भगा दिया। सतनामियों को दण्डित करने के लिए नारनौल का फौजदार ताहिर खाँ शाही सेना लेकर आया परंतु, सतनामियों ने उसे बुरी तरह हराकर भागने पर विवश कर दिया तथा नारनौल पर अधिकार कर लिया। उन्होंने शाही खजाने को लूट लिया तथा नारनौल में अपनी सत्ता स्थापित करके यहाँ से मुगलों के सभी चिन्ह मिटा दिए। 15 मार्च, 1672 को बादशाह औरंगजेब ने शाहजादा मुहम्मद अकबर को शाही सेना लेकर नारनौल भेज दिया।

शाही सेना के साथ सतनामी पूरी बहादुरी से लड़े, परन्तु, मुगल सेना के संख्या बल से हार गए। सतनामी संप्रदाय के लगभग 5000 वीर इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। यह विद्रोह तो शांत हो गया परन्तु, 1707 ई. तक हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों में इसी प्रकार कई विद्रोह हुए। औरंगजेब ने इन सभी विद्रोहों को पूरी कट्टरता से दबा दिया। परन्तु, 3 मार्च, 1707 को औरंगजेब की मृत्यु के उपरांत मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया। 1709-10 ई. में बंदा बहादुर ने मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया। उन्होंने वर्तमान सोनीपत जिले के सेहरी-खाण्डा गांव में अपना मुख्यालय बनाया। उनको यहाँ काफी जन समर्थन प्राप्त हुआ। कुछ ही महीनों में उनके साथ हरियाणा तथा पंजाब से सैंकड़ों घुड़सवार तथा हजारों सैनिक जुड़ गए।

बन्दा बहादुर की सेना ने सोनीपत, कैथल, थानेसर, शाहबाद तथा कुंजपुरा पर चढ़ाई करके अधिकार कर लिया। 22 मई, 1710 को बंदा बहादुर की सेनाओं ने सरहिंद के फौजदार वजीर खाँ को मार डाला तथा सरहिन्द पर अधिकार कर लिया। बन्दा बहादुर ने सरहिन्द को अपने नव-विजित राज्य का मुख्यालय बना लिया। बंदा बहादुर पर नियंत्रण हेतु बहादुरशाह स्वयं फिरोज खाँ मेवाती को साथ लेकर युद्ध के लिए आ पहुँचा। 26 अक्तूबर, 1710 को करनाल और इन्द्री के बीच हुए युद्ध में बन्दा बहादुर को पीछे हटना पड़ा। इसके उपरान्त तरावड़ी में भी बन्दा बहादुर को फिरोज खाँ के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इसके पश्चात् बन्दा बहादुर को थानेसर तथा सरहिन्द में भी पराजय झेलनी पड़ी। बन्दा बहादुर ने यमुनानगर के सढ़ौरा में अपना नया मुख्यालय बनाया।

जब बादशाह फर्रुखसियार की सेनाओं ने हमला किया तो बन्दा बहादुर लोहगढ़ के किले में आ डटा। अक्तूबर 1713 में लोहगढ़ के किले पर शाही सेनाओं ने अधिकार कर लिया परन्तु, बन्दा बहादुर बच निकला। कुछ समय उपरान्त शाही सेनाओं ने उन्हें पकड़ लिया तथा बादशाह ने उसकी हत्या करवा दी। 1739 ई. में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। उस समय बादशाह मुहम्मदशाह गद्दी पर था। 24 फरवरी, 1739 को करनाल में नादिरशाह और मुहम्मदशाह के बीच युद्ध हुआ। इतिहास में इस युद्ध को ‘करनाल का युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। मुहम्मदशाह की सेना नादिरशाह की सेनाओं के सामने नहीं टिक पाई। रेवाड़ी के तत्कालीन शासक राव बालकिशन ने अपने 5000 सैनिकों सहित बादशाह की ओर से वीरता से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। बेकाबू लुटेरा नादिरशाह दिल्ली तक लूटपाट मचाकर वापिस भाग गया। नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की चूलें हिलाकर रख दीं।

राव बालकिशन के बलिदान से कृतज्ञ मुहम्मदशाह ने उसके छोटे भाई तथा उत्तराधिकारी राव गूजरमल को काफी जागीर और सम्मान दिया। इसके अलावा राव गूजरमल को रेवाड़ी के क्षेत्र की फौजदारी भी मिल गई। इसके साथ ही रेवाड़ी एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा। फर्रुखसियर (1713-19 ई.) के शासनकाल में गुड़गाँव के हाकिम दलेल खाँ (फौजदार खाँ) ने फर्रूखनगर को ही अपने राज्य का मख्यालय बना लिया। उस समय फर्रूखनगर राज्य हिसार से फरीदाबाद तक फैला था। दलेल खाँ के उपरान्त कामगार खाँ और राव गजरमल में युद्ध हुआ।

इस युद्ध में हारकर कामगार खाँ गूजरमल के हाथों हिसार और झज्जर के क्षेत्र गवाँ बैठा। इससे रेवाड़ी की ताकत और भी बढ़ गई। गजरमल ने धीरे-धीरे जयपुर नरेश से कानोंड-नारनौल का क्षेत्र जीत लिया। समय के साथ-साथ दादरी, भिवानी, हिसार, हांसी, झज्जर आदि क्षेत्र भी उसके अधिकार में आ गए। उसने गोकलगढ़ (रेवाड़ी) को राजधानी बनाकर इस विशाल राज्य का शासन चलाया। परन्तु, 1750 ई. में नीमराणा के ठाकुर टोडरमल (जो उसका मित्र भी था) ने धोखे से गूजर मल की हत्या कर दी।

गूजरमल की मृत्यु के साथ ही रेवाड़ी राज्य का पतन आरंभ हो गया। गूजरमल का पुत्र भवानी सिंह उसका उत्तराधिकारी बना, परन्तु, वह अयोग्य सिद्ध हआ। पश्चिम से जयपुर नरेश, पूर्व से फर्रुखनगर के नवाब तथा उत्तर से झज्जर के हाकिम के हमलों ने उसकी कमर तोड दी। अंत में भवानी सिंह के पास केवल एक छोटी सी जागीर बची रही।

बल्लभगढ़ रियासत

फर्रुखसियर के शासनकाल (1713-19 ई०) में बल्लभगढ़ के जाट चौधरी गोपालसिंह को अपना सरदार थे। वह एक वीर पुरुष थे। दिल्ली-आगरा मार्ग पर गोपालसिंह की गहरी पकड़ थी। वह आवश्यकतानुसार मुगल सेवाओं पर हर करते रहते थे। उनके हमलों से परेशान होकर अंततः बादशाह फर्रुखसियर ने उन्हें फरीदाबाद का चौधरी स्वीकार कर लिया। उने इस क्षेत्र से एकत्रित कर में से 1/8 भाग अपने पास रखने की अनुमति भी दे दी। गोपालसिंह का उत्तराधिकारी चरणदास था। वह अपने पिता से भी योग्य एवं साहसी था। चरणदास ने मुगलों का आधिपत्य मानने से इंकार कर दिया।

शाही सेना के साथ उसकी झड़प हुई तथा चरणदास को बंदी बना लिया गया। चरणदास के पुत्र बल्लभसिंह (बल्ल जाट) ने चतुराई से काम लिया तथा भरतपुर नरेश सूरजमल की सहायता से चरणदास को मुक्त करवा लिया। चरणदास ने चौधरी की पगड़ी बल्लभसिंह को पहनाकर चौधर उसे सौंप दी। धीरे-धीरे उसने फरीदाबाद से लेकर दिल्ली तक के क्षेत्र पर अपना अधिकार जमा लिया। बल्लभसिंह ने बल्लभगढ़ में दुर्ग बनाकर वहाँ अपने शासन का मुख्यालय स्थापित कर लिया।

भरतपुर शासकों की सहायता से उसने अपनी स्थिति काफी सुदृढ़ बना ली। परन्तु, 29 नवंबर, 1753 को अकीबत खाँ के नेतृत्व में बादशाह अहमदशाह और मराठों की सम्मिलित सेनाओं से संघर्ष करते हुए बल्लभ सिंह वीरगति को प्राप्त हो गया। अकीबत खाँ की सेनाओं ने बल्लभगढ़ दुर्ग पर भी कब्जा जमा लिया। उसने बल्लभगढ़ का नाम बदलकर निजामगढ़ कर दिया। परन्तु कुछ वर्षों के उपरान्त बल्लभसिंह के उत्तराधिकारियों ने भरतपुर नरेश सूरजमल को सहायता से बल्लभगढ़ को पुनः प्राप्त कर लिया। ये काल हरियाणा में उठापटक का काल था। फरीदाबाद और भरतपुर के बीच के क्षेत्र पर महाराज सूरजमल ने अधिकार कर लिया।

कानोंड तथा नारनौल के क्षेत्र पर जयपुर नरेश माधोसिंह ने अधिकार कर लिया। नजाबत खाँ ने कुरुक्षेत्र तथा करनाल के लगभग 150 गाँवों पर अधिकार करके कुंजपुरा को अपनी राजधानी बना लिया। हसन अली ने झज्जर पर कब्जा कर लिया। तावडू पर असदुल्ला खाँ तथा बहादुरगढ़ पर बहादुर खाँ का अधिकार हो गया। फतेहाबाद-सिरसा के क्षेत्र पर भट्टियों (मुहम्मद अमीर और हसन खाँ) ने कब्जा कर लिया। परन्तु, यह व्यवस्था कुछ ही दिन चल पाई।

25 अक्तूबर, 1754 को आलमगीर ने मराठों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उन्हें कुरुक्षेत्र का क्षेत्र प्रदान कर दिया। मराठों ने शीघ्र ही रोहतक तथा हिसार के एक बड़े भू-भाग पर कब्जा जमा लिया। 1754-55 ई. तक मराठे हरियाणा तथा उसके एक बड़े भू-भाग पर छा गए। परन्तु, महाराष्ट्र की स्थानीय परिस्थितियों के कारण मराठों को वापिस लौटाना पड़ा। 1756 ई० के अंत में पंजाब से होते हुए अब्दाली की सेनाएँ भारत में घुस आईं। अब्दाली ने अदीनाबेग को हराकर सरहिंद सरकार के अन्तर्गत पूरे उत्तरी हरियाणा पर अधिकार कर लिया। कुंजपुरा के नवाब ने 20 लाख रुपए देकर अपनी सत्ता बचाई।

16 जनवरी, 1757 को वह दिल्ली तक जा पहुँचा। 1 फरवरी, 1757 को उसने 20 हजार सैनिकों को फरीदाबाद पर हमला करने भेजा। मराठे और भरतपुर नरेश मिलकर लड़े परन्तु, हार गए। अफगान सेना ने फरीदाबाद को तहस-नहस कर दिया। परन्तु, अफगान सेनाएँ बल्लभगढ़ से आगे नहीं जा पाईं। उसने यहाँ जवाहरसिंह के नेतृत्व में भरतपुर की सेनाओं को हरा दिया तथा बल्लभगढ़ में खूब लूटपाट की। अप्रैल, 1757 में अब्दाली वपिस लौट गया। महाराज सूरजमल ने बल्लभगढ़ के क्षेत्र को पुनः अपने अधिकार में ले लिया।

पानीपत की तीसरी लड़ाई

1760 ई० में मराठों ने पुनः पंजाब पर अधिकार कर लिया। मजबूर होकर अब्दाली को काबुल छोड़कर पंजाब की ओर आना पड़ा। 1 नवंबर, 1760 ई० को मराठे और अहमदशाह अब्दाली की सेनाएँ पानीपत के मैदान में आ डटीं। मराठाओं का सेनापति पेशवा का चचेरा भाई सदाशिव राव भाऊ था। 14 जनवरी, 1761 को संक्रान्ति के दिन पानीपत में भयंकर युद्ध हुआ।

इस युद्ध में अब्दाली का पलड़ा भारी रहा। इस हार ने मराठा साम्राज्य की कमर तोड़ दी। परन्तु, विजय को अब्दाली भी नहीं भोग पाया। उसे वापिस लौटना पड़ा। वापिस लौटने से पूर्व उसने जीन्द, अंबाला, कुरुक्षेत्र तथा करनाल का क्षेत्र अपने सरहिंद के गवर्नर जैन खाँ को सौंप दिया। शेष क्षेत्र पर मुगल सेनापति नजीब ने अधिकार कर लिया।

सरहिन्द के क्षेत्र पर जैन खाँ की हुकूमत ज्यादा दिन नहीं चल पाई। अब्दाली के जाते ही पंजाब के क्षेत्र में सिखों ने हथियार उठा लिए। सिखों की निशालवालिया, अहलूवालिया, सिंहपुरिया, करोड़सिंधिया तथा शहीद आदि मिसलें (वृद्ध दल) और सुक्रचकिया, नकाई, भंगी, रामगढ़िया आदि मिसलें (तरुण दल) क्रमशः जस्सासिंह अहलुवालिया तथा हरिसिंह भंगी के नेतृत्व में उठ खड़ी हुईं।

जनवरी 1764 में सिखों के इन दोनों गुटों ने जन खाँ को मार डाला तथा सरहिंद पर अधिकार कर लिया। इस क्षेत्र को सिख सरदारों ने आपस में बाँट लिया। रामसिंह भंगी के पुत्रों ने वर्तमान जगाधरी-यमुनानगर का क्षेत्र कब्जा लिया। जस्सासिंह अहलूवालिया के हिस्से में नारायणगढ़ का क्षेत्र आ गया। साहिबसिंह तथा गुरुदत्त सिंह (दोनों भाई) ने लाडवा, इन्द्री, बबैन तथा शाहगढ के 117 गाँवों पर अधिकार कर लिया।

गजपतसिह ने जींद, सफीदों, पानीपत. तथा बाजीदपुर के क्षेत्र अपने अधिकार में ले लिए। 28 दिसंबर, 1765 को सिखों ने जवाहरसिह कसा मिलकर रेवाड़ी शहर में तांडव मचाया। इसके उपरान्त उन्होंने नारनौल तथा कानोंड (महेन्द्रगढ़) पर हमला किया, परन्तु, सखा पीछे हटना पड़ा। 1770 ई० में सिखों की सेनाओं ने दिल्ली पर भी हमला करने का प्रयास किया परन्तु, आपसी मतभदा का पीछे हटना पड़ा।

दक्षिण-पूर्व हरियाणा में जाट शक्ति का उदय

औरंगजेब के शासनकाल में जाटों को संगठित करने का श्रेय तिलपत निवासी वीर गोकुला को जाता है। इस वीर योद्धा ने इस कृषक समुदाय को एक सैन्य शक्ति के रूप में संगठित किया तथा शाही सेनाओं पर छापामारी आरंभ कर दी। 1670 ई. में वीर गोकुला मुगलों के हाथों वीरगति को प्राप्त हो गए। गोकुला की मृत्यु के उपरान्त राजाराम ने जाटों का नेतृत्व संभाला। इन्होंने गोकुला के बलिदान का प्रतिशोध लेने के लिए मुगलों पर लगातार हमले किए। 1688 ई. में वीर राजाराम के नेतृत्व में जाट सेना ने अकबर के मकबरे (सिकन्दरा) पर हमला करके यहाँ लूटपाट की। कुछ इतिहासकार बताते हैं कि इन्होंने अकबर की कब्र से उसकी अस्थियाँ निकालकर उसका दाह-संस्कार करवा दिया।

राजाराम को दण्डित करने के लिए औरंगजेब ने शहजादे बेदारबख्त को भेजा। इस युद्ध में 14 जुलाई, 1688 को जाट सेना का नेतृत्व करते हुए वीर राजाराम वीरगति को प्राप्त हुए। राजाराम के उत्तराधिकारी उनके भतीजे वीर चूडामन बने। राजाराम द्वारा जलाई गई संघर्ष की मशाल को उनके बाद चूडामन ने थाम लिया। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के उपरांत बहादुरशाह ने उनके राजनैतिक अस्तित्व को स्वीकार करते हुए भरतपुर राज्य को मान्यता दे दी। इस प्रकार भरतपुर राज्य की नींव पड़ी। जहाँदार शाह के शासनकाल में चूड़ामन ने भरतपुर की सीमाओं को दिल्ली तक विस्तृत कर लिया था। 20 अक्तूबर, 1721 को चूडामन का देहान्त हो गया।

भरतपुर को सुदृढ़ करने का काम उनके उत्तराधि कारी बदनसिह (1723-1755 ई.) ने आगे बढ़ाया। परन्तु, भरतपुर के वैभव को इतिहास में अमर करने का श्रेय बदन सिंह के उत्तराधिकारी महाराज सूरजमल (1755-64 ई.) को जाता है। महाराज सूरजमल को उनकी कूटनीतिक तथा रणनीतिक सूझबूझ के लिए ‘जाटों का प्लेटो’ भी कहा जाता है। वह वीरता तथा रणनीति में भरतपुर रियासत के सबसे योग्य शासक थे। उन्होंने बडी आसानी से मेवात, रोहतक तथा झज्जर के काफी बड़े क्षेत्र पर भरतपुर का ध्वज फहरा दिया।

महाराज सूरजमल ने हरियाणा का नवविजित क्षेत्र अपने पुत्र जवाहरसिंह को सौंप दिया। जवाहरसिंह की पहली भिड़त फर्रूखनगर के शासक मुसावी खाँ के नेतृत्व में बिलौचों से हुई। उसके साथ तावडू का सरदार असादुल्ला खाँ भी था। बिलौचों की सम्मिलित शक्ति के आगे जवाहरसिंह को वापिस लौटना पड़ा। उसने बिलौचों पर पुनः आक्रमण किया और 12 दिसंबर, 1763 ई० को जवाहरसिंह ने महाराज सूरजमल की सहायता से फर्रूखनगर के किले पर अधिकार कर लिया। उसने मुसावी खाँ को बंदी बनाकर भरतपुर के किले में डाल दिया। इसके पश्चात् महाराज सूरजमल ने मुगलों के प्रधान सेनापति नजीबुदौला पर चढ़ाई कर दी।

भरतपुर की सेनाओं का पलड़ा भारी चल रहा था परन्तु, 25 दिसंबर, 1764 को किसी ने धोखे से हिंडन नदी के किनारे महाराज सूरजमल की हत्या कर दी। उनके उत्तराधिकारी जवाहरसिंह इस विशाल साम्राज्य को नहीं संभाल पाए। महाराज सूरजमल के विरोधियों ने जवाहर सिंह पर चौतरफा हमले आरंभ कर दिए। अंततः भरतपुर रियासत का सूर्य अस्त होना आरंभ हो गया। मेवात, फर्रूखनगर, झज्जर आदि क्षेत्र एक-एक करके उसके हाथों से निकल गए। जवाहरसिंह के बाद भरतपुर की गद्दी पर राजकुमार नवल सिंह बैठे परन्तु, अब भरतपुर का वह राजनैतिक प्रभाव और वैभव नहीं बचा था। अक्तूबर 1765 में नजीबुदौला ने भिवानी पर आक्रमण किया।

स्थानीय जनता ने उसका डटकर विरोध किया परन्तु, अन्ततः जीत शाही सेना को ही मिली। भिवानी का क्षेत्र पुनः मुगलों ने कब्जा लिया। 31 अक्तूबर, 1770 को नजीब की मृत्यु हो गई। उस समय बादशाह शाह आलम प्रभावहीन होकर इलाहाबाद में अंग्रेजों की शरण में पड़ा था। नजीब के मरते ही मराठों ने भी दिल्ली का रूख किया। 6 जनवरी, 1772 को मराठों ने बादशाह शाह आलम को इलाहाबाद से लाकर पुनः राजधानी दिल्ली में सिंहासनारूढ़ कर दिया। वह मराठों की कठपुतली के सिवाय कुछ नहीं था। परन्तु, कुछ ही समय में मराठों के प्रभाव को खत्म करके मिर्जा नजफ खाँ दिल्ली दरबार का एकाधिकारी संचालक बन बैठा।

24 सितंबर, 1773 को नजफ खाँ ने नवल सिंह के खिलाफ सेना भेजी। भरतपुर की सेनाएँ मैदानगढ़ी के स्थान पर बहादुरी से लड़ी परन्तु, हार गई। 30 अक्तूबर 1773 को नजफ़ खाँ की सेनाओं ने नवल सिंह को पुनः हरा दिया। इस प्रकार दक्षिण-पूर्व हरियाणा से भरतपुर के जाट साम्राज्य के प्रभाव का अंत हो गया। नजफ खाँ ने यह क्षेत्र अपने एक सैन्य सरदार नजफ कुली खाँ को सौंप दिया। इसके उपरांत नजफ खाँ के निर्देश पर नजफकुली खाँ की सेनाओं ने जयपुर नरेश प्रतापसिंह से नारनौल-कानोड़ (महेन्द्रगढ़) का क्षेत्र छीन लिया। परन्तु, शीघ्र ही जयपुर नरेश प्रतापसिंह द्वारा बादशाह शाहआलम की अधीनता स्वीकार कर लिए जाने के उपरान्त यह क्षेत्र नजफखाँ को पुनः जयपुर नरेश को सौंपना पड़ा। जयपुर नरेश ने कानोड की गद्दी पर राजा बलवंत सिंह को पुनः विराजित कर दिया।

बलवंत सिंह ने हांसी और हिसार के क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया। इससे नाराज नजफकुली खाँ ने मित्रता के बहाने बुलाकर 4 सितंबर, 1779 को बलवंत सिंह के पुत्र को छलपूर्वक मार डाला। तत्पश्चात् नजफकुली खाँ ने कानोंड के दुर्ग को घेर लिया। रेवाड़ी के अहीर सरदार मित्रसेन तथा बेगम सामरू ने भी उसकी सहायता की। एक महीने की घेरे बंदी के पश्चात् कानोड़ के दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया। इसके बाद नजफ खाँ ने सोनीपत, भिवानी तथा रोहतक पर भी अधिकार कर लिया।

सिरसा तथा फतेहाबाद का क्षेत्र, जिसे भटियाना भी कहा जाता था, लंबे समय से भट्टी शासकों के अधीन था। भट्टी, राजपूत वर्ण से थे परन्त, इन्होंने मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में इस्लाम ग्रहण कर लिया था। नजफ खाँ ने सेना भेजकर भट्टियों को भी अपने अधिकार में कर लिया। अब हिसार का संपूर्ण क्षेत्र मुगलों के अधीन आ गया था।

भाटिटयों के बाद मिर्जा नजफ खाँ ने 1780-81 ई. में सिखों पर नियंत्रण करने की कारवाई शुरू कर दी। जब वह सिखों को बलपर्वत नियंत्रित नहीं कर पाया तो उसने सिखों के साथ संधि कर ली। नजफ खां ने सिखों को अंबाला, कुरुक्षेत्र और करनाल जिलों स्वामी मान लिया तथा पानीपत से दिल्ली तक के प्रदेश से ‘राखी’ वसूलने का अधिकार दे दिया। बदले में सिखों ने नजफ खाँसी मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण नहीं करने का वचन दिया। 26 अप्रैल, 1782 को मिर्जा नजफ खाँ का देहान्त हो गया। नजफकुली खाँ रेवाड़ी, गुड़गाँव, रोहतक का स्वतंत्र शासक बनकर गोकला से (रेवाडी) शासन चलाने लगा।

मिर्जा नजफ खां की मृत्यु के उपरांत असहाय शाहआलम को ग्वालियर के शासक महादजी सिंधिया की सहायता लेनी पड़ी। उसने महादजी सिंधिया को शाही सेना का प्रधान सेनापति औद दिल्ली राज्य का संचालक नियुक्त कर दिया। धीरे-धीरे सिंधिया ने सिखों, भट्टियों, नजफकुली खाँ आदि तमाम क्षेत्रीय शासकों को परास्त कर पूरे हरियाणा पर अधिकार कर लिया।

प्रशासनिक सहूलियत की दृष्टि से महादजी सिंधिया ने हरियाणा के क्षेत्र को चार जिलों में बाँट दिया। ये जिले थे

  • देहली जिलाः इस जिले में दिल्ली के आसपास का क्षेत्र आता था।
  • पानीपत जिलाः इस जिले में वर्तमान पानीपत, सोनीपत, कुरुक्षेत्र तथा करनाल जिलों का क्षेत्र आता था।
  • हिसार जिला: इस जिले में हिसार, फतेहाबाद, सिरसा और रोहतक के क्षेत्र आते थे।
  • मेवात जिलाः इसमें वर्तमान गुरुग्राम, रेवाड़ी, नारनौल और महेन्द्रगढ़ के क्षेत्र सम्मिलित थे।

प्रत्येक जिले का प्रशासनिक मुखिया राज्यपाल होता था जो अन्य छोटे अधिकारियों की सहायता से प्रशासन संभालता था। यह व्यवस्था 1794 ई. में महादजी सिंधिया की मृत्यु के समय तक कुशलतापूर्वक चलती रही। परन्तु, उसका भतीजा दौलतराव सिंधिया (महादजी का उत्तराधिकारी) अयोग्य सिद्ध हुआ। 1803 ई. तक उसकी लस्टम-पट्टम गाड़ी किसी तरह चलती रही। द्वितीय
आंग्ल-मराठा युद्ध में हार के उपरान्त 30 दिसंबर, 1803 को सर्जी अंजन गाँव की संधि के अनुसार उसे हरियाणा प्रदेश अंग्रेजों को सौंपना पड़ा।

हरियाणा में जार्ज टॉमस का उत्थान और पतन

हाँसी के इतिहास में जॉर्ज टॉमस को एक अजूबा ही कहा जा सकता है। वह 1756 ई. में आयरलैंड के एक साधारण से परिवार में जन्मा था। 1782 ई. में वह एक जहाज के नाविक के रूप में अपनी चतुराई के बल पर मद्रास पहुँचा। धीरे-धीरे वह निजाम की सेना में तोपची बन गया। 1787 ई० में जॉर्ज टॉमस दिल्ली आकर बेगम सामरू की सेना में भर्ती हो गया। अपनी चतुराई के बल पर वह सरधना की शासक बेगम सामरू का विश्वासपात्र बन बैठा।

बेगम ने उसके साथ अपनी एक गोद ली हुई बेटी का निकाह करके उसे टप्पल की जागीर सौंप दी। कुछ समय बाद उसने बेगम से बगावत कर दी। टप्पल से वह अपने 250 सैनिकों के साथ मेवात के मराठा सूबेदार अप्पा खांडेराव की सेवा में चला गया। यहाँ उसे सेना खड़ी करके मेवात में कर संग्रह की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1794 ई. में खाण्डेराव ने उसे झज्जर-पटौदी की जागीर का प्रशासक बना दिया। इसके बाद मराठा सरदार लखवा दादा ने जॉर्ज टामस को पानीपत, सोनीपत और करनाल के परगने भी जागीर के रूप में दे दिए।

जॉर्ज टॉमस की महत्त्वाकांक्षा ने उसे यहाँ भी नहीं रुकने दिया। उसने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। जॉर्ज टॉमस ने हांसी के ऐतिहासिक दुर्ग को अपनी राजधानी बना लिया। उसने अपनी सीमाओं का विस्तार करते हुए थोड़े ही समय में वर्तमान गुड़गाँव, रोहतक, सोनीपत, हिसार तथा भिवानी का एक बड़ा भू-भाग हथिया लिया। इस नवगठित राज्य में 14 परगने तथा 253 गाँव थे। इसके अलावा पाँच परगने (151 गाँव) उसे मराठों ने भी दे दिए। 1798 ई. में जॉर्ज टॉमस के अधिकार में कुल मिलाकर 800 गाँव तथा हिसार, हांसी, भिवानी, फतेहाबाद, टोहाना और जॉर्जगढ़ (जहाजगढ़) के स्थान थे। उसने हांसी में एक टकसाल बनवाई तथा “सिक्का-ए-साहिब’ के नाम से सिक्के चलाए।

1798 ई. तक उसने सफलतापूर्वक शासन किया। परन्तु, टॉमस की अति महत्त्वाकांक्षा उसे सिखों के साथ टकराव में ले आई। नवंबर 1798 में उसने जीन्द नरेश महाराज भागसिंह पर आक्रमण कर दिया। परंतु, सिख शक्ति के सामने विवश होकर उसे जीन्द से वापिस लौटना पड़ा। वह शातिर किस्म का शासक था। उसने हांसी लौटने की बजाय पुनः जीन्द पर आक्रमण करके जीन्द को कब्जा लिया। महाराज भागसिंह की बहन साहिब कौर के आह्वान पर पटियाला, नाभा, लाडवा तथा थानेसर की सम्मिलित सेनाओं ने फरवरी, 1794 में जॉर्ज टॉमस को जीन्द से खदेड दिया। काफी नुकसान झेलकर वह वापिस हांसी आ गया।

जनवरी, 1800 में उसने पटियाला पर आक्रमण करके लूटमार की। तत्पश्चात् जॉर्ज टॉमस ने सिरसा के भट्टियों को भी हरा दिया। सितंबर, 1801 में मराठा, फ्रेंच जनरल पैरों तथा सिखों ने एक संघ बनाकर झज्जर के निकट जॉर्ज टॉमस को घेर लिया। वह बहादुरी से लड़ा परंतु अंत में उसे विवश होकर रात के अंधेरे में भागना पड़ा। सिखों ने उसका पीछा किया। 23 सितंबर 1801 को जॉर्ज टॉमस ने फ्रेंच जनरल बोगेन के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। बोगेन ने उसका राज्य छीनकर उसे ब्रिटिश भारत में जान की अनुमति दे दी। जनवरी 1802 ई. में वह अनूप शहर चला गया तथा 22 अगस्त, 1802 को बहरामपुर के निकट उसकी मृत्यु हो गई।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *