उत्तर वैदिक काल में हरियाणा में सुधारवादी धर्म

Reformist religion in Haryana during the post-Vedic period

वैदिक काल तक हरियाणा के लोग सहज, धार्मिक तथा सरल जीवन जीते रहे परन्तु उसके बाद, विशेषतः महाभात काल के उपरान्त उनका धार्मिक जीवन काफी जटिल हो गया। पुरोहितों का बोलबाला हो गया तथा कर्मकाण्ड एवं कुरीतियाँ जीवन का अंग बन गईं। जब समाज में कर्मकाण्ड का व्यापार बहुत अधिक बढ़ गया तो इन धार्मिक जटिलताओं के विरोध में बौद्ध तथा जैन धर्म का विकास हुआ। महाराजा अशोक के प्रयत्नों से हिसार, करनाल, तोपरा तथा थानेसर आदि नगर बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण केन्द्र बन गए थे|

हरियाणा में बौद्ध धर्म का उत्थान

बौद्ध साहित्य से हमें पता चलता है कि गौत्तम बुद्ध स्वयं हरियाणा में आए थे। हरियाणा में महात्मा बुद्ध द्वारा पवित्र किए गए स्थानों में सर्वाधिक चर्चित कम्मासदम्म नाम का नगर माना जाता है। इस नगर में ठहर कर महात्मा ने अनेकों प्रवचन किए थे। कम्मासदम्म ही आधुनिक कैथल नगर है।

थानेसर (ठुल्लकोटि)

हरियाणा का दूसरा महत्वपूर्ण नगर जहाँ महात्मा बुद्ध ने आकर स्वयं प्रवचन दिए थे वह नगर था ठुल्लकोटि। तत्कालीन ‘ठुल्लकोटि’ नगर ही आधुनिक थानेसर शहर है। यहाँ का शासक रट्ठपाल महात्मा बुद्ध का शिष्य बना। चीनी यात्री यूनत्सांग के अनुसार थानेसर में तीन संघालय थे। थानेसर के उत्तर-पश्चिमी भाग में महाराजा अशोक द्वारा तीन सौ फुट ऊँचा स्तूप स्थापित किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। इस स्तूप में महात्मा बुद्ध की धातु की प्रतिमा रखी जाने का भी वृत्तांत इतिहास से मिलता है।

तोपरा (यमुनानगर)

यह ऐतिहासिक गाँव आधुनिक हरियाणा के यमुनानगर जिले में जगाधरी उपमण्डल में स्थित है। इस गाँव में सम्राट अशोक ने पत्थर के एक स्तम्भ की स्थापना की थी। सम्राट अशोक ने गुजरात की गिरनार की पहाड़ियों में इस स्तम्भ को बनाया था। इसकी लंबाई लगभग 42 फीट तथा चौड़ाई 2-5 फीट है। इस स्तम्भ पर ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में सात राजाज्ञाएँ खदी हुई हैं। 143 ई. में फिरोजशाह तुगलक इस स्तम्भ को दिल्ली ले गया। सम्राट अशोक द्वारा इस स्थान पर एक बौद्ध विहार बनवाए जाने के भी संकेत मिलते हैं।

सुघ (यमुनानगर)

यमुनानगर जिले का यह गाँव प्राचीनकाल में उत्तर भारत का एक प्रमुख शहर था। शिक्षा के क्षेत्र में पर गाँव पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध था। सुघ के ऐतिहासिक महत्त्व के विषय में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में कार्यरत एलेका कनिघम ने 19वीं सदी में बड़े विस्तार से लिखा था। सुघ के टीले का बड़ा ऐतिहासिक महत्व है। इस गाँव का रस पाणिनी ने अपनी पुस्तक अष्टाध्यायी में भी किया है। ह्यूनत्सांग के अनुसार सुघ नगर में पाँच बौद्ध विहार थे जिनमें लगभग हजार बौद्ध भिक्ष निवास करते थे। एक समय में भगवान बुद्ध ने सुघ नगर में स्वयं आकर प्रवचन किया था। इस नगर के पूर्वी द्वार के निकट यमुना नदी के तट पर सम्राट अशोक ने एक अन्य स्तूप का निर्माण करवाया था। इस स्तूप के चारों ओर कुल मिलाकर 12 स्तूप बने हुए थे। इनमे से एक स्तूप में भगवान बुद्ध के नाखून और बाल रखे गए थे। सुघ शहर के पश्चिम द्वार के बाहर एक बौद्ध स्तूप में महात्मा सारिपुत्र और आचार्य मौद्गाल्यन के नाखून और बाल रखे थे। सुघ के निकट टीले से महात्मा बुद्ध की मूर्तियाँ और वानर सेना के लगभग दो हजार वर्ष पुराने अवशेष आज भी मिलते रहते हैं।

अग्रोहा

हरियाणा पुरात्व विभाग के उत्खनन और बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि प्राचीन काल में अग्रोहा नगर बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए उत्खनन के दौरान यहाँ एक बौद्ध स्तूप और बौद्ध विहार के अवशेष मिले हैं। सम्राट अशोक ने कुणाल, धारसूल और सिरसा में बौद्ध विहारों का निर्माण करवाया था। सम्राट अशोक द्वारा अपनी उपदेशात्मक पत्थर की शिला फतेहाबाद जिले के कुणाल गाँव में स्थापित की गई। इसके अतिरिक्त गौतम बुद्ध रोहतक और कलानौर भी आए थे। उनके उपदेशों से यहाँ हजारों लोग लाभान्वित हुए। महात्मा बुद्ध के शिष्य रत्नपाल और शिष्याओं नन्दुतारा और मित्ताकली ने उनके सन्देश को दूर-दूर तक फैलाया। इतिहासकार मानते हैं कि लगभग छठी शताब्दी तक बौद्ध धर्म यहाँ प्रचलित रहा। चीनी यात्रियों फाह्यान (399 ई.), ह्यूनत्सांग (639 ई.) और वान हवेन त्से (657 ई.) ने अपने यात्रा वृत्तांत में हरियाणा में बौद्ध धर्म के प्रचलित होने का उल्लेख किया है। ह्यूनत्सांग जब हरियाणा में आया तो इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होने लगा था। सातवीं सदी में महाराज हर्ष के समय में बौद्ध धर्म को एक बार पुनः उभार मिला। पुष्पभूति सम्राट राज्यवर्धनऔर हर्षवर्धन बौद्ध धर्मी थे। हर्षवर्धन ने अपने राज्यकाल में तीसरी बौद्ध संगति बुलाई जो पूर्णतया सफल रही।

हरियाणा में जैन धर्म का उत्थान

प्रदेश में बौद्ध धर्म के पश्चात् जैन धर्म का भी काफी प्रभाव रहा। इस धर्म के प्रसार में जैन संत लोहाचार्य का स्थान काफी ऊँचा रहा है। उन्होंने अग्रोहा और उसके आस-पास के क्षेत्रों में जैन धर्म को खूब फैलाया। रोहतक में भी जैन धर्म का अच्छा प्रभाव रहा परन्तु बौद्ध धर्म की तुलना में जैन धर्म का प्रभाव यहाँ कम था। छठी-सातवीं सदी के उपरान्त जब बौद्ध धर्म का प्रभाव हरियाणा के क्षेत्र में क्षीण होने लगा तो जैन आचार्यों-जिनवल्लभ सूरी, हरिभद्र सूरी, अभयदेव आदि के प्रयासों से जैन धर्म का खूब प्रसार हुआ। मोहनबाड़ी, रोहतक, सिरसा आदि इसके प्रसिद्ध केन्द्र बन गए। परन्तु, मध्यकाल तक आते-आते जैन धर्म केवल कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित रह गया। प्राचीन हरियाणा में जैन धर्म के कुछ प्रमुख केन्द्र इस प्रकार थे

हरियाणा में जैन धर्म के कुछ प्रमुख केन्द्र और उनका महत्त्व

रोहतक

सातवीं सदी के आस-पास रोहतक जैन धर्म के एक बड़े केन्द्र के रूप में उभरा। रोहतक के खोखराकोट क्षेत्र से उत्खनन के दौरान जैन धर्म से संबंधित कई ऐतिहासिक मूर्तियाँ मिली हैं। यहाँ से जैन तीर्थांकर पार्श्वनाथ तथा महावीर स्वामी की मूर्तियां मिली हैं। इसके अतिरिक्त खोखराकोट से गोद में बच्चा लिए जैन मातृक तथा जैन सरस्वती की भी मूर्तियाँ उत्खनन के दौरान प्राप्त हुई हैं। इनमें से कुछ मूर्तियाँ यहाँ स्थित काली माता के मन्दिर में रखी गई हैं।

थानेश्वर (कुरुक्षेत्र)

किसी समय थानेश्वर नगरी जैन मुनियों की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र थी। यहाँ से एक जैन धर्मावलंबी के पास प्राचीन जैन मूर्तियाँ मिली हैं। श्री सुन्दर मुनि द्वारा रचित एक पुस्तक आज भी बीकानेर के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित है। आयुर्वेद पर आधारित इस पुस्तक पर स्थान के रूप में थानेश्वर व वर्ष 1645 अंकित है।

पिंजौर (पंचकुला)

एक समय पिंजौर जैन धर्म की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ से अनेकों जैन मूर्तिया
प्राप्त हुई हैं जिनमें चन्द्रप्रभ, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी की मूर्तियाँ प्रमुख हैं।

जीन्द

यहाँ अनेकों जैन अनुयायियों के घरों में प्राचीन जैन मूर्तियाँ सुरक्षित हैं। जीन्द से जैन तीर्थकर
आदिनाथ की धातु की प्रतिमा प्राप्त हुई थी। जिस पर 9वीं सदी का एक लेख भी उकेरा गया है।

सिरसा

10वीं शताब्दी के आस-पास सिरसा क्षेत्र में जैन धर्म का अच्छा-खासा प्रभाव था। सिरसा के आस-पास के क्षेत्रों से अनेकों जैन मूर्तियों के खण्डित अवशेष मिले हैं। इनमें से सिंहासन पर विराजित मूर्ति प्रमुख है जो खण्डित स्थिति में मिली है।
6. अस्थल बोहर (रोहतक)
रोहतक के निकट स्थित यह गाँव नाथ संप्रदाय का ऐतिहासिक केन्द्र है। अस्थल बोहर से जैन धर्म से संबंधित कुछ सामग्री भी प्राप्त हुई है। इसमें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ, शान्तिनाथ और चक्रेश्वरी की मूर्तियाँ प्रमुख हैं।

हांसी

हांसी में जैन धर्म को कोई राजकीय संरक्षण तो प्राप्त नहीं था परन्तु, मध्यकाल में इस क्षेत्र में अच्छी खासी संख्या में जैन धर्मावलंबी उपस्थित थे। यहाँ से जैन धर्म से संबंधित अनेकों धातु प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें जैन तीर्थंकर आदिनाथ, पार्श्वनाथ, धरणेन्द्र, कुबेर तथा यक्ष-यक्षिणियों की प्रतिमाएँ प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त जैन सरस्वती, पद्मावती तथा कुछ | पक्षियों की धातु प्रतिमाएँ भी हांसी में मिली हैं।

हरियाणा में कौरव वंश और महाभारत

वैदिक संस्कृति सरस्वती-द्वषद्वती नदी के कांठों से होते हुए गंगा-यमुना दोआब में फैल गई। इस दौरान इस क्षेत्र में कई राजनैतिक शक्तियाँ उभरी आर समय के साथ विलुप्त हो गई। अंततः पौरव वंश के प्रतापी राजा दुष्यंत ने यहाँ एक सुदृढ राज्य स्थापित किया। दुष्यंत के उत्तराधिकारी राजा भरत न अपन पराक्रम से अपने राज्य का विस्तार थानेसर से लेकर अवध तक कर लिया। उन्हीं के नाम से उनका वंश ‘भरतवंश’ कहलाया आर हमारा दश भारतवर्ष’। राजा भरत की छठी पीढी से राजा हस्ती हए जिन्होंने हस्तिनापुर नगर (जिला मेरठ) बसाया और इसे अपनी राजधाना बना लिया। राजा हस्ती के वंश में आगे चलकर महाराज संवरण हए। राजा संवरण के बाद उनका पुत्र कुरु सिंहासन बैठा और उनके नाम पर पौरव वंश का नाम ‘करुवंश’ हो गया। राजा करु ने सरस्वती तट पर स्थित थानेश्वर के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

वामन पुराण के अनुसार थानेसर के क्षेत्र में काफी क्षेत्र पर वन थे। इनमें काम्यक, अदिति, व्यास, शीत, सूर्य, मधु, और फलकी आदि प्रसिद्ध थे। राजा कुरु यहाँ आए और उन्होंने यहाँ कृषि यज्ञ आरंभ किया। वनों को साफ करके प्रजा को यहाँ बसने और कृषि कार्य के लिए प्रोत्साहित किया। एक पौराणिक कथा के अनुसार कुरु ने यहाँ सात-सात कोस तक स्वयं हल चलाया और घोर परिश्रम किया। कुरु की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान माँगने को कहा। कुरु ने वर माँगा, “जितनी दूर तक मैने हल चलाया उतनी दूर तक यह क्षेत्र धर्मक्षेत्र हो जाए।” तत्पश्चात यह भूमि ‘धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र’ कहलाने लगी। समय के साथ ‘धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र’ शिक्षा, आध्यात्म और ज्ञान का क्षेत्र बन गया। कुरु के वंशज शांतनु के समय में गांधार और पांचालों ने कौरवों पर आक्रमण किया। शांतनु के ज्येष्ठ पुत्र चित्रांगद और गांधारों के मध्य सरस्वती के तट पर कुरुक्षेत्र के मैदान में कुरुक्षेत्र का प्रथम युद्ध हुआ। इस युद्ध में पलड़ा तो कौरवों का भारी रहा परन्तु चित्रांगद वीरगति को प्राप्त हुआ।

राजा शांतनु के पश्चात् उसका पुत्र विचित्रवीर्य राजा बना। परन्तु. वह शीघ्र ही आकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ। नियोग से उसके दो पुत्र हुए-धृतराष्ट्र और पाण्डु। धृतराष्ट्र के जन्मान्ध होने के कारण पाण्डु को राजा बनाया गया। पांडु के अकाल मृत्यु के पश्चात घृतराष्ट्र को राज्य सौंप दिया गया। पारिवारिक कलह लगातार बढ़ते जाने के कारण धृतराष्ट्र ने कुरु राज्य को दो भागों में बाँट दिया। गंगा-यमुना के मध्य का क्षेत्र दुर्योधन के पास रहा। यमुना के पार अर्थात् हरियाणा का अधिकांश क्षेत्र पांडवों के पास आ गया। पांडवों ने इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) को अपनी राजधानी बना लिया।

पांडवों की बढ़ती शक्ति और महत्वाकांक्षा को देखकर दुर्योधन ने बहुचर्चित जुआ-कांड के माध्यम से पांडवों का समस्त राज्य जीत लिया। तत्पश्चात् कुरुक्षेत्र के मैदान पर ‘महाभारत का युद्ध’ कौरवों और पांडवों के मध्य लड़ा गया। इस युद्ध की मोर्चाबन्दी में दुर्योधन की सेनाएँ सरस्वती नदी से अमीन गाँव तक फैली थी और पांडवों की सेना पूर्व में सरस्वती नदी से लेकर पश्चिम में किरमिच नामक गाँव तक फैली थी। कुल मिलाकर 18 दिन तक चले इस विनाशाकारी युद्ध से पूर्व कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया।

महाभारत युद्ध में चर्चित कुछ स्थान

अमीन – द्रोणाचार्य द्वारा रचित चक्रव्युह को तोड़ते हुए इस स्थान पर अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुआ।

भोर – इस स्थान पर अर्जुन ने कौरव सेनापति भूरिश्रवा का वध किया।

अस्थिपुर – युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए यौद्धाओं का ‘दाह संस्कार’ एक ही स्थान पर सामूहिक रूप से किया गया। इस स्थान को अस्थिपुर के नाम से जाना जाता है।

इस यद्ध के पश्चात कुरुवंश लगभग नष्ट हो गया। महाभारत युद्ध के उपरान्त 36 वर्ष तक युधिष्ठिर ने शासन किया तथा उसके पश्चात् अर्जुन का पौत्र परीक्षित राजा बना।

महाभारत के बारे में कुछ मिथ

महाभारत के युद्ध और काल के विषय में अनेकों भ्रांतियाँ और प्रश्न हैं। कुछ विद्वान इस पूरे घटनाकम को ही काल्पनिक मानते हैं। कुछ विद्वान इसे हड़प्पा सभ्यता से पूर्व हुआ मानते हैं, कुछ छठी शती में ई०पू० में और कुछ तो इसे मध्यकाल में ला छोड़ते हैं। प्राचीन साहित्य तथा पुरातात्विक स्रोतों से ऐसे अनेकों प्रमाण मिलते हैं जिनके आधार पर महाभारत की घटनाओं को नकारा नहीं जा सकता। इस युद्ध के काल पर भी विभिन्न मत हैं। प्रो०के०सी० यादव के अनुसार डा०वी०वी० मिराशी तथा अन्य विद्वानों द्वारा निर्धारित तिथि अर्थात् 1400 ई० पू० का समय ही प्रमाणों तथा तथ्यों पर सटीक बैठता है।

महाभारत काल के उपरान्त नए गणतन्त्रों का उदय

महाभारत युद्ध के उपरान्त युधिष्ठिर ने लगभग 36 वर्ष राज किया। उसके उपरान्त वे अर्जुन के पौत्र परीक्षित को राज सौंप कर वन को चले गए। कुछ समय बाद पांडव सत्ता क्षीण हो गई। उनके स्थान पर यहाँ की जनता ने गणतान्त्रिक व्यवस्था कायम कर ली। युनानी इतिहासकार एरियन के अनुसार सिकन्दर के आक्रमण के समय यहाँ ऐसी ही व्यवस्था थी। संभवतः इसी गणतंत्रीय राज्य का नेता चन्द्रगुप्त था। चन्द्रगुप्त ने सिकन्दर के आक्रमण के उपरान्त तत्कालीन राजनैतिक स्थितियों का लाभ उठाते हुए अपनी स्थिति बहुत सुदृढ़ कर ली थी। पराक्रमी चन्द्रगप्त गणनेता नेपोलियन की तरह राजतन्त्रवादी शासक बन गया था। उसने पंजाब, हरियाणा सहित समस्त क्षेत्र को अपने निजी राज्य में परिवर्तित कर लिया। पूर्व में उसने मगध तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया था। यह घटना लगभग 324 ई०पू० की है। चन्द्रगुप्त ने लगभग 23 वर्ष तक शासन किया। चन्द्रगुप्त के बाद 302 ई०पू० से उसके पुत्र बिन्दुसार का राज रहा। बिन्दुसार के उपरान्त सम्राट अशोक (273 ई०प० 232 ई०पू०) आया। 324 ई०पू० से 232 ई०पू० तक हरियाणा मौर्य राज्य के अंतर्गत रहा। अशोक के बाद उसके उत्तराधिकारी दुर्बल सिद्ध हो और धीरे-धीरे जनता ने हरियाणा में गणतंत्रीय व्यवस्था कायम कर दी।

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