प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण

सार्वभौमीकरण का अर्थ होता है – सब के लिए उपलब्ध कराना। प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के अन्तर्गत देश के सभी बच्चों के लिए पहली से आठवीं कक्षा तक नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करने का उद्देश्य सुनिश्चित किया गया। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि इस अनिवार्य शिक्षा के लिए स्कूल बच्चों के घर के समीप हो तथा चौदह वर्ष तक बच्चे स्कूल न छोड़ें।

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, न्यूनतम शिक्षा स्तर, मध्याह्न भोजन स्कीम, पोषाहार सहायता कार्यक्रम, जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, सर्वशिक्षा अभियान, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, प्राथमिक शिक्षा कोष इत्यादि प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण से सम्बन्धित कुछ प्रमुख कार्यक्रम हैं।

सर्वशिक्षा अभियान – Education for all campaign

सर्वशिक्षा अभियान (एसएसए) प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण से सम्बन्धित प्रमुख कार्यक्रम है। इसे सभी के लिए शिक्षा अभियान के नाम से भी जाना जाता है। इस अभियान के अन्तर्गत ‘सब पढ़ें सब बढ़ें’ का नारा दिया गया है। सर्वशिक्षा अभियान भारत सरकार द्वारा 2000-01 में प्रारम्भ किया गया था। कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना की शुरुआत 2004 में हुई थी, जिसके अन्तर्गत समस्त लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा देने का सपना देखा गया था, बाद में यह योजना सर्व शिक्षा अभियान के साथ विलय हो गई।

सर्वशिक्षा अभियान के लक्ष्य

सर्वशिक्षा अभियान के अन्तर्गत निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किए गए थे।

  • विद्यालय, शिक्षा गारण्टी केन्द्रों, वैकल्पिक विद्यालयों या ‘विद्यालयों में वापस अभियान’ द्वारा वर्ष 2003 तक सभी बच्चों को विद्यालय में लाना।
  • वर्ष 2007 तक 5 वर्ष की आयु वाले सभी बच्चों की प्राथमिक शिक्षा पूरी करवाना।
  • वर्ष 2010 तक 8 वर्ष की आयु वाले सभी बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करवाना।
  • जीवन के लिए शिक्षा पर बल देते हुए सन्तोषजनक गुणवत्ता की प्रारम्भिक शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित करना।
  • वर्ष 2007 तक प्राथमिक चरण और 2010 तक प्रारम्भिक शिक्षा स्तर पर आने वाले सभी लिंग सम्बन्धी और सामाजिक श्रेणी के अन्तराल को खत्म करना।

सर्वशिक्षा अभियान की उपलब्धियाँ

  • सर्वशिक्षा अभियान की उपलब्धियाँ निम्न प्रकार रहीं सर्वशिक्षा अभियान के अन्तर्गत उन बस्तियों में नए स्कूल बनाने का प्रयास किया जाता है, जहाँ बुनियादी स्कूली शिक्षा की सुविधा नहीं है।
  • इसके अन्तर्गत अतिरिक्त कक्षा, पीने का पानी, शौचालय रखरखाव अनुदान और स्कूल सुधार अनुदान के माध्यम से वर्तमान स्कूलों के बुनियादी ढाँचे में सुधार करना है।
  • यह अभियान जीवन कौशल सहित गुणवत्ता युक्त प्रारम्भिक शिक्षा मुहैया कराता है।
  •  इस अभियान के अन्तर्गत लड़कियों एवं विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • इस अभियान के अन्तर्गत कम्प्यूटर शिक्षा पर बल दिया गया है।
  • इसके अन्तर्गत डिजिटल अन्तर को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।
  • बच्चों की उपस्थिति आशाजनक करने के उद्देश्य से मध्याह्न भोजन जैसी योजना की शुरूआत की गई है।
  • यद्यपि सर्वशिक्षा अभियान के फलस्वरूप विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में भारी कमी लाने में सफलता प्राप्त हुई है, किन्तु वर्ष 2010 तक यह सफलता लक्षित अनुपात तक प्राप्त नहीं हुई है
  • वर्ष 2010 तक सर्वशिक्षा अभियान का लक्ष्य पूरा होने के कारण केन्द्र सरकार के मानव संसाधन मन्त्रालय ने दिसम्बर, 2010 में यह निर्णय लिया था कि सर्वशिक्षा अभियान को शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू करने का प्रमुख साधन बनाया जाएगा। इसके लिए संशोधित सर्वशिक्षा अभियान से सम्बन्धित अधिनियम, 2011 में लागू किया जाएगा।

 

मध्याह्न भोजन स्कीम

मध्याह्न भोजन स्कीम की शुरुआत सर्वप्रथम भारत में तमिलनाडु से प्रारम्भ हुई, जिसका उद्देश्य सर्व शिक्षा अभियान को सफलीभूत (Successful) बनाना था। प्राथमिक कक्षाओं में नामांकन में वृद्धि हो तथा स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति में कमी हो इत्यादि को ध्यान में रखकर यह स्कीम शुरू की गई, जिसकी विशेषताएँ निम्न प्रकार वर्णित हैं

  • सुविधाहीन वर्गों से सम्बन्धित बच्चों के प्रवेश, उपस्थिति, प्रतिधारण एवं अध्ययन स्तरों में सुधार करके प्राथमिक शिक्षा के व्यापीकरण को बढ़ाने तथा प्राथमिक स्तर के छात्रों की पोषाहार स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से 15 अगस्त, 1995 को, पोषाहार समर्थन के राष्ट्रीय कार्यक्रम मध्याह्न भोजन स्कीम की शुरुआत की गई।
  • इस योजना के अन्तर्गत पहली से पाँचवीं कक्षा तक देश के राजकीय अनुदान प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले सभी बच्चों को 80% उपस्थिति पर प्रतिमाह 3 किग्रा गेहूँ अथवा चावल दिए जाने की व्यवस्था की गई थी, किन्तु इस योजना के अन्तर्गत छात्रों को दिए जाने वाले खाद्यान्न का पूर्ण लाभ छात्र को न प्राप्त होकर उसके परिवार को मिल जाता था, इसलिए 1 सितम्बर, 2004 से प्राथमिक विद्यालयों में पके-पकाए भोजन उपलब्ध कराने की योजना आरम्भ कर दी गई।
  • इस योजना के अन्तर्गत विद्यालयों में मध्यावकाश में छात्र-छात्राओं को सप्ताह में 4 दिन चावल से बने भोज्य पदार्थ तथा 2 दिन गेहूँ से बने भोज्य पदार्थ दिए जाने की व्यवस्था की गई है।
  • प्रत्येक छात्र/छात्रा के लिए प्रतिदिन 100 ग्राम खाद्यान्न से निर्मित सामग्री दिए जाने का प्रावधान है, जिसे पकाने के लिए परिवर्तन लागत की व्यवस्था भी की गई है।
  • पौष्टिकता सुनिश्चित करने के लिए यह तय किया गया है कि भोजन कम-से-कम 450 कैलोरी व 12 ग्राम प्रोटीन वाला हो। भोजन पकाने का कार्य ग्राम पंचायतों की देख-रेख में किया जाता है।
  • मध्याह्न भोजन वर्ष में कम-से-कम 200 दिनों तक उपलब्ध कराया जाएगा।

 

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009

  • शिक्षा का अधिकार (Right to Education) अधिनियम, 2009 राज्य, परिवार और समुदाय की सहायता से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करता है।
  • यह अधिनियम मूलत: वर्ष 2005 के शिक्षा के अधिकार विधेयक का संशोधित रूप है। वर्ष 2002 में संविधान के 86वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 21ए के भाग 3 के माध्यम से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया था। इसको प्रभावी बनाने के लिए 4 अगस्त, 2009 को लोकसभा में यह अधिनियम पारित किया गया, जो 1 अप्रैल, 2010 से पूरे देश में लागू हो गया।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम का महत्त्व

  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के क्रियान्वयन के बाद कक्षा-कक्ष आयु के अनुसार अधिक समजातीय है।
  • इसमें 6-14 वर्ष तक की आयु वर्ग के सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से प्रारम्भिक से माध्यमिक स्कूल तक की शिक्षा देने पर जोर दिया गया है इससे इस आयु वर्ग के बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होगा।
  • किसी प्रजातान्त्रिक देश में शिक्षित नागरिकों का बड़ा महत्त्व होता है। शिक्षा द्वारा ही आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हर स्तर पर जनशक्ति का विकास होता है।
  • शिक्षा के आधार पर ही अनुसन्धान और विकास को बल मिलता है। इस तरह शिक्षा वर्तमान ही नहीं भविष्य के निर्माण का भी अनुपम साधन है।
  • शिक्षा ही मनुष्य को विश्व के अन्य प्राणियों से अलग कर उसे श्रेष्ठ एवं सामाजिक प्राणी के रूप में जीवन जीने के काबिल बनाती है।
  • शिक्षा के इन्हीं महत्त्वों को देखते हुए भारत सरकार ने सबके लिए शिक्षा को अनिवार्य करने के उद्देश्य से शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित करने का एक प्रशंसनीय कार्य किया था।
  • इस अधिनियम का सर्वाधिक लाभ श्रमिकों के बच्चे, बाल मजदूर, विशेष आवश्यकता वाले बच्चे या फिर ऐसे बच्चों को मिलेगा, जो सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, भाषायी अथवा अन्य कारणों से शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।
  • इस अधिनियम के लागू होने के बाद यह आशा की जा सकती है कि विद्यालय छोड़ने वाले तथा पहले विद्यालय न जाने वाले बच्चों को अब प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो सकेगी।

शिक्षा के अधिकार अधिनियम की कमियाँ

शिक्षा के अधिकार अधिनियम की कमियाँ निम्नलिखित हैं

  • इस अधिनियम की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें 0-6 वर्ष आयु वर्ग और 14-18 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों की बात नहीं की गई है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते के अनुसार 18 वर्ष तक की आयु तक के बच्चों को बच्चा माना गया है, जिसे भारत सहित 142 देशों ने स्वीकृति प्रदान की है फिर भी 14-18 वर्ष आयु वर्ग की शिक्षा की बात इस अधिनियम में नहीं की गई है।

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