वंचित बालकों के प्रकार

Types of disadvantaged children

वंचित बालकों को उनकी पृष्ठभूमि के आधार पर निम्नलिखित भागों में बाँटा जाता है

सामाजिक दृष्टि से वंचित बालक  (Socially disadvantaged child)

  • व्यक्तिगत स्तर पर विभिन्न कारकों के क्रियाशील होने के कारण, एक व्यक्ति में अनेक आवश्यकताएँ जन्म लेती हैं। इसी प्रकार सामाजिक स्तर पर भी अनेक कारक क्रियाशील और प्रभावपूर्ण होते हैं। जिनके कारण भी एक बालक में अनेक विशेष आवश्यकताओं का जन्म होता है, जिनकी आपूर्ति निश्चय ही होनी चाहिए।
  • यद्यपि हमारा संविधान सभी के लिए समान शिक्षा की व्यवस्था के दायित्व का निर्वहन करने हेतु प्रतिबद्ध है परन्तु विद्यालय जाने की आयु वाले सभी बच्चों को आज भी यह अवसर उपलब्ध नहीं है।
  • स्कूली अवस्था के अनेक बच्चे पढ़ाई की सुविधा से वंचित रह जाते हैं तथा इसके अनेक कारण हो सकते हैं। इसके लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए; अधिक पाठशालाओं को खोलना, आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराना, निशुल्क शिक्षण की सुविधा प्रदान कराना (मुक्त शाला, अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र द्वारा) आदि का लाभ सामाजिक रूप से सुविधा वंचित बच्चों को दिया जा सकता है।
  • इन अनेक उपायों के रहते हुए भी निर्धनता एक ऐसा मूल कारण है जो भारतीय समाज में पिछड़े वर्ग की शिक्षा को विशेष रूप से प्रभावित करता है।
  • अत: उपरोक्त आधार पर हम ऐसे बालकों के विषय में कह सकते हैं कि

सामाजिक रूप से वंचित बालक वे होते हैं जो गरीबी, अशिक्षा, परिवार की खराब स्थिति के कारण वंचित रह जाते हैं। ये सामाजिक रूप से निम्न (जाति, वर्ग या धर्म के आधार पर) स्तर पर होते हैं।

 ऐसे बालक सांस्कृतिक रूप से भी निम्न स्तर पर होते हैं। 

इन्हें घर के खराब माहौल एवं असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। इन पर पड़ोस के परिवेश का दुष्प्रभाव होता है।

ये संवेगात्मक रूप से अस्थिर होते हैं।

आर्थिक दृष्टि से वंचित बालक (Financially disadvantaged child)

ऐसे बालकों में वे बालक आते हैं, जो आर्थिक दृष्टि से काफी पिछड़े होते हैं इनके परिवार के आर्थिक हालात बेहतर नहीं होते हैं जिसके कारणवश ऐसे बालकों को शिक्षण सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। ऐसे बच्चों के विषय में कहा जा सकता है कि

  • आर्थिक असमानता के कारण ऐसे बालकों को गरीबी का सामना करना पड़ता है। ये आर्थिक रूप से भिन्न होते हैं।
  • इनके परिवार में खाने व रहने के स्थान का अभाव होता है।
  • ये विद्यालय जाने में असमर्थ होते हैं क्योंकि ये विद्यालय की फीस नहीं दे पाते।

अनुसूचित जाति के बालक (Scheduled Caste Boys)

यह जाति भारतीय समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जिसे परम्परागत रूप से निम्न कोटि का समझा जाता है। यह वर्ग शैक्षिक तथा सामाजिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। ‘अनुसूचित जाति’ शब्द का सम्बन्ध उन जातियों से समझा जाता है जिन्हें पहले अछूत माना जाता था।

  • इसका मूल कारण यह समझा जाता था कि अनुसूचित जाति के लोग अस्वच्छ और निम्न स्तर के समझे जाने वाले कार्य, जैसे सफाई करना, झाड़ लगाना, मैला उठाना, जूता बनाना आदि कार्यों से जुड़े हुए हैं।
  • इसके साथ ही अनुसूचित जाति के लोगों को जाति से बहिष्कृत समझा जाता था। उन्हें जन सुविधाओं; जैसे कुआँ, नदी, मन्दिर आदि के उपयोग करने की अनुमति नहीं थी।
  • सबसे चिन्तनीय स्थिति यह रही है कि इस वर्ग के लोगों को सभी प्रकार की शिक्षा से वंचित रखा गया था, जिसके कारण इनकी अवस्था में परिवर्तन नहीं आ सका है। ये आज भी सामाजिक गतिशीलता से वंचित रहे हैं। आज भी वे परम्परागत कार्यों का त्याग करके, अन्य कुशल कार्यों को अपनाने में असमर्थ पाए जाते हैं।

अनुसूचित जनजाति के बालक (Scheduled Tribe Boys)

भारत में अनुसूचित जनजाति के लोग प्रायः उन छोटे और बिखरे हुए गाँवों और गलियों में रहते हैं, जो सामान्य पहुँच के बाहर हैं। परिणामस्वरूप इन जनजातियों की दिन-प्रतिदिन की सुविधाएँ; जैसे-भोजन, वस्त्र, आश्रय और शिक्षा आदि की आपूर्ति करना कठिन है। अनुसूचित जनजाति के बालकों की शिक्षा के खराब स्तर के कारणों के पीछे कुछ प्रमुख तत्व निम्नवत् हैं

  • विद्यालय में अनुसूचित जनजाति के बालकों की कम संख्या।
  • अध्यापकों में उनके शिक्षण के प्रति उदासीन रवैया।
  • पाठ्य-पुस्तकों में उनकी स्थानीय बातों व उदाहरणों की कमी होना।
  • बौद्धिक क्षेत्र में उनका पिछड़ा होना।
  • पारिवारिक गरीबी
  • अनुसूचित जनजाति की शिक्षा का प्रचार-प्रसार न होना।

 

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