बच्चों के सीखने के प्रकार

Types of children learning

बच्चों के सीखने के तरीकों पर सबसे पहले अध्ययन करने वाले दो प्रमुख व्यक्ति थे। स्विट्जरलैण्ड के जीन पियाजे और रूस के एल.एस. वाइगोत्स्की उन्होंने बच्चों का अवलोकन करके परिकल्पना बनाई कि बच्चे कैसे सीखते हैं और परिकल्पना की जाँच की। इस प्रक्रिया में उन्होंने रचनावाद के सिद्धान्त की रचना की। बच्चे ठोस अनुभवों से बारम्बार सम्पर्क के जरिए सीखते हैं। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने सीखने के कई प्रकारों का वर्णन किया है जैसे

ऊसूबेल ने सीखने के निम्नांकित चार प्रमुख प्रकार बताए हैं

  •  अभिग्रहण द्वारा सीखना-  इस तरह के सीखने में शिक्षार्थी को सीखने वाली सामग्री बोलकर या लिखकर दे दी जाती है और शिक्षार्थी उन सामग्रियों को आत्मसात कर लेता है।
  • अन्वेषण द्वारा सीखना-  अन्वेषण द्वारासीखना ऐसे सीखने को कहा जाता है जिसमें शिक्षार्थी को दी गई सामग्रियों में से नया सम्प्रत्यय या कोई नया नियम या विचार की खोज कर उसे सीखना होता है।यदि छात्र किन्हीं ज्ञात तथ्यों को पुनर्संगठित कर या कोई प्रयोग कर किसी नए नियम की खोज करता है, तो उसे एक ऐसा अन्वेषण सीखना कहा जाएगा जो अर्थपूर्ण प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न हुआ हो।
  • रटकर सीखना-  वैसे सीखने को कहा जाता है जिसमें शिक्षार्थी दी गई सामग्रियों के साहचर्य शब्दश: तथा मनमाने ढंग से उसके आशय को बिना समझे हुए सीखता है। निरर्थक पदों को सीखना, शब्दों के जोड़े को सीखना, अक्षर-अंक जोड़ों को सीखना इस श्रेणी के सीखने के उदाहरण हैं।
  • अर्थपूर्ण सीखना –  ऊसूबेल के अनुसार, इस तरह का सीखना शिक्षा के लिए विशेष महत्त्व रखता है। इसलिए शिक्षकों ने इस तरह के सीखने पर अधिक बल डाला है। अर्थपूर्ण सीखना वैसे सीखने को कहा जाता है जिसमें सीखी जाने वाली सामग्री के सार तत्व को एक नियम के अनुसार समझकर तथा उसका सम्बन्ध गत ज्ञान से जोड़ते हुए सीखा जाता है।

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