वंशानुक्रम एवं वातावरण का सम्बन्ध

The Relationship Between Ecology and the Environment

वंशानुक्रम तथा वातावरण, एक-दूसरे से पृथक् नहीं हैं। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। बीज तथा खेत जैसा इनका सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरे की सार्थकता नहीं है। स्वस्थ बीज तभी स्वस्थ पौधे का रूप धारण कर सकता है, जब वातावरण स्वस्थ एवं सन्तुलित हो। अच्छी खाद, समय पर पानी, धरती की तैयारी, निराई-गुड़ाई आदि वातावरण की सृष्टि करती हैं। लैण्डिस ने इसीलिए कहा है “वंशानुक्रम हमें विकसित होने की क्षमताएँ प्रदान करता है। इन क्षमताओं के विकसित होने के अवसर हमें वातावरण से मिलते हैं, वंशानुक्रम हमें कार्यशील पूँजी देता है और परिस्थिति हमें इसको निवेश करने के अवसर प्रदान करती है।”

मैकाइवर एवं पेज ने वंशानुक्रम एवं वातावरण, दोनों के महत्त्व को स्वीकार किया है। इन्होंने लिखा है “जीवन की प्रत्येक घटना दोनों का परिणाम होती है। किसी भी निश्चित परिणाम के लिए एक उतनी ही आवश्यक है जितनी कि दूसरी। इन दोनों में से कोई भी न तो हटाई जा सकती है और न ही कभी पृथक् की जा सकती है।

वुडवर्थ तथा मारेक्विस के मतानुसार, “व्यक्ति, वंशानुक्रम तथा वातावरण का योग नहीं, गुणनफल है।”

विकास की किसी अवस्था में बालक या व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक विशेषताओं की व्याख्या करने के लिए साधारणत: वंशानुक्रम और वातावरण शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

वातावरण सम्बन्धी परीक्षणों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि समान वंशानुक्रम और समान वातावरण होने पर भी बच्चों में विभिन्नता होती है। अत: बालक के विकास पर न केवल वंशानुक्रम का वरन् वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। इसकी पुष्टि करते हुए क्रो व क्रो ने लिखा है “व्यक्ति का निर्माण न केवल वंशानुक्रम और न केवल वातावरण से होता है। वास्तव में वह जैविक दाय और सामाजिक विरासत के एकीकरण की उपज है।”

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