हरियाणा में प्रतिहार तोमर तथा चौहानों का सत्ता संघर्ष

The power struggle of Pratihar Tomar and Chauhans in Haryana

647 ई० म महाराजा हर्षवर्धन की मत्य के पश्चात उत्तर भारत में लंबे समय तक अराजकता का वातावरण बना रहा। इसका लाभ उठाते हए कई शक्तियाँ इस क्षेत्र में अधिकार के लिए संघर्ष करती प्रतीत होती हैं। अनंगपाल नामक तोमर शासक ने (736 ई०) दिल्ली और इसके आस-पास के क्षेत्र पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली।
लगभग इसी काल में कन्नौज में राजा यशोवर्मन का उदय हआ और उसने तोमरों को अपना अधिपत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। परन्तु हरियाणा पर यशोवर्मन का अधिकार कुछ समय ही रहा और उसे कश्मीर के शासक ललितादित्य मुक्तपीड़ ने हराकर इस क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया। ललितादित्य के उत्तराधिकारी अयोग्य थे इसलिए ललितादित्य की मृत्यु के पश्चात् इस क्षेत्र में पुनः अराजकता की स्थिति पैदा हो गई।

प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों का सत्ता संघर्ष

ललितादित्य के उपरान्त फैली अराजकता की स्थिति का लाभ उठाते हुए कन्नौज के तत्कालीन प्रतिहार शासक वत्सराज (775-800 ई०) ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। प्रतिहारों के विषय में इतिहासकार एकमत नहीं है। डा०सी०वी० वैद्य और पं० गौरीशंकर हीराचंद ओझा इन्हें विशुद्ध भारतीय (आर्य) रघुवंशी मानते हैं। प्रतिहारों की कई शाखाएँ थी। वे उज्जैन शाखा से थे। कन्नौज उनकी सत्ता का केन्द्र था। हरियाणा में जोधका (सिरसा) से मिले 795 ई० के एक शिलालेख से उनके हरियाणा पर अधिकार होने का उल्लेख मिलता है। वत्सराज ने गल्ल नाम के तोमर सरदार को यहाँ का प्रशासक बना दिया था। शीघ्र ही राष्ट्रकूटों ने वत्सराज को यहाँ से निष्कासित कर दिया। तोमरों ने इस स्थिति का लाभ उठा कर पुनः अपनी शक्ति बढ़ा ली। परन्तु तोमर शासकों को पालवंशीय शासक धर्मपाल ने हराकर अपने अधीन कर लिया। कुछ समय पश्चात् प्रतिहार नरेश वत्सराज के पुत्र नागभट्ट ने हरियाणा और कन्नौज पर पुनः अधिकार कर लिया। 833 ई० में नागभट्ट की मृत्यु के पश्चात् उसके पत्र रामभद्र के शासन काल (833-836 ई०) में अराजकता बनी रही। उसके पुत्र मिहिरभोज (836-885 ई०) ने अपनी शक्ति और बुद्धिमता के बल पर पुनः एक शक्तिशाली प्रतिहार साम्राज्य की स्थापना की।

मिहिरभोज के शासन काल में पेहवा एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र था। यहाँ प्रतिवर्ष घोड़ों का मेला लगता था। पेहवा से मिले 882 ई० के एक शिलालेख से पता चलता है कि यहाँ के व्यापार से जो कर प्राप्त होता था वह मन्दिरों को दान के रूप में चला जाता था।
885 ई० में भोज के उपरान्त उसका पुत्र महेन्द्रपाल सिंहासनारूढ़ हुआ। महेन्द्रपाल भोज की भांति एक कुशल प्रशासक सिद्ध नहीं हुआ। पेहवा के एक अभिलेख से पता चलता है कि उसके शासनकाल में हरियाणा का कुछ क्षेत्र उसके आधिपत्य से निकल गया था। इसी अभिलेख में जौल नामक तोमर सरदार की वीरता का भी उल्लेख मिलता है। जौल का पुत्र वज्रट भी अपने पिता की भांति वीर और योग्य सरदार था जिसके नेतृत्व में हरियाणा की व्यवस्था चलती थी। वज्रट का पुत्र जज्जुक था। वह भी एक योग्य सरदार था। 910 ई० में महेन्द्रपाल की मृत्यु के उपरान्त पैदा हुई अस्थिरता की स्थिति का लाभ उठाते हुए जज्जुक के पुत्रों गोगा, पूर्णराज और देवराज ने हरियाणा और इसके आस-पास के क्षेत्रों में एक स्वतंत्र तोमर शासन की नींव रखी।

तोमर वंश और हरियाणा

अन्य जातियों और वंशो की तरह तोमरों की उत्पत्ति के विषय में भी विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किए हैं। मुगल बादशाह शाहजहाँ के समय के तोमर इतिहासकार खड्गराय के अनुसार तोमर ‘सोमवंशी क्षत्रिय’ थे। 1631 ई० के एक शिलालेख में भी इन्हें ‘सोमवंशी क्षत्रिय’ और पाण्डवों का वंशज कहा गया है। इस विषय पर अधिकतर विद्वानों का भी यही मत है। तोमर, राजपूतों के 26 कुलों (वंशों) में विशेष स्थान रखते हैं। इतिहासकारों के अनुसार तोमर, तोवर, कुँवर तथा तंवर शब्द एक ही हैं तथा ये तोमरों के लिए ही प्रयोग होते हैं।
पेहवा के शिलालेख से तोमरों के एक राजनैतिक शक्ति के रूप में उदय के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इस शिलालेख के अनुसार जौल एक स्वतंत्र शासक नहीं था। जौल, तोमर राजा अनंगपाल की 5वीं पीढ़ी में पैदा हुआ था। अनंगपाल ने छोटे से तोमर राज्य की नींव रखी थी। इस राज्य की राजधानी उसकी बसाई हुई नगरी ढिल्लिका (दिल्ली) थी। जौल की मुद्राएँ मिलती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जौल ने कुछ समय के शासन के उपरान्त प्रतिहारों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। जौल के उपरान्त उस की तीसरी पीढ़ी में पैदा हुए आपृच्छदेव (गोग्ग) की मुद्राएँ मिलती हैं। उसने तीन पीढ़ियों के पश्चात् पुनः सत्ता प्राप्त की थी। उसका उत्तराधिकारी पीपलराजदेव (897-919 ई०) था।

पीपलराजदेव की भी मुद्राएँ मिलती हैं जिससे सिद्ध होता है कि वह एक स्वतंत्र शासक था। उसके बाद तीन राजाओं, रघुपाल (919-940 ई०), विल्हणपाल (940-961 ई०) और गोपाल (961-967 ई०) की कोई मुद्रा नहीं मिलती। इसका अर्थ है कि ये तीनों स्वतंत्र शासक नहीं थे।
इस काल की राजनैतिक अवस्था और तोमर-चौहान संघर्ष के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी हर्षनाथ (973 ई०) के एक शिलालेख पर मिलती है। इस शिलालेख में पीपलराजदेव (897-919 ई०) और विलहणपाल (940-961 ई०) के साथ शाकंभरी के चौहान नरेशों के संघर्ष
और तोमर शासकों की हार के संकेत हैं।

तोमर नरेश पीपलराज को उनके समकालीन चौहान नरेश चंदन ने हराया और पीपलराज उसका ‘करद’ राजा हो गया। पीपलराज के उत्तराधिकारी रघुपाल और विल्हण भी इसी अवस्था में रहे। विल्हणपाल के उत्तराधिकारी गोपाल (961-979 ई०) ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए पुनः चौहान नरेश सिंहपाल से युद्ध किया परन्तु वह असफल रहा। गोपाल के उपरान्त उसके उत्तराधिकारी सल्लक्षणपालदेव 1997-1005 ई०) की मद्राएँ भी प्राप्त हुई हैं। संभवतः तुको के आक्रमण के डर से ‘चौहान-तोमर सन्धि’ हुई। पंजाब के हिन्दशाही राजा जयपाल के निमंत्रण पर बना प्रथम राजपूत संघ जिसमें दिल्ली और अजमेर के शासक भी शामिल थे, ऐसी सन्धि के बाद ही अस्तित्व में आ सकता था।

 

तुर्क आक्रमण

सलमाणपाल के बाद जयपाल (1005-1021 ई०) उसका उत्तराधिकारी बना। जयपाल के शासन काल में तुर्क आक्रमणों की बाढ सी. सन 1000 ई० में महमद गजनवी ने थानेसर पर आक्रमण किया। शाहबाद के पास ही मारकण्डा नदी के तट पर जयपाल तोमर और 1 गजनवी की सेनाओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में महमूद विजयी रहा। यद्यपि इस हार के उपरान्त भी 1021 ई० तक जयपाल थाने पर शासन करता रहा। इस युद्ध में जीत के उपरान्त महमूद ने थानेसर में भयंकर लूटपाट की और हिन्दू मन्दिरों को तोड़ा। महमद के दरबार कवि और लेखक अल-बरूनी ने अपनी पुस्तक ‘किताब-उल-हिन्द’ में थानेसर की भव्यता और सुन्दरता का वर्णन किया है। अल-बरूनी के अनसार उस समय थानेसर हिन्दुओं का प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्र था। थानेसर के लक्ष्मी नारायण मन्दिर में चक्रस्वामी की कांस्य की मूर्ति (हाथों में चक लिए देवता) स्थापित थी।

महमूद गजनवी ने थानेसर के विष्णु मन्दिर को भी काफी क्षति पहुँचाई। सन् 1021 में तोमर शासक कमारपाल (1021-51 ई०) ने सत्ता संभाली। कुमारपाल के शासन काल में सन् 1043 ई० में महमूद के पौत्र मादूद ने आक्रमण किया। तोमर, चौहान परमार और कालचुरियों के सम्मिलित संघ ने थानेसर में मादुद की सेनाओं का सामना किया। इस घमासान युद्ध में विजय क्षत्रियों के सम्मिलित संघ को मिली। इस प्रकार थानेसर को गजनवी शासन से मुक्ति मिली। कुमारपाल के बाद 1051 ई० में अनंगपाल द्वितीय सिंहासन पर बैठा। वह एक पराक्रमी शासक था। उसने वर्षों के तुर्क आक्रमणों से अव्यवस्थित हो चुके तोमर साम्राज्य को न केवल संगठित किया बल्कि प्रशासन को भी सुदृढ़ किया। अनंगपाल द्वित्तीय ने अपनी राजधानी की दशा को सुधारा। महरौली की लोहे की लाट भी उसी ने दिल्ली में मंगवा कर (1052 ई०) में गड़वाई थी। फरीदाबाद के पास सूरजकुण्ड भी अनंगपाल ने ही बनवाया था। अनंगपाल ने 1081 ई० तक शासन किया। परन्त. उसका उत्तराधिकारी तेजपाल (1081-1105 ई०) एक कायर और निकम्मा शासक सिद्ध हुआ। तेजपाल के शासनकाल में गजनी के सुलतान इब्राहिम ने आक्रमण किया। परन्तु, तेजपाल ने मुकाबला करने की बजाय उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

चौहानों का अभ्युदय

तोमर राज्य जब पतन की ओर अग्रसर हो रहा था तब राजस्थान की ओर से शाकंभरी के चौहानों ने हरियाणा और दिल्ली में अपना भाग्य आजमाना चाहा। इतिहासकार इन्हें ‘अग्निकुल राजपूत’ मानते हैं। चौहानों ने मध्यकाल में अपनी शक्ति को बढ़ा कर राजस्थान में कई ठिकाने बना लिए थे। शाकंभरी शासक वीर भी थे और महत्वाकांक्षी भी। 1139 ई० के आस-पास चौहान नरेश अरूणराज जिसने ‘महाराजाधिराज परमेश्वर श्री’ की उपाधि धारण कर रखी थी, अपनी सेनाओ के साथ हरियाणा की ओर बढ़ा। अरूणराज चौहान ने तोमरों को हराकर तोमर राज्य को अपने ‘करद राज्य’ में परिवर्तित कर दिया। आंतरिक प्रशासन तोमरों के हाथ ही रहा। तोमरों को जब भी चौहानों के साथ विद्रोह का अवसर मिला वे चौहानों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजा देते थे। अंत में विग्रहराज चतुर्थ ने तोमरों को बुरी तरह हराया और हांसी के प्रसिद्ध दुर्ग पर कब्जा करके उन्हें शक्तिहीन कर दिया। परन्तु, विग्रहराज चतुर्थ ने भी तोमरों के पास सामंती के अधिकार बने रहने दिए।

भादानकों का उदय और संघर्ष

हर्षोत्तर काल में हरियाणा में कई छोटी-छोटी शक्तियाँ उभर कर आई। इनमें दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र के भादानक भी थे। वर्तमान हरियाणा का रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़, गुड़गाँव और राजस्थान का अलवर का क्षेत्र भादानकों के अधीन था। महाभारत में भादानकों का उल्लेख रोहतक-अग्रोहा तथा घग्घर और सतलुज के बीच में स्थित मालव लोगों के साथ हुआ है। प्राचीनकाल में ये लोग ‘भद्र’ कहलाते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार दशरथ शर्मा मानते हैं कि भादानक संभवतः अहीर जाति से संबंध रखते थे। कुछ विद्वान बहुधान्यक का बिगड़ा रूप ‘भादानक’ मानते हैं। चौहान नरेश अरूणराज ने तोमरों को हराने के उपरान्त भादानकों के क्षेत्र पर भी आक्रमण किया था। परन्तु, अरूणराज के एक भी शिलालेख में भादानाकों का उल्लेख ना मिलने से यह प्रतीत होता है कि भादानकों ने बिना लड़े ही अरूणराज की अधीनता स्वीकार कर ली थी। अरूणराज की मृत्यु के बाद जब चौहानों में सत्ता संघर्ष चला तो इस अस्थिरता का लाभ उठाते हुए भादानकों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली।

1151 ई० में जब विग्रहराज चतुर्थ राजा बना तो उसने भादानकों पर आक्रमण किया और उनको पराजित करके अपनी अधीनता स्वीकार करने का बाध्य किया। विग्रहराज की मृत्यु के उपरान्त भादानक पुनः स्वतंत्र हो गए। पृथ्वी राज तृतीय ने अपने राज्यारोहण के लगभग तान व उपरान्त भादानको को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस प्रकार से भादानकों की सत्ता का अन्त हो गया और संपूर्ण हरियाणा पृथ्वाराज चौहान के नियंत्रण में आ गया।

पृथ्वीराज (तृतीय) चौहान और मुहम्मद गौरी के आक्रमण

मुहम्मद गौरी, अफगानिस्तान में एक छोटे से राज्य गौर का शासक था। वह प्रकृति से ही धूर्त, कट्टरपंथी और महत्वाकाक्षी व्याक्त 1175 ई० से 1186 ई० तक भारत पर कई आक्रमण किए और अंततः पंजाब पर अधिकार कर लिया। हरियाणा और दिल्ला पर पृथ्वीराज चौहान का शासन था। पृथ्वीराज चौहान एक वीर शासक था। 1191 ई० में पथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के मध्य करनाल के तरावड़ी नामक स्थान पर भयंकर युद्ध हुआ। यह युद्ध ‘तराइन के प्रथम युद्ध’ के नाम से जाना जाता है।

इस युद्ध में हरियाणा के राज्यपाल गोविन्दराय ने अभूतपूर्व वीरता का प्रदर्शन करते हुए मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया। मुहम्मद गौरी को एक खिलजी सरदार भगा ले गया और साथ ही अफगान सेना भी युद्ध छोड़कर भाग खड़ी हुई। मुहम्मद गौरी ने पुनः एक वर्ष तक युद्ध की तैयारी की। 1192 ई० में तरावड़ी में पुनः युद्ध हुआ। इसे ‘तराईन का दूसरा युद्ध’ कहा जाता है। इस युद्ध में मुहम्मद गौरी ने छल और कूटनीति के साथ संघर्ष किया। पृथ्वीराज चौहान के अनेक राजपूत यौद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। सरस्वती नदी के किनारे पृथ्वीराज शत्रु द्वारा पकड़ लिया गया। जिसे शहाबुद्दीन ने तुरन्त मार डाला।

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के उपरान्त अफगान सेना ने हरियाणा को रौंदने का प्रयास किया परन्तु, उन्हें हर जगह संघर्ष और विरोध का सामना करना पड़ा। इस विरोध का सर्वाधिक सशक्त रूप हांसी-हिसार क्षेत्र में देखने में आया। वहाँ के वीर जाटवां (राजपूत) सरदार के नेतृत्व में भयंकर संघर्ष हुआ। वीर जनता ने पूरी ताकत से संघर्ष किया परन्तु, अंत में जाटवां सरदार वीर गति को प्राप्त हुआ। हांसी के उपरान्त सिरसा, महम, रोहतक आदि स्थानों पर भी ऐसे ही संघर्ष हुए। अहीरवाल की जनता ने यहाँ के राज्यपाल तेजपाल के नेतृत्व में अफगानों के छक्के छुड़ा दिए। रेवाड़ी में अफगान सेना हार गई और अफगान सेनापति इब्राहिम बारहहजारी मारा गया। यह सूचना पाकर मुहम्मद गौरी ने तेजपाल से युद्ध के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक को भेजा। इस युद्ध में तेजपाल और उसके अनेक योद्धा मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। ऐसा ही विरोध मेवात क्षेत्र में भी हुआ।

मेवात के राज्यपाल हेमराज के नेतृत्व में मेवातियों ने डटकर मुकाबला किया और अफगान सेनापति बजहुद्दीन को मौत के घाट उतार दिया। रेवाड़ी की तरह यहाँ भी कुतुबुद्दीन ऐबक को सेना लेकर आना पड़ा। राज्यपाल हेमराज और सैंकडों मेवाती योद्धा वीरगति को प्राप्त हए। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पृथ्वीराज चौहान के वीरगति को प्राप्त होने के उपरांत भी हरियाणा की वीर जनता और सेनानायकों ने अफगाान आक्रमणकारियों का डटकर विरोध किया। परन्तु, परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं थी।

 

 

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