कुरुक्षेत्र जिले के मन्दिर एवं धार्मिक संस्थान

Temples and Religious Institutions in Kurukshetra District

स्थानेश्वर महादेव मन्दिर – थानेसर (Sthaneshwar Mahadev Temple – Thanesar)

थानेसर नगर के उत्तरी भाग में स्थित स्थानेश्वर महादेव मन्दिर कुरूक्षेत्र का एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन मन्दिर है। इस मन्दिर का निर्माण सम्राट हर्षवर्धन के पूर्वज राजा पुष्पभूति द्वारा करवाया गया। मान्यता है कि इस स्थान पर पाण्डवों ने भगवान शिव की आराधना करके युद्ध में विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया था। स्थानेश्वर महादेव मन्दिर को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। मन्दिर की अटारी लंबी है तथा छत गुंबदनुमा है। इस गुंबद का बाहरी भाग आंवले के आकार का है। महमूद गजनवी के आक्रमण के समय स्थानेश्वर महादेव मन्दिर भी उसकी लूट का शिकार हुआ। पेशवा सदाशिव राव द्वारा इस ऐतिहासिक मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया गया।

सर्वेश्वर महादेव मन्दिर – कुरूक्षेत्र (Sarveshwar Mahadev Temple – Kurukshetra)

ब्रह्मसरोवर (कुरूक्षेत्र तीर्थ) के बीच के टापू पर सर्वेश्वर महादेव मन्दिर स्थित है। यह पवित्र मन्दिर बाबा श्रवणनाथ द्वारा बनवाया गया था। मन्दिर का प्रबन्धन निर्वाणी अखाड़ा के अधीन है। कुरूक्षेत्र तीर्थ के तट से इस मन्दिर तक पहुँचने के लिए एक पुल बना हुआ है। मन्दिर में पवित्र शिवलिंग के साथ-साथ शंकर-पार्वती, गणेश तथा नन्दीगण की मूर्तियाँ स्थापित हैं। स्थानीय मान्यता है कि पांडवों की माता कुन्ती ने इस मन्दिर में भगवान शिव की आराधना की थी।

लक्ष्मीनारायण मन्दिर – कुरूक्षेत्र (Laxminarayan Temple – Kurukshetra)

कुरूक्षेत्र में सन्निहित सरोवर के निकट ही भगवान लक्ष्मीनारायण का मन्दिर है। इस मन्दिर को गिरि संप्रदाय के सिद्ध फकीर बाबा शिव गिरि महाराज ने बनवाया था। चोल शैली में बना यह प्राचीन मन्दिर 1000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है।

बिड़ला मन्दिर-थानेसर (Birla Temple-Thanesar)

रेलवे स्टेशन के निकट कुरूक्षेत्र-पेहोवा मार्ग पर स्थित बिड़ला मन्दिर का निर्माण 1955 में जुगल किशोर बिड़ला जी ने करवाया था। ब्रह्मसरोवर के तट पर स्थित इस भव्य मन्दिर को भगवतगीता मन्दिर भी कहते हैं। इस मन्दिर में संगमरमर की दीवारों पर गीता के अठारह अध्यायों के श्लोक उकेरे गए हैं। मन्दिर के अन्दर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। इस मन्दिर में हनुमान जी की विशाल प्रतिमा भी स्थापित हैं।

भद्रकाली मन्दिर – देवी कूप (Bhadrakali Temple – Goddess Coupe)

स्थानेश्वर महादेव मन्दिर के निकट झांसा मार्ग पर स्थित भद्रकाली मन्दिर भारत में 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मन्दिर भद्रकाली या माता सती को समर्पित है। यह हरियाणा का एकमात्र शक्ति पीठ है। यक्ष-यज्ञ और सती प्रसंग में ऐसी मान्यता है कि भारत में जहाँ-जहाँ माता सती के अंग गिरे थे वहीं 51 स्थानों पर शक्तिपीठ हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर सती का टखना गिरा था। मां भद्रकाली यदुवंशियों की कुलदेवी हैं। महाभारत युद्ध के पश्चात् यहाँ पर श्री कृष्ण और पाण्डवों ने देवी की आराधना की थी। मन्दिर के दाईं और एक सरोवर है जिसे ‘चक्रताल’ या ‘देवीताल’ कहते हैं। सरोवर के पश्चिम-उत्तरी कोने में दक्षेश्वर महादेव का मन्दिर है।

ज्योतिसर तीर्थ (Jyotisar Tirtha)

पेहवा मार्ग पर कुरूक्षेत्र रेलवे स्टेशन से लगभग 8 कि.मी. की दूरी पर स्थित ज्योतिसर तीर्थ एवं सरोवर गीता की जन्म स्थली है। महाभारत युद्ध के प्रारंभ होने से पूर्व इसी स्थान पर भगवान कृष्ण ने दुविधाग्रस्त अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।

500 x 100 फुट क्षेत्र में विस्तृत यह ज्योतिसर सरोवर हिन्दू आस्था का प्रमुख केन्द्र है। मान्यता है कि यहाँ पर आदि गुरु शंकराचार्य पधारे थे तथा गीता दर्शन का चिन्तन-मनन किया था। 1967 ई. में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य ने ज्योतिसर में कृष्ण-अर्जुन रथ तथा शंकराचार्य मन्दिर का निर्माण करवाया। वर्ष 1924 में महाराजा दरभंगा ने यहाँ स्थित अक्षयवट के चारों ओर पक्के चबूतरे का निर्माण करवाया। पौराणिक सरस्वती नदी के प्रवाह पथ पर स्थित ज्योतिसर तीर्थ के रख-रखाव का दायित्व कुरूक्षेत्र विकास बोर्ड के कन्धों पर है।

ब्रह्मसरोवर-कुरूक्षेत्र (Brahmasarovar-Kurukshetra)

कुरूक्षेत्र की असली पहचान यहाँ का ब्रह्मसरोवर है। ब्रह्मसरोवर के विषय में मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने यहाँ प्रथम यज्ञ किया था। पुराणों के अनुसार इस सरोवर का निर्माण राजा कुरु ने करवाया था। लगभग 549 मीटर लंबे और 427 मीटर चौड़े ब्रह्मसरोवर के तट पर अनेकों मन्दिर, मठ और धर्मशाला बनी हुई हैं। हिन्दू मान्यता के अनुसार सूर्य ग्रहण के अवसर पर ब्रह्मसरोवर में स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलता है। मान्यता है कि यहाँ पर स्वंय ब्रह्माजी ने शिवलिंग की स्थापना की थी। 

प्रत्येक वर्ष नवंबर-दिसंबर महीने में यहाँ पर राज्य स्तरीय गीता-जयन्ती समारोह का आयोजन किया जाता है। . सन्निहित सरोवर-यह सरोवर कुरूक्षेत्र रेलवे स्टेशन से डेढ़ कि.मी. की दूरी पर कुरूक्षेत्र-पेहवा रोड पर स्थित है।

सन्निहित सरोवर (Contiguous lake)

472.44 मी. लंबा और 137.16 मी. चौड़ा है। यद्यपि यह सरोवर ब्रह्म सरोवर की तुलना में आकार में काफी छोटा है परन्तु यह प्रदेश के पवित्रतम तीर्थों में से एक है। श्रद्धालु यहाँ अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं। इस तीर्थ के तीनों ओर सुन्दर और पक्के घाट बने हुए हैं। इस स्थल को भगवान विष्णु का निवास स्थान माना जाता है। सन्निहित सरोवर के एक ओर ध्रुव नारायण मन्दिर तथा दूसरी ओर लक्ष्मी नारायण मन्दिर है। सन्निहित का अर्थ है- ‘संचालित जल’। यह सरोवर कुरूक्षेत्र का प्राचीनतम सरोवर माना जाता है। सन्निहित सरोवर के तट पर स्थित 18 फुट ऊँचे श्रीराम महाक्रुतः स्तंभ पर संक्षेप में रामायण उकेरी गई है। मान्यता है कि सन्निहित स्थल महाभारत युद्ध में सेनापतियों का मंत्रणा स्थल रहा है।

अनवरक तीर्थ-कुरूक्षेत्र (Anwarak Tirtha-Kurukshetra)

कुरूक्षेत्र-पेहोवा मार्ग पर स्थित इस तीर्थ का संबंध द्वापर युग से है। महाभारत युद्ध के दौरान शर-शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह की प्यास बुझाने के लिए अर्जुन ने अपने बाण से धरती में से जलधारा प्रकट की तथा भीष्म की प्यास बुझाई। यही अनवरक तीर्थ है जिसे ‘बाणगंगा-कुण्ड’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हनुमान जी की 26 फुट ऊँची प्रतिमा भी दर्शनीय है।

यहाँ पर सीता-राम, दुर्गा तथा तारकेश्वर मन्दिर हैं। इसे ‘नरकातारी तीर्थ’ भी कहते हैं।

गीता भवन-कुरूक्षेत्र (Geeta Bhawan-Kurukshetra)

गीता भवन ब्रह्मसरोवर के उत्तरी तट पर स्थित है। रीवा (मध्य प्रदेश) के महाराज ने इसकी स्थापना की थी।

गुरुद्वारा सिद्धवटी साहिब (Gurudwara siddhavati sahib)

ऐसी मान्यता है कि 1558 ई. में बैशाख अमावस्या को सूर्य ग्रहण के अवसर पर गुरूनानक देव जी कुरूक्षेत्र आए थे। गुरुजी के इस प्रवास में भाई लहना (दूसरे गुरु अंगद देव) जी भी साथ थे। उनके प्रवास की स्मृति में ब्रह्मसरोवर से एक कि.मी. दूर कुरूक्षेत्र-किरमिच मार्ग पर ‘गुरुद्वारा प्रथम पातशाही-सिद्धवटी’ निर्मित है।

गुरुद्वारा तीसरी पातशाही (Gurudwara third pathashahi)

संवत् 1523 में आषाढ़ अमावस्या को सूर्यग्रहण के अवसर पर गुरु अमरदास जी अपने अनुयायियों सहित कुरूक्षेत्र पधारे। बाबर के समय से ही तीर्थयात्रा तथा सरोवर स्नान के लिए जजिया देना पड़ता था। गुरु जी ने जजिया देने से इंकार कर दिया। बादशाह अकबर तक शिकायत पहुँची तो अकबर ने जजिया कर समाप्त कर दिया। गुरु अमरदास जी के कुरूक्षेत्र आगमन की स्मृति में थानेसर में इस गुरुद्वारे का निर्माण किया गया।

गुरुद्वारा छठी पातशाही-कुरूक्षेत्र (Gurudwara VI pathashahi-kurukshetra)

कुरूक्षेत्र-पेहोवा मार्ग पर रेलवे स्टेशन से लगभग दो कि.मी. की दूरी पर कुरूक्षेत्र में सन्निहित सरोवर के निकट यह भव्य गुरुद्वारा स्थापित है। यह गुरुद्वारा गुरु हरगोबिन्द जी के कुरूक्षेत्र आगमन से संबंधित है। विभाजन के पश्चात् कुरूक्षेत्र में 5 लाख शरणार्थियों का शिविर लगा तो गुरुद्वारे को आधुनिक रूप दे दिया गया।

गुरुद्वारा सातवीं पातशाही (Gurudwara seventh patshahi)

गुरु हरसहाय जी के कुरूक्षेत्र आगमन की स्मृति में कुरूक्षेत्र-पिपली मार्ग पर इस गुरुद्वारे का निमार्ण किया गया। गुरुद्वारा आठवीं पातशाही-मुगल बादशाह औरंगजेब से भेंट करने के उद्देश्य से गुरु हरकिशन जी कीरतपुर से पंजोखड़े के रास्ते कुरूक्षेत्र पहुँचे। इसी स्मृति में इस गुरुद्वारे का निर्माण हुआ। गुरुद्वारा नौवीं पातशाही-यह गुरुद्वारा गुरु तेगबहादुर जी के कुरूक्षेत्र आगमन की स्मृति में बनवाया गया। यह गुरुद्वारा शेख चेहली के मकबरे के निकट स्थित है।

कालेश्वर तीर्थ-कुरूक्षेत्र (Kaleshwar Teerth-Kurukshetra)

कालेश्वर तीर्थ-कुरूक्षेत्र स्थित कालेश्वर तीर्थ को रामायणकालीन माना जाता है। मान्यता है कि रामायणकाल में लंकापति रावण ने

इस स्थान पर भगवान रूद्र की स्थापना की थी। पुराणों के अनुसार ग्यारह रूद्रों में से एक रूद्र यहाँ प्रतिष्ठित हैं। यहाँ भगवान शिव का एक प्राचीन मन्दिर भी है।

श्री शनि धाम-कुरूक्षेत्र (Shri Shani Dham-Kurukshetra)

श्री शनि धाम-कुरूक्षेत्र के उमरी चौक पर स्थित श्री शनि धाम के प्रथम तल पर शनिदेव व अन्य ग्रहों की प्रतिमा स्थापित हैं।

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