शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया

Teaching-learning process

  • अध्यापन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थी के व्यवहार को उचित दिशा में प्रभावित करना अर्थात् उसके अधिगम को उचित दिशा में प्रभावी बनाना होता है।
  • अधिगम को प्रभावी बनाने तथा व्यवहार को परिवर्तन करने की उचित दिशा क्या हो, इसका निर्णय विद्यालय और अध्यापक मिलकर शैक्षिक उद्देश्य निर्धारित करते समय करते हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि अध्यापक को शिक्षा के लक्ष्य और उसके उद्देश्यों के बारे में पता हो। साथ ही अध्यापक को इस योग्य होना चाहिए कि वह विद्यार्थी के सीखने के लिए प्रभावशाली साधनों का निर्माण कर सके और अन्त में वह यह निर्धारित कर सके कि इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किस सीमा तक जाना है?
  • शैक्षिक प्रक्रिया के तीन मुख्य बिन्दु हैं-उद्देश्य, अधिगम अनुभव क्रियाएँ एवं विद्यार्थी का मूल्य निर्धारण।
  • अध्यापक विद्यार्थियों को अधिगम अनुभव प्रदान करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाता है। इन अनुभवों से विद्यार्थियों में व्यवहारगत परिवर्तन होते हैं। अत: अधिगम में विद्यार्थियों के व्यवहार में आया परिवर्तन शामिल है। विद्यार्थियों में उल्लेखनीय अधिगम होने के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षण प्रभावी हो।
  • विद्यार्थियों में विषय-सामग्री के अधिक आदान-प्रदान के लिए अध्यापक को उचित विधियों और माध्यम को अपनाना चाहिए। इस प्रकार प्रभावशाली अध्यापन वही है, जो उचित और सफल अधिगम अनुभवों की ओर ले जाए।

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के भाग (Part of the teaching-learning process)

मैकडॉनल्ड के अनुसार, समस्त शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के चार मुख्य भाग होते हैं

  • पाठ्यक्रम
  • अनुदेशन
  • शिक्षण

शिक्षण एवं अधिगम एक-दूसरे पर निर्भर हैं। अध्यापक पाठ्यक्रम के अनुसार अनुदेशन सामग्री तैयार करता है और शिक्षण क्रियाओं का आयोजन करता है। शिक्षण की सभी क्रियाओं के समन्वय के परिणामस्वरूप ही अधिगम होता है। इसलिए इनका परस्पर गहरा सम्बन्ध है।

गेज के अनुसार, प्रभावशाली अधिगम में मनोवैज्ञानिक शक्तियाँ शिक्षण को सहायता प्रदान करती हैं।

विद्यार्थियों के व्यवहार तथा अधिगम लक्ष्यों को तीन क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है

  • ज्ञानात्मक
  • भावात्मक
  • क्रियात्मक

शिक्षण के द्वारा जब विद्यार्थी में व्यवहार परिवर्तन होता है तो वह व्यवहार परिवर्तन अथवा अधिगम इनमें से किसी भी क्षेत्र के साथ सम्बन्धित हो सकता है। अधिगम के अनुसार शिक्षण भी तीन प्रकार का हो सकता है

शिक्षण उद्देश्य एवं अधिगम (Part of the teaching-learning process)

  • उद्देश्य         शिक्षण विधि                   अधिगम
  • ज्ञानात्मक        भाषण                           जानना
  • भावात्मक     नाटकीकरण                   अनुभव करना
  • क्रियात्मक     प्रयोग                             करना

 

तालिका से स्पष्ट है कि जैसा शिक्षण होगा विद्यार्थी में वैसा ही अधिगम होगा।

यदि दोनों शब्दों का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि शिक्षण तथा अधिगम में गहरा सम्बन्ध है। सभी शिक्षण लक्ष्य-उन्मुख होता है और उसका लक्ष्य अधिगम में निहित होता है। शिक्षण की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके माध्यम से अधिगम की प्राप्ति किस सीमा तक हुई।

नदी के दो किनारों की तरह एक-दूसरे से अलग होते हुए भी ये दोनों एक हैं। शिक्षण की उपयोगिता का मूल्यांकन उसके द्वारा हुए अधिगम द्वारा किया जा सकता है। इसी दृष्टिकोण से शिक्षण एवं अधिगम में घनिष्ठ सम्बन्ध है। संक्षेप में शिक्षण एक ऐसी युक्तिपूर्ण क्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति (अध्यापक) स्वयं अपने आपको और अपने ज्ञान को रचनात क एवं कल्पनात्मक रूप से प्रयुक्त करता हुआ दूसरो विद्यार्थियों) के अधिगम को विकसित करता है।

  • क्रोनबैक के अनुसार, अधिगम के सात तत्व होते हैं जो अधिगम के सिद्धान्तों का आधार माने जाते हैं और इसी के आधार पर शिक्षण के सिद्धान्त निर्धारित किए जा सकते हैं
  • स्थिति-  सबसे पहले विषय का विश्लेषण करके उसे क्रमबद्ध किया जाता है और उसी के अनुसार स्थितियों का चुनाव किया जाता है ताकि विद्यार्थियों में अधिगम हो सके।
  • व्यक्तिगत विशेषताएँ-   विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा विद्यार्थियों की योग्यताओं का पता लगाया जाता है और उन्हीं के आधार पर शिक्षण-विधियों के बारे में निर्णय लिया जाता है।
  • लक्ष्य-  शिक्षण क्रियाओं द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार में परिवर्तन करना अध्यापक का ध्येय होता है। व्याख्या पूर्व ज्ञान के आधार पर विद्यार्थियों को नया ज्ञान प्रदान किया जाता है।
  • कार्य-  यह विद्यार्थी का रचनात्मक पक्ष है। इसमें विद्यार्थी अनुक्रिया करता है व कोई नया विचार अध्यापक के समक्ष रख सकता है।
  • परिणाम-    अध्यापक विद्यार्थियों की गतिविधियों पर ध्यान रखता है और उनकी कमजोरियों को दूर करता है। वह शिक्षण विधियों पर पुनर्विचार करता है।
  • विरोध पर प्रतिक्रिया-  यदि लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती है तो विद्यार्थी शिक्षण प्रक्रिया का प्रतिरोध करता है। तब शिक्षक विद्यार्थियों की कठिनाइयों को समझकर उन्हें दूर करने की चेष्टा करता है।

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