स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती

प्रसिद्ध आर्यसमाजी संत, स्वतंत्रता सेनानी तथा शिक्षाविद् स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती जी का जन्म 6 फरवरी, 1856 को पंजाब में जालंधर के निकट तालवां गाँव में लाला नेकचंद विज के घर हुआ था। इनके पिता ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन एक पुलिस अफसर थे। स्वामी जी का बचपन का नाम मुंशीराम विज था। यद्यपि हरियाणा उनकी जन्मभूमि नहीं थी, परन्तु हरियाणा में आर्य समाज की शिक्षाओं के प्रचार तथा गुरुकुल पद्धति के प्रसार में उनका अद्वितीय योगदान था। स्वामी दयानंद जी के साथ इनकी प्रथम भेंट उनके बरेली प्रवास के दौरान हुई थी। स्वामी दयानंद जी के विचारों से प्रभावित होकर मुंशीलाल वैदिक धर्म के अनन्य भक्त बन गए। इसके पश्चात् वह आर्यसमाज के सक्रिय कार्यकर्ता बन गए। 1891 ई. में इनकी पत्नी का देहान्त हो गया।

स्वामी दयानंद जी के प्राण त्यागने के उपरान्त 1892 ई. में आर्य समाज दो धड़ों में बंट गया था। स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम) गुरुकल पद्धति के समर्थक थे। 1897 ई. में लाला लेख राम जी की हत्या के उपरान्त मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान बने। 1902 ई. में उन्होंने हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। 1917 ई. में महात्मा मुंशीराम ने संयास ले लिया तथा ‘स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। स्वामी जी ने फरीदाबाद के निकट अरावली की पहाड़ियों के बीच इन्द्रप्रस्थ गुरुकुल की स्थापना की। उनके प्रयासों से कुरुक्षेत्र, झज्जर, भैंसवाल कला आदि स्थानों पर गुरुकुलों की स्थापना हुई। उन्होंने अनेक शुद्धि आन्दोलन चलाए तथा स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। 1923 ई. में स्वामी जी भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा के अध्यक्ष बन गए। 23 दिसंबर, 1926 को अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम ने दिल्ली में उनकी हत्या कर दी।

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