बच्चों के उचित समावेशन के लिए सुझाव

Suggestions for proper inclusion of children

बच्चों के उचित समावेशन के लिए कुछ सुझाव निम्न हैं

संस्थानगत सुधार (Institutional reform)

  • निरन्तर उपेक्षा एवं बहिष्कार झेल रहे जनजाति एवं जाति समूहों और भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान कर उनके प्रति सकारात्मक व्यवहार अपनाए जाने की आवश्यकता है।
  • प्रायः देखा जाता है कि विद्यालय के कैलेण्डर, अवकाशों एवं समय में स्थानीय सन्दर्भो का ख्याल नहीं रखा जाता। इससे बचना चाहिए एवं स्थानीय सन्दर्भो को भी पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए। समावेशी कक्षा में कोर्स को पूरा करने के लिए शिक्षकों द्वारा प्रयास किए जाने से अधिक आवश्यक यह है कि वह अधिक सहकारी एवं सहयोगात्मक गतिविधि अपनाएँ। समावेशी कक्षा में प्रतियोगिता और ग्रेडों पर कम बल दिया जाना चाहिए तथा विद्यार्थियों के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए।

विद्यालयी पाठ्यचर्या में सुधार (विद्यालयी पाठ्यचर्या में सुधार)

  • पाठ्यचर्या के उद्देश्य ऐसे होने चाहिए, जो भारतीय समाज और संस्कृति की सराहना तथा विवेचनात्मक मूल्यांकन पर बल दें। सुविधाओं से वंचित बच्चों के संवेगात्मक एवं सामाजिक विकास, मानसिक विकास आदि के समान अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। रचनात्मक प्रतिभा, उत्पादन कौशल और सामाजिक न्याय, प्रजातन्त्र, धर्मनिरपेक्ष, समानता के मूल्यों सहित श्रम के आदर को प्रोत्साहन देना पाठ्यचर्या का लक्ष्य होना चाहिए।
  • पाठ्यचर्या का एक ऐसा उपागम हो, जोकि विवेचनात्मक सिद्धान्त पर आधारित हो, विशेषकर उपदलित, दलित-महिलावादी और विवेचनात्मक बहु-सांस्कृतिक दृष्टिकोणों का समावेशन और केन्द्रीकरण आवश्यक है

शिक्षणशास्त्र में सुधार  (Pedagogical improvement)

  • अधिगम सन्दर्भो को बढ़ावा और प्रजातान्त्रिक व समानतावादी कक्षा-कक्ष व्यवहारों की रूपरेखा के विकास के लिए शिक्षणशास्त्र की विविध पद्धतियों और व्यवहारों को समाहित करने की अत्यन्त आवश्यकता है ताकि पाठ्यचर्या का प्रभावी क्रियान्वयन हो सके।
  • शिक्षकों को रचनात्मक, समीक्षात्मक शिक्षणशास्त्र और बच्चों के प्रति लिंग, जाति, वर्ग, जनजाति-आधारित और अन्य प्रकारों की पहचान सम्बन्धी इत्यादि भेदभाव को दूर करने और समान आदर और सम्मान को बढ़ावा देने के दृष्टिकोण के साथ कक्षा-कक्ष व्यवहारों पर विशेष दिशा-निर्देश विकसित करने की आवश्यकता है।
  • विद्यालय के संवेगात्मक वातावरण में सुधार लाने की आवश्यकता है ताकि शिक्षक एवं बच्चे ज्ञान के निर्माण और अधिगम में खुलकर भाग ले सकें।
  • शिक्षणशास्त्र के ऐसे व्यवहारों का विकास करने की आवश्यकता है, जिसका लक्ष्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आत्म-सम्मान और पहचान में सुधार हो।

भाषा के सन्दर्भ में सुधार (Language improvement)

  • स्थानीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया जाए।
  • यदि यह सम्भव न हो, तो कम-से-कम व्याख्या एवं संवाद के लिए स्थानीय भाषा को वरीयता देना आवश्यक है।
  • भारतीय समाज की बहुभाषिक विशेषता को विद्यालयी जीवन को समृद्ध बनाने के संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए।

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