संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ

Stages of cognitive development

पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है, जिनके नाम एवं विशेषताएँ इस प्रकार हैं

इन्द्रियजनित गामक/संवेदी प्रेरक अवस्था(Sensory singing / sensory stimulus state)

 (जन्म से 2 वर्ष तक)

  • मानसिक क्रियाएँ इन्द्रियजनित गामक क्रियाओं के रूप में ही सम्पन्न होती हैं।
  • भूख लगने की स्थिति को बालक रोकर व्यक्त करता है।
  • इस अवस्था में व्यक्ति आँख, कान एवं नाक से सोचता है।
  • जिन वस्तुओं को वे प्रत्यक्षतः देखते हैं, उनके लिए उसी का अस्तित्व होता है।
  • इस आयु में बालक की बुद्धि उसके कार्यों द्वारा व्यक्त होती है। उदाहरण के लिए,चादर पर बैठा शिशु चादर पर थोड़ी दूर स्थित खिलौने को प्राप्त करने के लिए चादर को खींचकर खिलौना प्राप्त कर लेता है।
  • इस तरह यह अवस्था अनुकरण, स्मृति और मानसिक निरूपण से सम्बन्धित है।

पूर्व संक्रियात्मक अवस्था(Pre operational stage)

(2 से 7 वर्ष तक)

  • इस अवस्था में बालक अपने परिवेश की वस्तुओं को पहचानने एवं उसमें विभेद करने लगता है।
  • इस दौरान उसमें भाषा का विकास भी प्रारम्भ हो जाता है।
  • इस अवस्था में बालक नई सूचनाओं और अनुभवों का संग्रह करता है।
  • वह पहली अवस्था की अपेक्षा अधिक समस्याओं का समाधान करने योग्य हो जाता है। बच्चों में वस्तु स्थायित्व के गुण का विकास होता है।

पियाजे ने इस अवस्था को मुख्य दो भागों में बाँटा है, जो निम्न हैं

पूर्व वैचारिक अवस्था(Pre conceptual stage)

इस अवस्था की अवधि 2 से 4 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बालक वस्तुओं, शब्द प्रतिमाओं आदि के विषय में अपना मानसिक चिन्तन विकसित करने लगता है। पियाजे ने इस अवस्था में संकेत तथा चिह्न को चिन्तन का महत्त्वपूर्ण साधन माना है। इस अवस्था में बालक द्वारा किए जाने वाले कार्य (लाक्षणिक) मुख्यत: अनुकरण तथा खेल के माध्यम से किए जाते हैं।

अन्तदर्शी अवस्था(Insightful state)

इस अवस्था की अवधि 4 से 7 वर्ष के मध्य की होती है। इस अवस्था में बालक का चिन्तन एवं तर्कणा पहले से अधिक परिपक्व हो जाती हैं।

परिणामस्वरूप वह साधारण मानसिक क्रियाओं; जैसे-जोड़, घटाव गुणा व भाग आदि में सम्मिलित तो हो जाता है, परन्तु इन मानसिक क्रियाओं के पीछे छिपे नियमों को समझ नहीं पाता है अर्थात् उसके तर्क में कर्मबद्धता का अभाव होता है।

मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(Tangible operational state)

(7 से 11 वर्ष तक)

  • इस अवस्था में बालक में वस्तुओं को पहचानने, उनका विभेदीकरण (Differentiation) करने तथा वर्गीकरण (Classification) करने की क्षमता विकसित हो जाती है।
  • उनका चिन्तन अब अधिक क्रमबद्ध एवं तर्कसंगत होना प्रारम्भ कर देता है।
  • इस अवस्था में बालक विश्वास करने लगता है तथा लम्बाई, भार, अंक आदि प्रत्ययों पर चिन्तन करता है। भाषा का पूर्ण विकास, बालक किसी पूर्व और उसके अंश के सम्बन्ध में तर्क कर सकता है।
  • बालक अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलन (Adaptation) करने के लिए अनेक नियमों को सीख लेता है।

औपचारिक/अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था(Formal / intangible functional state)

(11 वर्ष से 15 वर्ष तक)

  • यह अवस्था 11 वर्ष से प्रौढ़ावस्था तक की अवस्था है। इस अवस्था की प्रमुख विशेषता अमूर्त चिन्तन है।
  • इस अवस्था में भाषा सम्बन्धी योग्यता तथा सम्प्रेषणशीलता (communication) का विकास अपनी ऊँचाई को छूने लगता है।
  • इस अवस्था में व्यक्ति अनेक संक्रियात्मक को संगठित कर उच्च स्तर के संक्रियात्मक का निर्माण कर सकता है और विभिन्न प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिए अमूर्त नियमों का निर्माण कर सकता है। बालक में अच्छी तरह से सोचने, समस्या समाधान करने एवं निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो जाता है। बालकों में वैज्ञानिक ढंग से सोचने की क्षमता का विकास होता है।
  • जिन बालकों का औपचारिक संक्रियात्मक चिन्तन नीचा होता है, उनका शिक्षण स्तर भी नीचा होता है।
  • जिन बालकों का औपचारिक संक्रियात्मक चिन्तन ऊँचा होता है, उनका शिक्षण स्तर भी ऊँचा होता है।

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