सेठ चौधरी छाजूराम

दानवीर सेठ छाजूराम जी का जन्म 1861 ई. में भिवानी जिले की बवानी खेड़ा तहसील के अलखपुरा गाँव में चौ. सालिगराम लांबा के घर हुआ था। इनके पुरखे राजस्थान के सीकर जिले से संबंध रखते थे। युवावस्था में चौ. छाजूराम प्रसिद्ध – आर्यसमाजी शिवनाथ राय के संपर्क में आए तथा उनके साथ कलकत्ता चले गए। कलकत्ता जाकर इन्होंने कुछ समय तक शिवनाथ राय के बच्चों को पढ़ाया। इसके बाद वह कलकत्ता बाजार के मारवाड़ी व्यापारियों के यहाँ मुंशी का काम देखने लगे। यहीं से उन्हें व्यापार की बारीकियों का ज्ञान मिला। चौ. छाजूराम ने कलकत्ता में जूट का कारोबार आरंभ कर दिया तथा कुछ ही समय में इस व्यापार में शिखर तक जा पहुँचे। उस समय लोग उन्हें “जूट किंग’ का खिताब देते थे।

सेठ छाजूराम की परमात्मा में गहरी आस्था थी तथा वह मानवता के सच्चे सेवक थे। उनके पावन प्रयासों तथा दान से प्रदेश में अनेकों छात्रावास, पुस्तकालय तथा धर्मशालाओं का निर्माण हुआ। चौ. छाजूराम ग्रामीण युवाओं की शिक्षा के लिए बहुत चिंतित थे। इनके प्रयासों से प्रदेश में अनेकों शिक्षण संस्थान बने। उनके मार्गदर्शन में 1924 ई. में हिसार में जाट स्कूल की स्थापना हुई। चौ. छोटूराम जी के जीवन और शिक्षा में सेठ चौ. छाजूराम जी का बड़ा भारी योगदान रहा है। यही कारण है कि चौ. छाजूराम जी को आज भी ‘जाटों का दानवीर भामाशाह’ कहा जाता है। 7 अप्रैल, 1943 को सेठ छाजूराम मानवता की सेवा करते हुए इस दुनिया को अलविदा कह गए परन्तु, उनके द्वारा किए गए कार्य आज भी हमें उनकी याद दिलाते हैं।

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