हरियाणा में यौधेय गणराज्य का उदय

Rise of the War Republic in Haryana

मौर्यों के राजतंत्र का पतन होने के उपरान्त यौधयों ने एक शक्तिशाली गणराज्य स्थापित कर लिया। इस विशाल गणराज्य का मुख्य केन्द्र हरियाणा था। यहाँ से यौधयों के सर्वाधिक सिक्के प्राप्त हुए हैं। सर्वप्रथम 19वीं सदी में कनिंघम को ये सिक्के मिले थे। तदुपरान्त, सोनीपत से सिक्कों के दो ढेर प्राप्त हुए। 1938-39 में जीन्द से सिक्कों का एक बड़ा ढेर मिला। अंग्रेज पुरातत्वविद् रोजर्स को हांसी और खरखोदा से कुछ सिक्के प्राप्त हुए। 1961 में रोहतक में सिक्कों का एक बहुत बड़ा ढेर मिला। इसी प्रकार सिरसा, हिसार, गुड़गाँव व करनाल जिलों से भी सिक्कों के ढेर प्राप्त हुए हैं। गुरुकुल झज्जर स्थित ‘हरियाणा प्रान्तीय पुरातत्व संग्रहालय’ में हरियाणा में मिले बेशुमार यौधेय सिक्के संरक्षित करके रखे गए हैं।

हरियाणा के कुछ स्थानों से इन सिक्कों को ढालने के साँचे भी प्राप्त हुए हैं। इन स्थानों का वर्णन नीचे दिया गया है।

खोखराकोट (रोहतक)

1936 में बीरबल साहनी को खोखराकोट में एक टकसाल मिली जिसमें सिक्के ढालने के लिए यौधेयकालीन
मिट्टी के साँचे प्राप्त हुए हैं। बीरबल साहनी ने अपनी पुस्तक ‘दि टेक्नीक ऑफ कास्टिंग क्वायंस इन | एंशियंट इंडिया’ में यौधेयों की टकसाल पर विस्तार से लिखा है। इन ठप्पों की गुणवत्ता कई युरोपीय देशों | में मिले साँचों से भी अच्छी है और ये सांचें उनसे दो सौ वर्ष पूर्व के हैं। इससे सिद्ध होता है कि रोमनों ने भारतीयों से सिक्के ढालने सीखें हैं।

नौरंगाबाद (भिवानी)

रंगाबाद से भी रोहतक जैसी टकसाल मिली है। रोहतक से मिले सांचों की तुलना, में नौरंगाबाद से मिले
साँचे अधिक अच्छे स्तर के हैं। रोहतक से मिले साँचे में एक बार में 8 मुद्राएँ बनती थीं, परन्तु नौरंगाबाद
से मिले साँचों में एक बार में 15 मुद्राएँ निकलती थीं।

यौधेय जनपद का प्रथम उल्लेख 5वीं शती ई०पू० मिलता है। मौर्यों के पतन के साथ-साथ यौधयों की शक्ति का भी विस्तार हुआ। एक समय लगभग समस्त हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के कुछ भाग तथा पंजाब का कुछ क्षेत्र उनके अधीन था। यौद्धयों के इस विशाल साम्राज्य की राजधानी प्रकृतानाक नगर (नौरंगाबाद-बामला) थी। रोहतक और सिरसा इस गणराज्य के बड़े प्रशासनिक नगर थे।

हरियाणा में कुषाण आक्रमणं

यौधयों पर उत्तर-पश्चिम दिशा से अनेकों आक्रमण हुए। इनमें सबसे प्रमुख कुषाण थे। विकमडफिस पहला कुशाण शासक था जिसने यौधयों को युद्ध में हराया। परन्तु, यौधयों पर नियंत्रण करने का श्रेय दूसरे कुषाण शासक कनिष्क को जाता है। हुविष्क के काल में भी यौधयों की शक्ति पर कुषाणों का नियंत्रण रहा। परन्तु, ऐसा प्रतीत होता है कि वासुदेव कुषाण के समय यौद्धयों ने न केवल अपने आपको कुषाणा से स्वतंत्र कराया बल्कि पूरे भारत भर को कुषाणों के चंगुल से मुक्त करा दिया। इस अवसर पर यौद्धयों ने विशेष प्रकार के सिक्के चलाए थ जिन पर ‘यौद्धेयगणस्य जय’ खुदा हुआ था।

यौधयों का शासन एक गणतन्त्रीय शासन प्रणाली के ऊपर आधारित था। यौधेय कालीन सिक्कों पर ‘गण’ शब्द की विद्यमानता इस तथ्य की पुष्टि करती है। संभवतः आधुनिक संसद जैसी कोई व्यवस्था यौद्धेय गणराज्य में भी रही होगी। सभी सांसद मिलकर एक अधिनायक चुनत थे जिसे ‘महाराजा’ कहा जाता था। अग्रोहा से मिले एक अन्य मुद्रांक लेख से यह बात स्पष्ट होती है कि महाराजा ही महाक्षत्रय भी हाता महाराजा अत्यधिक शक्तिशाली पदाधिकारी होता था। राजा का कार्यकाल उसके सामर्थ्य और योग्यता पर निर्भर करता था। कुछ सिक्का ‘ब्रह्मण्यदेव’ का भी उल्लेख मिलता है। डा० काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार ‘ब्रह्मण्यदेव’ शब्द भगवान कार्तिकेय के माधय गण का आराध्यदेव था। प्रकृतानाक नगर (नौरंगाबाद-बामला) यौधेयों की राजधानी थी। यहा पर – मुख्यालय था। प्रशासन के कुशलतापूर्वक संचालन के लिए यौधेयों ने गणराज्य को संभवतः दो डिविजन में बांट रखा था। एक का मुख्यालय रोहतक तथा दूसर का मुख्यालय संभवत: सिरसा था। महाराजा द्वारा मनोनीत उच्च अधिकारी डिवीजनों की प्रशासकीय व्यवस्था चलाते थे। ऐसा अनुमान है कि ग्राम या नगर पंचायतें चने हए अधिकारियों के आदेशानुसार प्रशासकीय व्यवस्था देखते होंगे।

योद्धय गण अत्यत बलशाली था। डा० अल्तेकर के शब्दों में हम कहें तो मोर्योत्तर काल में विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए हम इन वारा का दर्शन होता है। यद्यपि, कनिष्क प्रथम ने इनको हराकर इनका दमन करने का प्रयास किया था, परन्तु कनिष्क और हुविष्क के बाद जैसे ही कुषाण शक्ति क्षीण होने लगी इस पराक्रमी गणराज्य ने पनः अपना आधिपत्य जमा लिया। गजरात के महाक्षत्रप रुद्रदमन ने 150 ई० के आसपास के अपने एक शिलालेख में यौधेयों को हराने की बात कही है परन्त. यह एक अतिश्योक्ति ही प्रतीत होती है, क्योंकि यौद्धेय शक्ति तो इसके उपरान्त भी बनी रही।
यौद्धेय गण का पतन कैसे हुआ इस विषय पर इतिहास में कुछ ठोस तथ्य उपलब्ध नही हैं। परन्तु चौथी शताब्दी में गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त (335-375 ई.) के हाथों परास्त होकर वे अपनी स्वतंत्रता गँवा बैठे और यौद्धयों का गुप्त साम्राज्य में विलय हो गया।

हरियाणा में अग्र गण

यौद्धयों की ही तरह हरियाणा का एक अन्य गणराज्य ‘अग्र गण’ था। 1938 के आस-पास अंग्रेज विद्वान रोजर्स को बरवाला (हिसार) स अग्र गण से संबंधित 9 सिक्के मिले। 1938-39 में ऐसे ही 51 सिक्के श्री एच०एल० श्रीवास्तव को अग्रोहा से प्राप्त हुए। इससे सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में ‘अग्र’ नामक गण आधनिक हिसार क्षेत्र में रह रहा था। अग्रोहा इसका मख्यालय था। ‘मामुतरी’ नामक बौद्ध ग्रंथ में अग्रोहा का उल्लेख इसके प्राकृत रूप ‘अग्रोदक’ के रूप में मिलता है। पाणिनी ने अपने ग्रन्थ अष्टाध्यायी में भी अग्र गण का उल्लेख किया है। इसका अर्थ यह है कि पांचवी शती ई०पू० यह गण विद्यमान था।

अग्रों की सेना ने सिकन्दर का डटकर मुकाबला किया था। 1979 में अग्रोहा में हुए उत्खनन में काफी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री मिली है। इस सामग्री के आधार पर इतिहासकार मानते हैं कि चौथी शताब्दी ई०पू० ‘अग्रोहा’ या ‘अग्रोदक’ एक विशाल नगर का आकार ले चका था। सिकन्दर के आक्रमण के उपरान्त आग्रेय मौर्यों के अधीन आ गए परन्तु, मौर्य साम्राज्य के पतन के उपरान्त ये पुनः स्वतन्त्र हो गए। मौर्यों के उपरान्त कुषाणों के आक्रमण के कारण अग्र गण की स्थिति पुनः खराब हो गई। वासुदेव कुषाण के साथ युद्ध के उपरान्त संभवत: इनका विलय यौद्धयों के साथ हो गया।

हरियाणा में कुणिंद गण

कुणिंद गण भी प्राचीन काल का एक महत्वपूर्ण गण था। वर्तमान हरियाणा के अंबाला जिले का कुछ भाग इस गण के अधिकार क्षेत्र में था। इनका इतिहास भी यौद्धेय और अग्र गण जैसा ही था। सिकन्दर के जाने के पश्चात इन्होंने अपना प्रभाव जमाया और फिर मौर्यों के अधीन हो गए। मौर्यों के पतन के पश्चात् पुनः स्वतन्त्रता हासिल कर ली। कुषाणों के आक्रमण के खिलाफ कुणिंद गण के लोग यौद्धयों के साथ मिलकर लड़े।
उपरोक्त विवरण से यह तय है कि हरियाणा की पराक्रमी और स्वतन्त्रता प्रिय जनता ने लगभग 500 ई०पू० ही अपने क्षेत्र में गणतान्त्रिक व्यवस्था स्थापित कर ली थी। यद्यपि ये गणतन्त्र कभी मौर्यों तो कभी कुषाणों के अधीन आते रहे परन्तु, इनको जब भी अवसर मिला इन गणराज्यों ने पुनः खुद को स्वतन्त्र कर लिया।

 

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