हरियाणा में पुष्पभूतियों का उदय एवं शासन

5वीं सदी में स्कंदगुप्त की मृत्यु के उपरान्त गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया। इस राजनैतिक परिस्थिति का लाभ उठाते हुए कितने ही गुप्त सामंतों ने अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित कर ली। हरियाणा प्रदेश, जो उस समय ‘श्रीकंठ जनपद’ कहलाता था, पुष्पभूति नामक एक गुप्त सामंत के आधिपत्य में आ गया। यह नाम (श्रीकंठ जनपद) संभवतः नागवंश के किसी श्रीकण्ठ नामक शासक के नाम पर पड़ा था। ‘हर्षचरित’ में बाणभट्ट ने पुष्पभूति के बारे में लिखा था कि वह वीर और धार्मिक पुरुष था। पुष्पभूति ‘परममाहेश्वर’ पदवी से विभूषित था।
इस वंश के राजाओं के क्रम में राजाधिराज प्रभाकरवर्धन हुए। एक बौद्ध ग्रंथ ‘मंजुश्रीमूलकल्प’ में प्रभाकरवर्धन के पिता आदित्यवर्धन का नाम भी मिलता है। इसी ग्रन्थ में प्रभाकरवर्धन के पुत्रों राज्यवर्धन द्वितीय और हर्षवर्धन का उल्लेख भी मिलता है। सम्राट हर्ष के मधुबन तथा नाभा से प्राप्त ताम्रपत्रों पर आदित्यवर्धन के पिता राज्यवर्धन प्रथम और नरवर्धन के नाम भी मिले हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पुष्पभूति वंश के कुल छः ज्ञात शासक हुए| पुष्पभूति राजाओं की कर्मभूमि हरियाणा रही है और इनकी राजधानी स्थानीश्वर (थानेसर) थी।

हरियाणा में पुष्पभूति वंश के छः शासक हुए जिनके नाम इस प्रकार से हैं

  • नरवर्धन
  • राज्यवर्धन प्रथम
  • आदित्यवर्धन
  • प्रभाकरवर्धन
  • राज्यवर्धन द्वितीय
  • हर्षवर्धन

नरवर्धन (505-525 ई०)

राज्यवर्धन प्रथम (525-550 ई०)

नरवर्द्धन के पश्चात् लगभग 525 ई० में राज्यवर्द्धन प्रथम पुष्पभूति वंश का शासक
बना। महाराज राज्यवर्द्धन सूर्य के अनन्य उपासक थे। इनकी पटरानी अपसरादेवी थी।

आदित्यवर्द्धन (550-580 ई०)

लगभग 550 ई० में परमादित्यभक्त (सूर्य का उपासक) महाराज आदित्यवर्द्धन सिंहासन पर बैठे। महाराज आदित्यवर्द्धन ने मालवा के गुप्तवंशी शासक दामोदरगुप्त के वंश के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए और उनकी पुत्री महासेनगुप्ता से विवाह किया।

प्रभाकर वर्धन (580-605 ई०)

प्रभाकरवर्धन, महाराज आदित्यवर्धन और महारानी महासेनगप्ता के पार
मायिक साक्ष्यों से पता चलता है कि प्रभाकरवर्धन ने अपने पराक्रम के कारण ‘महाराजाधिराज परमभट्टारक’ तथा ‘प्रतापशील’ की उपाधियाँ धारण कर रखी थी। बाणभट्ट के अनुसार वह अनेकों युद्धों का विजेता था। डा०आर०एस० त्रिपाठी के अनया प्रभाकर वर्धन का राज्य उत्तर में पंजाब से लेकर दक्षिण में मरु प्रदेश (अर्थात् आधुनिक हरियाणा का क्षेत्र) तक विस्तृत था|

राज्यवर्धन द्वितीय (605-606 ई०)

राज्यवर्धन द्वितीय, महाराज प्रभाकरवर्धन और महारानी यशोमती का ज्येष्ठ पत्र था। 605 ई० में प्रभाकर वर्धन की मृत्यु के समय उनका पुत्र राज्यवर्धन उत्तर में हूणों के साथ युद्ध लड रहा था और उस छोटा पत्र हर्षवर्धन उनके पास था। प्रभाकर वर्धन की मृत्यु के पश्चात् राज्यवर्धन द्वितीय ने राजकाज संभाल लिया। शीशी प्रभाकर वर्धन के शत्रुओं ने चारों तरफ से सिर उठाना आरंभ कर दिया। 606 ई० में कन्नौज नरेश देवगप्त और गोटात शशांक ने धोखे से राज्यवर्धन द्वितीय का वध कर दिया।

हर्षवर्धन ‘शीलादित्य’ (606-647 ई०)

606 ई० में राज्यवर्धन द्वितीय की मृत्यु के उपरान्त उनके भाई हर्षवर्धन गद्दी पर
बैठे। इस समय हर्ष की आयु मात्र 15 वर्ष थी। हर्षवर्धन बचपन से ही वीर और कुशाग्र बुद्धि थे। हर्षवर्धन ने सर्वप्रथम अपने भाई के हत्यारे कनौज नरेश देवगुप्त को हराया। यहाँ 641 ई० तक उसने संरक्षक बन कर अपनी बहन राजश्री के साथ मिलकर शासन किया। देवगुप्त को हराने के उपरान्त हर्षवर्धन ने पंचगौड़ के शासक शशांक को भी हरा दिया। शीध्र ही हर्ष ने उडीसा और मिथिला पर भी अधिकार कर लिया। इसके उपरान्त 633 ई० के आस-पास हर्ष ने वल्लभी पर अधिकार कर लिया। परन्त. वल्लभी नरेश ध्रुवसेन के व्यवहार से प्रसन्न होकर न केवल उसका राज्य उसे लौटा दिया बल्कि हर्ष ने अपनी पुत्री का विवाह भी ध्रुवसेन से कर दिया। 634 ई० में हर्ष ने दक्षिण पर अधिकार करने के लिए पुलकेशिन द्वितीय पर आक्रमण कर दिया जहाँ उसे हार का सामना करना पड़ा। इस जीत से प्रफुल्ल होकर पुलकेशिन II ने ‘परमेश्वर’ की उपाधि धारण की।

डा० राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार नेपाल और कश्मीर भी हर्ष के राज्य के अन्तर्गत आते थे। हर्ष की अन्तिम विजय भारत के पूर्वी तट के पास 643 ई० की गंजम प्रदेश की विजय थी।

हर्षवर्धन पुष्पभूति वंश का सबसे प्रतापी शासक था। उसका साम्राज्य हिमालय से लेकर नर्मदा तक, पूर्व में कामरूप से लेकर पश्चिम में पंजाब और अरब सागर तक फैला हुआ था। बंगाल, बिहार, मालवा, वल्लभी, कन्नौज, हरियाणा, पंजाब, सिंध, कश्मीर, नेपाल आदि उसके राज्य के अंग थे।
हर्ष के शासन प्रबंध के विषय में सर्वाधिक विश्वस्त जानकारी ह्यून्त्सांग के यात्रा विवरणों से प्राप्त होती है। ह्यून्त्सांग 636 ई० से 644 ई० तक 8 वर्ष हर्ष के संपर्क में रहा। हर्षवर्धन एक प्रजापालक, उदार और दानी शासक था। 643 ई० के प्रयाग सम्मेलन में उसने सर्वस्व दान कर दिया था। हर्ष ने अपने कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक मन्त्री परिषद की स्थापना कर रखी थी। वह अपना शासन इस मंत्री परिषद् की सहायता से ही चलाता था।

हर्ष की मन्त्री परिषद के सदस्यों के प्रकार:

  • भण्डी – प्रधानमंत्री
  • चन्द्रगुप्त- हाथी सेना का प्रधान
  • सिंहनाद – सेनापति
  • कन्तक- घुड़सवार सेना का प्रधान
  • अवन्ती – युद्ध तथा विदेश कार्य

हर्षवर्धन ने अपने राज्य को कई प्रान्तों में बांटा हुआ था। उन दिनों प्रांत का नाम ‘भुक्ति’ होता था। भुक्ति को ‘विश’ में बांटा गया था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होते थे।
हर्ष के समय राज्य की आय का मुख्य साधन भूमिकर था जो कि कृषक की कुल उपज का 1/6 वां भाग होता था। भूमिकर प्रायः तीन विधियों से उगाहा जाता था-भागविधि, हिरण्य विधि तथा बलि विधि से।

हरियाणा में हर्षकाल में सांस्कृतिक उत्थान

हर्ष केवल एक विजेता और कुशल प्रशासक ही नहीं बल्कि उच्चकोटि का साहित्यिकार भी था। उसने स्वयं तीन नाटक-रत्नावली, नागानन्दम्
और प्रियदर्शिका की रचना की थी। वह विद्वानों का आश्रयदाता था तथा अपनी आय का 14 भाग विद्वानों को दान देता था। हर्ष की राजसभा का सबसे प्रसिद्ध विद्वान बाणभट्ट था। बाणभट्ट ने ‘कादंबरी’ तथा ‘हर्षचरित’ की रचना की। एक अन्य प्रसिद्ध विद्वान जयसेन था। वह ज्योतिष, वेद, भूगोल, गणित तथा चिकित्सा शास्त्र का प्रकाण्ड विद्वान था। बौद्धगुरु दिवाकर, मयूर तथा भर्तृहरि आदि उसका राज-सभा के अन्य रत्न थे। शिक्षा के प्रसार के लिए हर्ष ने स्थाणीश्वर तथा नालन्दा विश्वविद्यालयों को खूब दान दिया।
हर्ष का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर था। वह दिवाकर के प्रभाव में बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा का अनुयायी था। परन्तु बाद में ह्यून्त्साग के संपर्क में आकर महायान शाखा को मानने लगा। बौद्ध धर्म का अनुयायी होने पर भी वह हिन्दू धर्म का सम्मान करता था तथा मुक्तहस्त पार करता था।

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