हरियाणा प्रदेश में राम काव्य परंपरा

हरियाणा  प्रदेश में राम-काव्य की परंपरा की शुरुआत वि.सं. 1029 (972 ई.) से मानी जाती है। पुष्पदंत अपभ्रंश भाषा के अन्तिम कवि माने जाते हैं। इन्होंने अपनी रचना ‘तिसट्ठि महापुरिस गुणालंकार’ के 69 से 79 सर्गों में रामकथा का समावेश किया है।

संवत् 1375 से 1900 तक की अवधि हरियाणवी राम-काव्य परंपरा का स्वर्णकाल मानी जाती है। जोगिनीपुर निवासी ईसरदास ने अपनी तीन रचनाओं-‘अंगद पैर’, ‘भरत विलाप’ तथा ‘भरत मिलाप’ में राम-कथा के प्रसंगों का बड़ा सुंदर वर्णन किया है। इसी परंपरा में यमुनानगर जिले के बडिया निवासी भगवतीदास भी आते हैं। वर्तमान में इनकी लगभग 25 रचनाएँ उपलब्ध हैं। इनमें से ‘सीतासेतु’ को रामकाव्य परंपरा का उत्कष्ठ ग्रन्थ माना जा सकता है। करनाल के घरौंडा निवासी ‘रामकवि’ हृदयराम ने अपनी रचनाओं हनुमान नाटक, चित्रकुट विलास, धर्म चरित्र तथा बलि चरित्र में रामकथा के कई प्रसंगों का बड़ा सुन्दर काव्यात्मक विवरण दिया है। उनकी रचना ‘हनुमान नाटक’ को प्रदेश में ‘रामचरितमानस’ जैसा ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

अगोडा निवासी कवि रामदास ने अपनी रचना ‘रामायण’ में प्रभु श्री राम के उदात्त स्वरूप की बड़ी ही सुन्दर झांकी प्रस्तुत की है। इसी परंपरा में निर्मला साध पं. गलाब सिंह की रचना ‘आध्यात्म रामायण’ को रामकाव्य की कालजयी कृति माना जाता है। भाई संतोष सिंह ‘दार्शनिक’ कैथल नरेश के दरबारी कवि तथा इतिहासकार थे। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं-नाम कोश, गुरुनानक प्रकाश तथा गुरु प्रताप सूरज। इन्होंन वाल्मीकि रामायण का अनुवाद भी किया था।

इनके अलावा रामकाव्य परंपरा में मध्यकाल की कुछ अन्य रचनाओं को यहाँ सूचीबद्ध किया गया है।

  • कृति                            रचयिता
  • लघुरामायण                  रामसिंह
  • हनुमान जयति              रामरत्न लघुदास
  • रामकथा                        बंगा सिंह
  • रामचरितम                   विष्णु मित्र शर्मा ‘शास्त्री’
  • सुगम रामायण              रमेश चन्द्र शुक्ल
  • रामरसायनम्               लक्ष्मण सिंह अग्रवाल

हरियाणा प्रदेश में आधुनिक रामकाव्य(Modern Ramakavya in Haryana Pradesh)

सन 1957 वासी रामसिंह ‘अरमान’ ने जनसाधारण के अध्ययन के लिए ‘अरमान रामायण’ लिखी। रेवाडी जिले के कोसली में जन्मे मुखरामदास अग्रवाल जी ने  ‘श्री राम कीर्तन रामायण’ लिखी थी। इस पुस्तक के 859 पदों तथा सात काण्डों में रामकथा का बड़ा ही सजीव वर्णन किया गया है।

हारयाणा का राम काव्य परंपरा के आधुनिक कवियों में महाकवि रत्नचन्द्र शर्मा को बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस परपरा में इन्होंने पाच महाकाव्यों तथा तीन खण्ड काव्यों की रचना की। रत्नचन्द्र शर्मा जी द्वारा रचित महाकाव्यो में ‘निषादराज, आग्न पराक्षाराम राज्य’, ‘वन गमन’ तथा खंडकाव्यों में शबरी, त्रिजटा और टेक रक्षा प्रमुख है।

अंबाला निवासी महाकवि डॉ. लीलाधर वियोगी ने ‘नारी’, ‘बलराम का आत्म विसर्जन’, ‘गंधारराज शकुनि’, ‘व्याध का व्यथा आदि आठ काव्यों की रचना की। इनके अलावा डॉ. लीलाधर जी ने ‘पीड़ा की पगडंडियाँ’ में प्रभु श्रीराम के वियोगी हृदय का पाड़ा का अपन शब्दों में बड़ा ही मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है।

दक्षिणी हरियाणा के नारनौल निवासी कवि परुषोत्तम दास “निर्मल’ ने चार भागों में रचित ग्रन्थ ‘राम लीला तरग’ म राम कथा के अनेक प्रसंगों का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है। इनके साथ-साथ जीन्द निवासी कवि रामावतार ‘अभिलाषी’ ने भूमिजा तथा हनुमान छियालिसा’ की रचना करके प्रदेश में रामकाव्य की परंपरा में अपना अद्वितीय योगदान दिया।

हरियाणा प्रदेश का कृष्ण भक्ति काव्य(Krishna Devotional Poetry of Haryana Pradesh)

हरियाणा को भगवान श्रीकृष्ण की राजनैतिक तथा शौर्य की कर्मभमि माना जा सकता है। प्रदेश के कवियों द्वारा रचित कृष्ण-काव्य म भा श्रीकृष्ण के बहआयामी व्यक्तित्व का सजीव चित्रण मिलता है। अपभ्रंश के अन्तिम कवि माने जाने वाले रचनाकार पुष्पदत ( राहतक) न अपन काव्यग्रन्थ ‘महापुराण’ में श्री कृष्ण के जीवन का चित्रण किया है। 11वीं सदी में हिसार के अग्रोहा में जन्मे कवि सुधारू ने ‘पद्मचारत का रचना की थी। इस ग्रंथ में उन्होंने श्री कृष्ण के पत्र को आधार बनाकर कष्ण भक्ति काव्य की रचना की थी। फरीदाबाद जिल क साहा गाव को महाकवि सूरदास का जन्मस्थान माना जाता है। सूरदास जी जन्मांध थे परन्त, उनकी प्रतिभा अद्वितीय थी। उन्होंने श्रीकृष्ण का बाल लाला को आधार बनाकर संपूर्ण जगत को कृष्ण भक्ति का बेजोड साहित्य भेंट किया था। 17वीं सदी में करनाल जिले के घरौंडा में पैदा हुए महाकाव हृदयराम ने ‘रुक्मिणी मंगल’ नामक काव्य ग्रन्थ की रचना की थी।

संत गरीबदास (गरीबपंथ) ने ‘कृष्ण स्त्रोत’ में भगवान श्रीकृष्ण को स्मरण किया है। इसी परंपरा में अग्रोहा निवासी रामदास जी ने ‘सुदामाचरित’ की रचना की थी। रोहतक जिले के महम निवासी सैयद गलाम हुसैन शाह ने महाकवि रसखान की भाति कृष्ण भक्ति के पदों में अपनी भावनाओं का चित्रण किया। प्रदेश के कृष्ण भक्ति कवियों में भिवानी के ‘धौकल राम’ का एक विशेष स्थान है। इन्होंने ‘रुक्मिणी मंगल’, ‘प्रेम सिन्धु’ तथा ‘महाभारत’ की रचना की। कृष्ण-काव्य परंपरा के अन्य कवि साहिब सिंह ‘मृगेन्द्र’ थे। इन्होंने अपनी रचनाओं-बारहमासा श्री कृष्ण-राधा, बारहमासा श्री राधा, रासमण्डल लीला तथा कृष्ण कौतुहल के माध्यम से अपनी कृष्ण भक्ति को मूर्त रूप दिया था। थानेसर निवासी उमादास एक अन्य कृष्ण भक्त कवि हुए हैं। उमादास ने ब्रजभाषा में ‘सुदामा-चरित’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी।

हरियाणा प्रदेश के कृष्ण-काव्य परंपरा के महत्त्वपूर्ण कवि तथा उनकी रचनाएँ(Important poets of Krishna-poetic tradition of Haryana region and their compositions)

  • जुगतानंद गुसाईं-जुगतानंद गुसाईं जी का जन्म गुड़गाँव जिले के राता गांव में हुआ था। ‘भक्ति प्रबोध’ इनकी प्रमुख काव्य कृति है।
  • शंभुदयाल-चरखी दादरी निवासी शंभु दयाल महाराजा जीन्द के दरबारी कवि थे। कृष्ण काव्य परंपरा में इन्होंने चार ग्रन्थों-रुक्मणी मंगल, कृष्ण लीला, जोगन लीला तथा भजन सागर की रचना की थी।
  • लक्ष्मी नारायण शर्मा ‘कृपाण’-कवि लक्ष्मीनारायण शर्मा जी का जन्म स्थान भिवानी है। शर्मा जी ने लगभग 40 ग्रन्थों की रचना की। इनकी काव्य रचनाएँ “श्याम बावनी’ तथा ‘शिशुपाल वध’ कृष्ण भक्ति को समर्पित हैं।
  • रामस्वरूप-तावडू निवासी रामस्वरूप जी ने ‘कृष्ण लीला’ की रचना की। उनका यह ग्रन्थ ब्रज भाषा में है। . तुलसीराम शर्मा ‘दिनेश’-भिवानी जिले में जन्मे पं. तुलसीराम शर्मा ‘दिनेश’ ने एक दर्जन से अधिक ग्रन्थों की रचना की है। इनकी कृतियाँ ‘श्याम सतसई’ तथा ‘पुरुषोत्तम’ कृष्ण भक्ति के महान ग्रन्थ हैं।
  • ब्रह्मदत्त ‘वाग्गिम’-ब्रह्मदत्त जी ने ‘मेड़तानी मीरा’ की रचना की थी।
  • खुशीराम शर्मा वशिष्ठ-पं. खुशीराम शर्मा के कृष्ण-काव्य ग्रन्थ ‘रण निमंत्रण’ तथा ‘मीराबाई’ इस परंपरा में मील का पत्थर माने जाते हैं।
  • भारत भूषण ‘सांघीवाल’- भारत भूषण जी ने ‘सुदामा सौरभ’ नामक काव्य ग्रन्थ की रचना की थी। यह महाकाव्य दस सर्गों तथा 384 छंदों में रचित है।
  • पुरुषोत्तम दास ‘निर्मल’-नारनौल निवासी पुरुषोत्तम दास जी ने ‘महाभारत रत्न’ की रचना की थी।
  • लक्ष्मी नारायण शर्मा-कैथल निवासी लक्ष्मी नारायण शर्मा ने ‘वत्सला’ की रचना की थी। इस काव्य ग्रन्थ में शर्मा जी ने भगवान श्री कृष्ण के जीवन के विकास-क्रम का सुन्दरता के साथ वर्णन किया है।
  • मंगलराम आत्रेय-कुरुक्षेत्र निवासी कवि श्री मंगलराम आत्रेय जी ने ‘यमुना के उस पार नामक नाटक काव्य की रचना की थी।
  • पं. माधव कौशिक-भिवानी जिले में जन्मे पं. माधव कौशिक ने ‘लौट आओ पार्थ’ तथा ‘सुनो राधिका’ नामक दो खण्डकाव्यों के माध्यम से अपनी कृष्ण भक्ति का चित्रण किया था। इन खण्डकाव्यों के माध्यम से उन्होंने वर्तमान समाज की पलायन वत्ति पर सकारात्मक शैली में करारा प्रहार किया है।

हरियाणा प्रदेश के प्रसिद्ध दरबारी कवि तथा उनकी रचनाएँ(Famous court poet of Haryana state and his compositions)

प्रदेश के साहित्य जगत में दरबारी कवियों तथा साहित्यकारों के योगदान को बिसराया नहीं जा सकता। अकबर के दरबार क नव भी थे। नारनौल में बीरबल की हवेली बताई जाती है तथा यमनानगर जिले के बडिया में बीरबल ने अपना रंगमहल बनवाया था। मुगल बादशाह अकबर ने बीरबल को कविराय की उपाधि दी थी।

मक काव का प्रमुख स्थान है। देव युवावस्था में दादरी के सेठ सीता राम के आश्रय में रहे थे। यहीं रहकर उन्होंने ‘भवानी विलास’ की रचना की थी।

  • जुगल किशोर भट्ट-कैथल निवासी जुगल किशोर भटट मगल बादशाह महम्मद शाह ‘रंगीला’ के दरबारी थे। इन्होंने ‘अलंकार निधि’ तथा ‘कवित्त संग्रह’ की रचना की थी।
  • भाई संतोष सिंह-भाई संतोष सिंह कैथल नरेश भाई उदय सिंह के दरबारी थे। इन्होंने अमर कोष (भाषानुवाद), नानक प्रकाश, आत्मपुराण (भाषानुवाद), गुरुप्रताप सूरज आदि ग्रन्थों की रचना की थी।
  • मुकन्द दास-रेवाड़ी जिले के बावल में जन्मे कवि मकन्द दास पटियाला के महाराजा कर्मसिंह के दरबारी कवि थे। इनकी रचनाओं में ‘रसिक शिरोमणि’ तथा ‘सूर्य संग्रह’ नामक ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं।
  • कवि बगा सिंह-बंगा सिंह जी लाडवा के धनिक टीका निहाल सिंह के आश्रित थे। इन्होंने ‘रामकथा’ नामक राम-काव्य की रचना की थी। शंभु दयाल-दादरी निवासी शंभु दयाल जीन्द के महाराजा के दरबारी थे।
  • शंभ दयाल ‘राग-रागनी’ शैली में पदों की रचना करते थे। इन्होंने ‘रुक्मणी मंगल’, ‘कृष्ण लीला’, ‘जोगन लीला’ तथा ‘भजन सागर’ आदि ग्रन्थों की रचना की थी।
  • मनमोहन-दादरी निवासी कवि मनमोहन भी जीन्द नरेश रणबीर सिंह के दरबारी थे। इन्होंने ‘रणबीर प्रकाश’ नामक ग्रन्थ की रचना की थी।

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