शिक्षण प्रक्रिया के सिद्धान्त

Principles of teaching process

शिक्षण प्रक्रिया के सिद्धान्त के सन्दर्भ में विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षाविदों द्वारा कुछ सिद्धान्त दिए गए हैं, जो इस प्रकार हैं

निश्चित उद्देश्य का सिद्धान्त (Principle of definite purpose)

अध्यापन का कार्य करने से पूर्व शिक्षकों को पढ़ाने का उद्देश्य निर्धारित करना चाहिए। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के सन्दर्भ में प्रत्येक विषयवस्तु का अपना एक महत्त्व होता है, जो शिक्षक एवं छात्र दोनों को एक लक्ष्य प्रदान करता है। ये लक्ष्य दो प्रकार के होते हैंप्रथम सामान्य उद्देश्य तथा द्वितीय विशिष्ट उद्देश्य। सामान्य उद्देश्य विषयवस्तु से सम्बन्धित अध्याय से होता है, जबकि विशिष्ट उद्देश्य का सम्बन्ध किसी अध्याय से होता है।

परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त (Correlation theory)

यह सिद्धान्त परस्पर सम्बन्ध के आधार पर शिक्षण प्रणाली को मजबूत बनाने पर जोर डालता है। दसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि यह सिद्धान्त आगमनात्मक से निगमनात्मक शिक्षण नियमों का अनुसरण करता है। यदि कोई अध्यापक अपने वर्ग संज्ञा के विषय में पढ़ाता है, तो उस अध्याय को वर्तमान उपस्थित उदाहरणों से जोड़कर पढ़ाना चाहिए, जैसे-कुर्सी, टेबल, कलम एवं आम इत्यादि।

अभिप्रेरणा का सिद्धान्त (Principle of motivation)

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में अभिप्रेरणा असाधारण भूमिका निभाती है। यह अभिप्रेरणा आन्तरिक एवं बाह्य दो रूपों में होती है। आन्तरिक अभिप्रेरणा व्यक्तिगत रूप से स्वयं द्वारा संचालित होती हैं तथा यह किसी कार्य को करने के लिए व्यक्ति को स्वयं अभिप्रेरित करती है।

पुनरीक्षण एवं अभ्यास का सिद्धान्त (Theory of review and practice)

यह प्रसिद्ध लोकोक्ति है कि अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है। यह लोकोक्ति शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षण के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण पहलू होता है, क्योंकि शिक्षक विद्यार्थियों को विषय-वस्तु से सम्बन्धित अभ्यास एवं गृहकार्य प्रदान करता है, जो छात्रों की मूल्यांकन की एक विधि भी हैं यह मूल्यांकन प्रक्रिया छात्रों को . रचनात्मक मूल्यांकन में मदद करती है।

पुनर्बलन का सिद्धान्त (Theory of reinforcement)

यह सिद्धान्त प्रसिद्ध व्यावहारवादी मनोवैज्ञानिक बी एफ स्किनर द्वारा दिया गया है । इस सिद्धान्त के अनुसार पुनर्बलन दो प्रकार के होते हैं- प्रथम, सकारात्मक पुनर्बलन जो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की दर को बढ़ाता है तथा द्वितीय नकारात्मक पुनर्बलन जो शिक्षण अधिगम प्रक्रिया की दर को घटाती हैं सकारात्मक पुनर्बलन पुरस्कार से सम्बन्धित होता है, जो व्यक्तिगत रूप से कठोर परिश्रम पर आधारित होता है। 

उत्तेजना या प्रोत्साहन का सिद्धान्त (Theory of excitement)

उत्तेजना पद (term) किसी कार्य को व्यक्तिगत रूप से करने की अवस्था को दर्शाती है। इस सिद्धान्त के अनुसार, यदि कोई विद्यार्थी व्यक्तिगत रूप से कार्य के प्रति उत्तेजित रहता है, तो वह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के दौरान अधिक सक्रिय एवं सृजनशील होगा। किसी व्यक्ति को उत्तेजित करने के लिए विभिन्न कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो वातावरण, व्यक्तिगत अभिरुचि, शिक्षण तकनीक तथा शिक्षण-अधिगम सामग्री के रूप में होता है।

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