पियाजे, कोहबर्ग एवं वाइगोत्स्की के सिद्धान्त

Principles of Piaget, Kohlberg, and Vygotsky

बाल विकास के सिद्धान्त के सन्दर्भ में जीन पियाजे, लॉरेन्स कोहबर्ग एवं लेव वाइगोत्स्की ने अपने-अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किए हैं, जो बालकों की विभिन्न अवस्थाओं, उनके संज्ञानात्मक विकास, नैतिक विकास तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास इत्यादि से सम्बन्धित हैं। पियाजे के अनुसार शिक्षकों को प्रयोगात्मक शिक्षा एवं व्यावहारिक शिक्षा पर बल देना चाहिए। कोहबर्ग ने नैतिक विकास के सन्दर्भ में विभिन्न सोपानों का वर्णन किया है। वाइगोत्स्की ने संज्ञानात्मक विकास में भाषा एवं चिन्तन दोनों को महत्त्वपूर्ण घटक माना है।

मानव विकास की वृद्धि एवं विकास के कई आयाम होते हैं। विकास की विभिन्न अवस्थाओं में बालकों में – विविध प्रकार के गुण एवं विशेषताएँ पाई जाती हैं। इसका अध्ययन मनोवैज्ञानिकों ने विकास की अवस्थाओं के सन्दर्भ में किया है, जो सिद्धान्त के रूप में हमारे सामने हैं। विकास की अवस्थाओं से सम्बन्धित सिद्धान्तों के देने वाले वैज्ञानिकों में पियाजे, कोहबर्ग एवं वाइगोत्स्की का नाम उल्लेखनीय है।

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त(Jean Piaget’s theory of cognitive development)

जीन पियाजे (1896-1980) स्विट्जरलैण्ड के एक मनोवैज्ञानिक थे। बालकों में बुद्धि का विकास किस प्रकार से होता है, यह जानने के लिए उन्होंने अपने स्वयं के बच्चों को अपनी खोज का विषय बनाया। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते गए, उनके मानसिक विकास सम्बन्धी क्रियाओं का वे बड़ी बारीकी से अध्ययन करते रहे। इस अध्ययन के परिणामस्वरूप उन्होंने जिन विचारों का प्रतिपादन किया, उन्हें पियाजे के मानसिक या संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है।

  • संज्ञानात्मक विकास का तात्पर्य बच्चों के सीखने और सूचनाएँ एकत्रित करने के तरीके से है। इसमें अवधान में वृद्धि प्रत्यक्षीकरण, भाषा, चिन्तन, स्मरण शक्ति और तर्क शामिल हैं।
  • पियाजे के संज्ञानात्मक सिद्धान्त के अनुसार, वह प्रक्रिया जिसके द्वारा संज्ञानात्मक संरचना को संशोधित किया जाता है, समावेशन कहलाती है।
  • पियाजे ने अपने इस सिद्धान्त के अन्तर्गत यह बात सामने रखी कि बच्चों में बुद्धि का विकास उनके जन्म के साथ जुड़ा हुआ है। प्रत्येक बालक अपने जन्म के समय कुछ जन्मजात प्रवृत्तियों एवं सहज क्रियाओं को करने सम्बन्धी योग्यताओं; जैसे-चूसना, देखना, वस्तुओं को पकड़ना, वस्तुओं तक पहुँचना आदि को लेकर पैदा होता है। अत: जन्म के समय बालक के पास बौद्धिक संरचना के रूप में इसी प्रकार की क्रियाओं को करने की क्षमता होती है, परन्तु जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उन बौद्धिक क्रियाओं का दायरा बढ़ जाता है और वह बुद्धिमान बनता चला जाता है।
  • बच्चों में दुनिया के बारे में समझ विकसित करने की क्षमता पैदा हो जाती है। वातावरण के अनुसार स्वयं को ढालना अनुकूलन कहलाता है। बच्चों में वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने की बेहतर क्षमता होती है।
  • पूर्व ज्ञान के साथ नवीन ज्ञान को जोड़ने की प्रक्रिया को आत्मसातीकरण (Assimilation) कहते हैं।
  • जब बालक अपने पुराने स्कीमा अर्थात् ज्ञान में परिवर्तन करना प्रारम्भ कर देता है तो वह प्रक्रिया समायोजन (Adjustment) कहलाती है।
  • पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के अनुसार, हमारे विचार और तर्क अनुकूलन के भाग हैं। संज्ञानात्मक विकास एक निश्चित अवस्थाओं के क्रम में होता है। संवेदी प्रेरक अवस्था अनुकरण (Imitation), स्मृति (Memory) एवं मानसिक निरूपण पर आधारित होती है।
  • पियाजे का मानना है कि “सीखने का अर्थ ज्ञान निर्माण करना है।”
  • एक ऐसी प्रक्रिया जिसके अन्तर्गत बालक आत्मसातकरण तथा समायोजन की प्रक्रियाओं के मध्य एक सन्तुलन स्थापित करना है, साम्ययावरण कहलाता है। किसी नई समस्या का समाधान करते समय यही सन्तुलन बालक के संज्ञान को सन्तुलित करता है।

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