बाल केन्द्रित शिक्षण के सिद्धान्त

बाल केन्द्रित शिक्षण के प्रमुख सिद्धान्त निम्न हैं:

  • प्रेरणा का सिद्धान्त
  • व्यक्तिगत अभिरुचि का सिद्धान्त
  • लोकतान्त्रिक सिद्धान्त
  • सर्वांगीण विकास का सिद्धान्त
  • चयन का सिद्धान्त
  • व्यक्तिगत विभिन्नता का सिद्धान्त
  • क्रियाशीलता का सिद्धान्त

प्रेरणा का सिद्धान्त

बालकों को प्रेरित करने के लिए उन्हें महापुरुषों की जीवनगाथा, नाटक, वैज्ञानिकों का योगदान इत्यादि के बारे में बताकर उन्हें प्रेरित करना चाहिए। कहानी एवं कविता के माध्यम से भी बालकों को प्रेरित किया जा सकता है।

व्यक्तिगत अभिरुचि का सिद्धान्त

बालकों को यदि उनकी रुचि के अनुसार शिक्षण मिलेगा तो पढ़ने के प्रति जागरूक एवं उत्सुक होंगे। शिक्षक को बाल अभिरुचि को ध्यान में रखकर ही शिक्षण कार्य करना चाहिए।

लोकतान्त्रिक सिद्धान्त

शिक्षक को सभी छात्रों को एक समान दृष्टिकोण से देखना चाहिए, न कि भेदभावपूर्ण तरीके से। प्रश्न पूछने या उत्तर देने के सन्दर्भ में शिक्षक को भेद-भाव नहीं करना चाहिए।

सर्वांगीण विकास का सिद्धान्त

बालकों में उसके सभी पक्षों को (सामाजिक, सांस्कृतिक, चारित्रिक, खेल, नेतृत्व) विकसित करने पर बल देना चाहिए। इसके माध्यम से बच्चों का सर्वांगीण विकास हो पाएगा।

चयन का सिद्धान्त

बालकों की योग्यता के अनुरूप ही विषय-वस्तु का चयन करना चाहिए। बालकों की मानसिक दशा का भी शिक्षण के दौरान ध्यान रखना चाहिए।

व्यक्तिगत विभिन्नता का सिद्धान्त

प्रत्येक बालक की बुद्धि-लब्धि अलग-अलग होती है अत: शिक्षक को शिक्षा देते समय व्यक्तिगत भिन्नता का ध्यान रखना चाहिए।

क्रियाशीलता का सिद्धान्त

इस शिक्षण सिद्धान्त द्वारा छात्रों को क्रियाशील रखकर ज्ञान प्रदान किया जाता है। किसी भी क्रिया को करने में छात्र के हाथ, पैर व मस्तिष्क सब क्रियाशील हो जाते हैं अर्थात् छात्र की एक से अधिक ज्ञानेन्द्रियों व एक से अधिक कामेन्द्रियों का प्रयोग होने से छात्र द्वारा किया गया अधिगम बहुत ही प्रभावी एवं दीर्घ हो जाता है।

बाल-केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक की भूमिका

  • बाल-केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक बालकों का सहयोगी तथा मार्गदर्शक के रूप में होता है। वह बालकों का सभी प्रकार से मार्गदर्शन करता है और विभिन्न क्रिया-कलापों को क्रियान्वित करने में सहायता करता है।
  • शिक्षक को शिक्षा के यथार्थ उद्देश्यों के प्रति पूर्णतया सजग रहना चाहिए। शिक्षक का उद्देश्य बालकों को केवल पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करना मात्र ही नहीं होता, वरन् बाल-केन्द्रित शिक्षा का महानतम् लक्ष्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है, इसलिए शिक्षक को इस उद्देश्य की पूर्ति में बालक की अधिक-से-अधिक सहायता करनी चाहिए। यह कहना उचित होगा कि शिक्षक वह धुरी है जिस पर बाल-केन्द्रित शिक्षा कार्यरत है।’
  • बाल-केन्द्रित शिक्षा की सफलता शिक्षक की योग्यता पर निर्भर करती है। बाल-केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक को स्वतन्त्र रहते हुए यह निर्णय लेना चाहिए कि बालक को क्या सिखाना है? उसके अनुसार ही स्थानीय पर्यावरण का चयन, पाठ्यक्रम आदि का निर्णय स्थानीय समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
  • अत: निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि बाल-केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक की मार्गदर्शक के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, बिना उसके मार्गदर्शन के शिक्षा अधूरी हो जाती है।
  • यदि विद्यालय में कोई विद्यार्थी विलम्ब (Late) से आता है तो शिक्षक को उस विद्यार्थी से विलम्ब से आने का कारण पूछना चाहिए, न की बिना कारण जाने उसे दण्ड देना चाहिए।

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