पियाजे का नैतिक विकास का सिद्धान्त

Piaget’s theory of moral development

बच्चे नैतिक मुद्दों के बारे में किस तरह सोचते हैं, इस विषय में पियाजे ने 4 से 12 वर्ष के आयु के बच्चों का अवलोकन और साक्षात्कार किया। उन्होंने पाया कि जब बच्चे नैतिकता के बारे में सोचते हैं, तो वे दो अलग अवस्थाओं से होकर गुजरते हैं।

परायत्त नैतिकता की अवस्था(Abandoned morality)

4 से 7 वर्ष में बच्चे बाहरी सत्ता से प्राप्त नैतिकता दिखाते हैं जोकि पियाजे के नैतिक विकास के सिद्धान्तों की पहली अवस्था है। बच्चे न्याय और नियमों को दुनिया के ना बदलने वाले गुणधर्म मानते हैं, ऐसी चीज जो लोगों के बस से बाहर हो।

स्वायत्त नैतिकता की अवस्था(State of autonomous morality)

7 से 10 वर्ष की आयु में बच्चे नैतिक चिन्तन की पहली से दूसरी अवस्था के बीच की एक मिली-जुली स्थिति में होते हैं। 10 वर्ष या उससे बड़े बच्चे स्वायत्ता पर आधारित नैतिकता दिखाते हैं। वो यह बात जान जाते हैं कि नियम और कानून लोगों के बनाए हुए हैं और किसी के कार्य का मूल्यांकन करने में वे करने वाले व्यक्ति के इरादों और कार्य के परिणामों के ऊपर भी विचार करते हैं।

क्योंकि छोटे बच्चे बाहरी सत्ता वाली नैतिकता पर होते हैं, वे किसी के व्यवहार के बारे में सही और गलत का निर्णय उस व्यवहार से होने वाले परिणामों को देखकर लेते हैं न कि व्यवहार कर्ता के उद्देश्यों के आधार पर।

  • बाहरी सत्ता के आधार पर नैतिक चिन्तन करने वाले बच्चे यह भी मानते हैं कि नियम ना बदलने वाली चीज है और यह नियम किसी शक्तिशाली सत्ता के द्वारा दिए गए हैं।
  • जब पियाजे ने छोटे बच्चों को सुझाया कि वह कंचे के खेल के नए नियम बनाएँ तो छोटे बच्चों ने मना कर दिया।
  • दूसरी तरफ बड़े बच्चों ने परिवर्तन को स्वीकारा और पहचाना कि नियम सिर्फ हमारी आसानी के लिए बनाए गए हैं जिन्हें बदला जा सकता है। बाहरी सत्ता के आधार पर नैतिक चिन्तन करने वाले बच्चे तुरन्त न्याय की धारणा में भी विश्वास रखते हैं।
  • नैतिक तर्क को लेकर इस तरह के परिवर्तन कैसे आते हैं? पियाजे मानते हैं कि बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं उनकी सोच सामाजिक मुद्दों के बारे में बारीक होती चली जाती है। पियाजे का मानना है कि सामाजिक समझ साथियों के साथ आपसी लेन-देन से आती है।

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