पंजाब विभाजन एवं हरियाणा का राज्य के रूप में उदय

1857 का क्रान्ति क दुःखद अत के उपरान्त प्रदेश की कछ रियासतों-जीन्द. पटौदी. लोहारू दजाना, नाभा में सम्मिलित बावल, कनीना और अटला का क्षेत्र तथा पटियाला में सम्मिलित नारनौल के क्षेत्र को छोडकर समस्त प्रदेश को अंग्रेजों ने पंजाब राज्य में विलय कर दिया। दोनों क्षेत्रों का सस्कृति, खान-पान, वेशभूषा और भाषा में जमीन-आसमान का अन्तर था। 1947 ई. तक आते-आते लगभग 90 वर्ष तक दोनों क्षेत्रों के साथ-साथ रहने के बावजूद पंजाबी तथा हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोग परस्पर घुल-मिल नहीं पाए।

एतिहासिक साहित्य के अवलोकन से पता चलता है कि 1925 ई. में मुस्लिम लीग के भारत की राजधानी दिल्ली अधिवेशन की स्वागत समिति के अध्यक्ष पीरजादा मुहम्मद हुसैन ने सर्वप्रथम हरियाणा राज्य के क्षेत्र को पंजाब से अलग करके दिल्ली में मिलाने की मांग उठाई थी। यद्यपि इस मांग के पीछे उसकी सांप्रदायिक भावनाएं जिम्मेदार थीं परन्तु, इसके पश्चात् हरियाणा गठन की मांग जोर पकड़ती गई।

1928 में दिल्ली में आयोजित सर्वदल सम्मेलन में भी दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा पुनः यही मांग की गई। इसके केवल तीन वर्ष उपरान्त 1931 में लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भी पंजाब के प्रतिनिधि के रूप में ज्यॉफ्री कॉर्बेट ने पंजाब की अंबाला डिवीजन को पंजाब से अलग करके राज्य के पुनर्गठन का सुझाव दिया। 9 दिसंबर, 1932 को प्रखर राष्ट्रवादी नेता देशबंधु गुप्ता ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए। उनके अनुसार, “भारत के इतिहास में अंबाला डिवीजन के शिमला जिले को छोड़कर, यह डिवीजन कभी भी पंजाब का भाग नहीं रहा।”

परन्तु, हिन्दू महासभा निरंतर इस मांग का विरोध करती आई थी। 1946 ई. में दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय भाषाई कांफ्रेंस में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने अपने भाषण में सरकार से पंजाब राज्य के पुनर्गठन के सुझाव को मानने की मांग की। 1946 ई. में भारत की संविधान सभा के गठन के उपरांत सांघी निवासी चौ. रणबीर सिंह हुड्डा इस सभा के सदस्य बने। चौ. रणबीर सिंह ने भी प्रदेशवासियों की इस मांग को निरंतर संविधान सभा में उठाया। 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी के उपरान्त यह मांग निरंतर जोर पकड़ती गई। मांग केवल हरियाणा के गठन की ही नहीं थी। पंजाबी सूबे के पक्षकार भी कई लोग थे। 1948 ई. में पंजाब के अकाली नेता मास्टर तारासिंह ने अपने पत्र ‘अजीत’ में सांप्रदायिक आधार पर अलग सिख राज्य की मांग की। इसके उपरान्त ‘पेप्सू’ की कम्यूनिस्ट पार्टी ने पंजाबी सूबे के गठन की मांग उठाई।

सच्चर फार्मूला

सच्चर फार्मूला 1 अक्तूबर, 1949 को लागू हुआ था। लाला भीमसेन सच्चर उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने परे पंजाब को एक भाषी (पंजाबी भाषी) राज्य बनाने के लिए यह रास्ता निकाला था। इस व्यवस्था के अनुसार हिन्दी भाषी क्षेत्र (हरियाणा का क्षेत्र) के छात्रों के लिए स्कूलों में पंजाबी पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया। इसे सर्वमान्य बनाने के उद्देश्य से पंजाबी भाषी क्षेत्र में छात्रों के लिए हिन्दी पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया। हिन्दी क्षेत्र में रोहतक, हिसार, गुडगांव, करनाल. काँगडा जिले तथा अंबाला जिले की जगाधरी और नारायणगढ़ तहसीलें रखी गई थीं। शेष क्षेत्र पंजाबी क्षेत्र में रखा गया था। परन्तु, भारी जनविरोध के कारण यह फार्मूला भी असफल हो गया।

राज्य पनर्गठन आयोग (फजल अली आयोग) का गठन

पूरे देश में भाषा एवं संस्कृति के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग जोर पकड रही थी। इस मांग को देखते हुए 29 दिसंबर, 1953 को भारत सरकार द्वारा सैयद फजल अली की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के समक्ष हरियाणा तथा पंजाबी सूबे के गठन की माँग की पुरजोर तरीके से उठी। पंजाब विधानसभा में हरियाणा के सभी 22 विधायकों ने एकमत होकर हरियाणा के गठन की माँग की। परन्तु, फजल अली आयोग से हरियाणा की जनता को निराशा ही हाथ लगी।

क्षेत्रीय फार्मूला

फजल अली आयोग की रिपोर्ट से नाराज हरियाणा की जनता को शांत रखने के लिए पंजाब सरकार ने पंजाब को भाषाई आधार पर दो क्षेत्रों में बांटने की सिफारिश केन्द्र सरकार को भेजी। इस सिफारिश के आधार पर 24 जुलाई, 1956 को एक नया फार्मूला आ गया।
इस फार्मूले के अनुसार –

  • पंजाब राज्य को द्विभाषी घोषित कर दिया गया। हिन्दी तथा पंजाबी, राज्य की आधिकारिक भाषाएं मान ली गई।
  • राज्य को दो क्षेत्रों में बांट दिया गया
  1. हिन्दी क्षेत्र – हिसार, रोहतक, गुड़गाँव, करनाल, अंबाला, जगाधरी, नारायणगढ़, महेन्द्रगढ़, कोहिस्तान, संगरूर जिले की नरवाना तहसील, शिमला और काँगड़ा।
  2. पंजाबी क्षेत्र – पंजाब प्रांत का शेष बचा हुआ क्षेत्र। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु भारतीय संविधान के 7वें संशोधन विधेयक की राष्ट्रपति महोदय द्वारा 24 जुलाई, 1956 को अब गई। तत्पश्चात् यह क्षेत्रीय बंटवारा प्रभावी हो गया। इस योजना के अनुसार –
  • दोनों क्षेत्रों की साझी विधानसभा तथा सांझा राज्यपाल होना निश्चित किया गया।
  • हर क्षेत्र की भाषा, जिला तथा उस जिले की अपनी भाषा नियत की गई।
  • हर क्षेत्र की व्यवस्था के लिए एक क्षेत्रीय कमेटी बनाई गई जिसमें उस क्षेत्र के विधायक होते थे। प्रत्येक क्षेत्र के विषय में , बनाने से पूर्व संबंधित कमेटी से अनुमति लेना आवश्यक था। लगभग 1 वर्ष तक येन-केन-प्रकारेण ये समितियाँ कार्य करती 1957 में प्रताप सिंह कैरों के मुख्यमंत्री बनने के पश्चात् उसने इन समितियों की शक्ति तथा कार्य-स्वतंत्रता दोनों को ही सीमित कर दिया और इस प्रकार यह युक्ति भी असफल हो गई।

पंजाब के पुनर्गठन के लिए जनांदोलन

सुलह की युक्ति के रूप में लागू की गई ‘क्षेत्रीय योजना’ के असफल होते ही एकभाषी राज्यों के गठन के पैरोकारों का धैर्य भी जवाब दे गया। हरियाणा तथा पंजाबी सूबे के गठन के समर्थकों ने अपनी-अपनी एक्शन कमेटी बनाकर आंदोलन शुरू कर दिया। पंजाबी सूबे के समर्थक मास्टर तारासिंह के नेतृत्व में आंदोलन कर रहे थे। उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। तारा सिंह की गिरफ्तारी के उपरान्त आन्दोलनकारियों का स्थान संत फतेहसिंह ने ले लिया। फतेहसिंह ने पंजाबी सूबे की अपनी मांग मनवाने के लिए 18 नवंबर, 1960 से आमरण अनशन की घोषणा की तथा सत्याग्रह छेड़ दिया। उनके आहवान पर लगभग 57 हजार लोगों ने अपनी गिरफ्तारी दी।

सरकार ने फतहसिंह के सत्याग्रह को विचलित करने के लिए मास्टर तारासिंह को रिहा कर दिया। मास्टरजी संत फतहसिंह का व्रत तुड़वाकर खुद अनशन पर बैठ गए। परन्तु, 48 दिन बाद स्वयं ही अपना उपवास खत्म कर दिया। इस घटना के बाद मास्टर तारासिंह अपना प्रभाव खो बैठे। इसी तरह के हालात हरियाणा के क्षेत्र में भी थे। यद्यपि यहां संत फतेहसिंह जैसा अनशनकारी कोई नहीं था। वर्ष 1965 के उत्तरार्ध में पंजाबी सूबे की मांग को लेकर संत फतेहसिंह ने पुनः उपवास रखने तथा 15 दिन उपरान्त आत्मदाह की घोषणा कर दी। परन्तु, भारत-पाक युद्ध के कारण संत फतेहसिंह को अपना उपवास स्थगित करना पड़ा। युद्ध के उपरान्त संत फतेहसिंह ने 15 अगस्त, 1965 से उपवास तथा उसके 25 दिन बाद 10 सितंबर, 1965 को आत्मदाह करने की घोषणा कर दी। संत फतेहसिंह के उपवास तथा राज्य के बंटवारे का जनसंघ, आर्यसमाज तथा हिन्दू महासभा ने खुलकर विरोध किया।

फतहसिंह के सत्याग्रह का असर हुआ। 6 सितंबर, 1965 को भारत सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री श्री गुलजारी लाल नंदा ने लोकसभा में हिन्दी तथा पंजाबी क्षेत्रों की समस्याओं पर विचार करने का आश्वासन दिया। 23 सितंबर, 1965 को केन्द्र सरकार ने पंजाब के पुनर्गठन के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए संसदीय समिति के गठन की घोषणा कर दी। शीघ्र ही सरदार हुक्मसिंह जी के नेतृत्व में पंजाब के पुनर्गठन के प्रश्न पर विचार हेतु संसदीय समिति का गठन कर दिया गया।

17 अक्तूबर, 1965 को रोहतक में सभी दलों, सभी पक्षों तथा हरियाणा के क्षेत्र के सभी विधायकों की सभा हुई जिसमें हरियाणा गठन के समर्थन में प्रस्ताव पास किए गए। हुक्मसिंह समिति ने पंजाब के पुनर्गठन की मांग को स्वीकार करते हुए केन्द्र सरकार से पंजाब के पुनर्गठन हेतु एक सीमा आयोग गठित किए जाने की अनुशंसा कर दी।

हुक्म सिंह समिति की सिफारिशों के अनुसार भारत सरकार ने 23 अप्रैल, 1966 को जस्टिस जे.सी. शाह की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय सीमा आयोग का गठन कर दिया। इस आयोग के अन्य दो सदस्य श्री एम.एम. फिलिप तथा एस. दत्त थे। इस आयोग ने 23 मई, 1966 को अपनी रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी। जे.सी. शाह आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए 18 सितंबर, 1966 को भारतीय संसद ने पंजाब पुनर्गठन विधेयक, 1966 (सं. 3) पारित कर दिया।

इस विधेयक के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रावधान यहाँ सूचीबद्ध हैं

इस अधिनियम के भाग 2 के अनुच्छेद 3 में हरियाणा की सीमाएँ निर्धारित की गई हैं। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के अनुसार
1. एक निश्चित दिन से एक नए राज्य का निर्माण होगा जो ‘हरियाणा’ कहलाएगा। इस राज्य में पंजाब के निम्नलिखित क्षत्र
सम्मिलित होंगे(अ) हिसार, रोहतक, गुड़गाँव, करनाल और महेन्द्रगढ़ जिले।
(आ) संगरूर जिले की नरवाना और जीन्द तहसील।
(इ) अंबाला जिले की अंबाला, जगाधरी और नारायणगढ़ तहसील।
(ई) अंबाला जिले की खरड़ तहसील की पिंजौर कानूनगो सर्कल।
(उ) अंबाला जिले की खरड़ तहसील के मनीमाजरा के कानूनगो सर्कल का वह क्षेत्र जो प्रथम परिच्छेद में अनुसूचित –

2. उप-अनुच्छेद (आ) में वर्णित क्षेत्र से हरियाणा राज्य के अन्तर्गत जींद नाम का नया जिला बनेगा।
3. उप-अनुच्छेद (1) की धारा (आ), (इ) और (ई) में वर्णित क्षेत्र से हरियाणा राज्य के अन्तर्गत अंबाला नाम का नया जिला बनेगा।
4. अनुच्छेद-4 के अन्तर्गत चंडीगढ़ को केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया।
पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के भाग-3 में विधानपालिकाओं के विषय में बताया गया है। इस भाग के
1. अनुच्छेद-7 में राज्यसभा के तत्कालीन 11 सदस्यों के दोनों राज्यों में बंटवारे की व्यवस्था है।
2. अनुच्छेद-9 में लोकसभा के सदस्यों की स्थिति के विषय में बताया गया है।
3. अनुच्छेद-10 में राज्य की विधानसभा के सदस्यों को बांटा गया है।

संयुक्त पंजाब प्रांत की विधान सभा के 54 सदस्य जो हरियाणा के क्षेत्र से चुनकर गए थे वे हरियाणा के हिस्से में आए। इस अधिनियम के भाग-4 में हाईकोर्ट के विषय में व्यवस्था दी गई थी। इस भाग के अनुच्छेद 21 में पंजाब तथा हरियाणा, दोनों राज्यों के लिए सांझे हाइकोर्ट की व्यवस्था की गई है।
पजाब पुनर्गठन विधेयक, 1966 को राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदिन किए जाने के उपरान्त 1 नवंबर, 1966 को देश के 17वें राज्य के रूप में हरियाणा राज्य का उदय हुआ। श्री धर्मवीर को राज्य का प्रथम राज्यपाल नियुक्त किया गया। राज्यपाल की सलाह पर राष्ट्रपति ने उस समय चुनाव न करवाकर पंजाब विधान सभा से ही हरियाणा के विधायकों को लेकर हरियाणा विधानसभा का गठन किया। नवगठित विधानसभा द्वारा कांग्रेस नेता पं. भगवत दयाल शर्मा को अपना नेता चुने जाने के उपरान्त उन्हें हरियाणा का प्रथम मुख्यमंत्री बनाया गया।

पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के अनुच्छेद-4 के अनुसार चण्डीगढ़ को केन्द्र शासित राज्य का दर्जा देकर पंजाब तथा हरियाणा दोनों प्रदेशों की साझी राजधानी बनाया गया। 1 नवंबर, 1966 को हरियाणा गठन के समय राज्य में कुल सात (07) जिले-अंबाला, करनाल, रोहतक, हिसार, गुरूग्राम, जीन्द तथा महेन्द्रगढ़ थे। इसके पश्चात् 22 दिसंबर, 1972 को भिवानी तथा सोनीपत-दो नए जिले बनाए गए। 23 जनवरी, 1973 को करनाल जिले का विभाजन करके कुरूक्षेत्र को जिला बनाया गया। 1975 में सिरसा तथा 2 अगस्त, 1979 को फरीदाबाद को जिले का दर्जा दिया गया।

1 नवंबर, 1989 को चार नए जिले-यमुनानगर, कैथल, पानीपत तथा रेवाड़ी अस्तित्व में आए। 15 अगस्त, 1995 को अंबाला जिले का विभाजन करके पंचकूला को जिला बनाया गया। झज्जर तथा फतेहाबाद के विकास को गति देने के उद्देश्य से 15 जुलाई, 1997 को झज्जर तथा फतेहाबाद जिले बनाए गए। 2005 में नूंह तथा 15 अगस्त, 2008 को पलवल जिले का गठन किया गया। वर्ष 2016 में भिवानी जिले का विभाजन करके चरखी दादरी को हरियाणा का 22वां जिला बनाया गया। यह हरियाणा का नवीनतम जिला है।

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