कोहबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धान्त की अन्य अवस्थाएँ

Other states of Kohberg’s theory of moral development

कोहबर्ग ने नैतिक विकास की अवस्था के कुछ अन्य सिद्धान्त दिए हैं, जो निम्न प्रकार हैं

कोहबर्ग  के सिद्धान्त की स्वकेन्द्रित अवस्था(The self-centered state of Kohberg’s theory)

  • इस अवस्था का कार्यकाल तीसरे वर्ष से शुरू होकर 6 वर्ष तक होता है। इस अवस्था के बालक की सभी व्यावहारिक क्रियाएँ अपनी वैयक्तिक आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति के चारों ओर केन्द्रित रहती हैं।
  • बालक के लिए वही नैतिक होता है, जो उसके स्व अर्थात् आत्म-कल्याण से जुड़ा होता है।

परम्पराओं को धारण करने वाली अवस्था(Holding state To traditions)

  • सातवें वर्ष से लेकर किशोरावस्था के प्रारम्भिक काल का सम्बन्ध इस अवस्था से है।
  • इस अवस्था का बालक सामाजिकता के गुणों को धारण करता हुआ देखा जाता है। अत: उसमें समाज के बनाए नियमों, परम्पराओं तथा मूल्यों को धारण करने सम्बन्धी नैतिकता का विकास होता हुआ देखा जा सकता है।
  • इस अवस्था में उसे अच्छाई-बुराई का ज्ञान हो जाता है और वह यह समझने लगता है कि उसके किस प्रकार के आचरण या व्यवहार से दूसरों का अहित होगा या ठेस पहुंचेगी।

आधारहीन आत्मचेतना अवस्था(Baseless self-conscious state)

  • यह अवस्था किशोरावस्था से जुड़ी हुई है। इस अवस्था में बालकों का सामाजिक, शारीरिक तथा मानसिक विकास अपनी ऊँचाइयों को छूने लगता है और उसमें आत्मचेतना की शुरुआत हो जाती है।
  • यह मेरा आचरण है, मैं ऐसे व्यवहार करता हूँ, इसकी उसे अनुभूति होने लगती है तथा अपने व्यवहार आचरण और व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों की स्वयं ही आलोचना करने की प्रवृत्ति उसमें पनपने लगती है।
  • पूर्णता की चाह उसमें स्वयं से असन्तुष्ट रहने का मार्ग प्रशस्त कर देती है। यही असन्तुष्टि उसे समाज तथा परिवेश में जो कुछ गलत हो रहा है, उसे बदल डालने या परम्पराओं के प्रति सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाने को उकसाती है।

आधारयुक्त आत्मचेतना अवस्था(Grounded conscious state)

  • नैतिक या चारित्रिक विकास की यह चरम (Extreme) अवस्था है। भली-भाँति परिपक्वता ग्रहण करने के बाद ही इस प्रकार का विकास सम्भव है।
  • जिस प्रकार के नैतिक आचरण और चारित्रिक मूल्यों की बात बालक विशेष से की जाती है उसके पीछे केवल उसकी भावनाओं का प्रवाह मात्र ही नहीं होता, बल्कि वह अपनी . मानसिक शक्तियों का उचित प्रयोग करता हुआ अच्छी तरह सोच-समझकर किसी व्यवहार या आचरण विशेष को अपने व्यक्तित्व गुणों में धारण करता हुआ पाया जाता है।

 

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *