नवाब शमसुद्दीन

1830 ई. में विलियम फ्रेजर दिल्ली के रेजिडेंट नियुक्त हुए। वह एक अत्याचारी और कामुक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। 1827 ई. में नवाब शमसुद्दीन खाँ लोहारू के नवाब बने। विलियम फ्रेजर ने नवाब की बहन के साथ दुर्व्यवहार किया था इसलिए नवाब शमसुद्दीन उससे नाराज था। ऊपर से विलियम फ्रेजर ने नवाब के भाइयों के साथ उसके संपत्ति के बँटवारे से जुड़े मुकद्दमे में नवाब के भाई अमीनुद्दीन का साथ दिया था। नवाब यह मुकद्दमा हार गया और उसके पास अब केवल फिरोजपुर झिरका का ही क्षेत्र बच गया था। इन घटनाओं से नाराज नवाब शमसुद्दीन ने अपने दरोगा-ए-शिकार करीम खां तथा एक मेवाती शिकारी अन्या की सहायता से 22 मार्च, 1835 को विलियम फ्रेजर की हत्या करवा दी। अंग्रेजों ने 10 अक्तूबर, 1835 को दिल्ली में कश्मीरी गेट के निकट समसुद्दीन को फांसी दे दी। नवाब साहब ने बड़ी बहादुरी से फांसी का फंदा अपने गले में डाला और फांसी के तख्ते पर झूल गये।

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