हरियाणा में बहने वाली मुख्य नदियां

आइए जानते हैं हरियाणा की प्रमुख नदियां कौन सी है? (Which are the Major Rivers of Haryana?)

हरियाणा प्रान्त का अधिकांश भाग गंगा एवं सिधु नदी तंत्र के मध्य एक जल विभाजक के रूप में स्थित विशाल मैदानी क्षेत्र है। यद्यपि गंगा-सतलुज के मैदान का यह उपजाऊ क्षेत्र यमुना, घग्घर, मारकण्डा आदि नदियों द्वारा सिंचित है, परन्तु मैदानी क्षेत्र होने के कारण किसी महत्वपूर्ण सदानीरा नदी का उद्गम हरियाणा प्रदेश से नहीं होता । हरियाणा से प्रवाहित होने वाली कुछ महत्वपूर्ण नदियों के नाम इस प्रकार हैं:

  • यमुना नदी (Yamuna River)
  • घग्घर नदी (Ghaggar River)
  • सरस्वती नदी (Saraswati River)
  • मारकण्डा नदी (Markanda River)
  • टांगरी नदी (Tangri River)
  • साहिबी नदी (Sahibi River)

उत्तर-पूर्व में शिवालिक श्रृंखला के विस्तार और दक्षिण में अरावली श्रृंखला की कुछ छोटी पहाड़ियों को छोड़ कर प्रदेश का अधिकतर भाग (लगभग 93% क्षेत्र) मैदानी क्षेत्र है

हरियाणा की प्रमुख नदियों का विस्तृत वर्णन (Detailed Description of Major Rivers of Haryana)

  1. यमुना नदी (Yamuna River)

    यमुना नदी, गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यमुना का उद्गम उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में हिमालय की बंदरपूँछ श्रृंखला में स्थित ‘यमुनोत्तरी ग्लेशियर’ से होता है। यमुनानगर जिले का कलेसर का वन क्षेत्र राज्य में यमुना नदी का प्रवेश द्वार है। कलेसर से राज्य में प्रवेश करने के पश्चात् यमना नदी राज्य की पूर्वी सीमा के साथ-साथ यमुनानगर, करनाल, पानीपत और सोनीपत से होते हुए दिल्ली में प्रवेश करती है। यमुना नदी दिल्ली से निकल कर बदरपुर के निकट पुनः हरियाणा के फरीदाबाद जिले की पूर्वी सीमा में प्रवेश करती है। फरीदाबाद से होते हुए यह नदी पलवल जिले में पूर्वी सीमा के निकट हसनपुर से उत्तर पदेश के अलीगढ़ जिले में प्रवेश कर जाती है। यमुना नदी हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मध्य हरियाणा की 320 कि०मी० लंबी पूर्वी सीमा रेखा का निर्धारण करती है। यमुनानगर के ताजेवाला में हथनीकुण्ड बैराज का निर्माण करके यमुना नदी से पूर्वी यमुना नहर (East-YamunaCanal) और पश्चिमी यमुना नहर (West Yamuna Canal) निकाली गई है। राज्य सरकार द्वारा इस बैराज के निकट हथनीकुंड में एक पर्यटन स्थल भी विकसित किया जा रहा है।

  2. घग्घर नदी (Ghaggar River)

    मैक्स मुलर और क्रिस्टियन लॉसन जैसे इतिहासकार घग्घर को सरस्वती का अन्तिम अवशेष मानते हैं। सतलज और यमना को किसी समय सरस्वती की सहायक नदियाँ माना जाता था। घग्घर का उद्गम शिवालिक की पहाड़ियों में शिमला के निकट डागशर्ड नामक स्थान से होता है। सतलुज और यमुना के बीच के क्षेत्र से प्रवाहित होती हुई यह नदी पंचकुला जिले में पिंजौर के निकट हरियाणा में प्रवेश करती है। घग्घर एक बरसाती नदी है जो प्रदेश के पंचकुला, अंबाला, कैथल, फतेहाबाद और सिरसा जिलों से होती हुई राजस्थान के हनुमानगढ़ से मरुस्थल में प्रवेश कर जाती है और कई धाराओं में बँट कर थार के रेगिस्तान में लप्त हो जाती है। प्रदेश में इस नदी की लंबाई लगभग 200 मील (320 कि०मी०) है। बहाव के इस मार्ग में घाघर को सरस्वती के द्वारा टांगरी और मारकण्डा नदियों का जल भी प्राप्त हो जाता है। हरियाणा के सिरसा जिले की रानियां तहसील में ‘ओटू’ नामक स्थान पर घग्घर नदी पर एक बैराज बनाया गया है। इस बैराज से राजस्थान में सिंचाई के लिए दो नहरें निकाली गई हैं। इस स्थान पर प्राचीन ‘डामर झील’ के स्थान पर एक बड़े जलाशय का निर्माण किया गया है तथा चौधरी देवीलाल ओटू वीयर के नाम से पर्यटन स्थल भी विकसित किया गया है। ओट से पहले इस नदी को ‘घग्घर’ के नाम से जानते हैं तथा ओटू से गुजरने के बाद इसका नाम ‘हाकड़ा’ नदी हो जाता है

  3. सरस्वती नदी (Saraswati River)

    हिन्दू सभ्यता में वैदिक काल से सरस्वती नदी का वर्णन मिलता है। हिन्दू संस्कृति में ऐसा विश्वास किया जाता है कि ऋग्वेद के प्रथम भाग की रचना तभी हुई थी जब हिन्दू सभ्यता सरस्वती के किनारों पर प्रफुल्लित हो रही थी। ऋग्वेद में ‘नदी स्तुति मन्त्र में सरस्वती के पूर्व में यमुना और पश्चिम में सतलुज के प्रवाहित होने का वृत्तांत मिलता है। भारतीय मान्यता के अनसार सिंधु घाटी सभ्यता के कालीबंगा, बनवाली, राखीगढ़ी, धोलावीरा और लोथल शहर सरस्वती के किनारों पर ही बसे थे। सरस्वती का उद्गम हिमालय की पहाड़ियों में सिरमौर जिले में है। टांगरी और मारकण्डा, सरस्वती की सहायक नदियाँ मानी जाती हैं। यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, और कैथल जिलों से प्रवाहित होने के पश्चात् यह नदी पंजाब के संगरूर जिले में प्रवेश कर जाती है। संगरूर जिले में इसका संगम घग्घर नदी के साथ होता है। प्राचीन काल में सरस्वती नदी एक विशाल नदी तंत्र बनाती थी। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार सरस्वती को सिन्धु-सरस्वती नदी तंत्र की सातवीं नदी माना जाता है। इसी कारण से सरस्वती और सिन्धु नदी के बीच के क्षेत्र को प्राचीन साहित्य में ‘सप्तसिंधु क्षेत्र’ के नाम से जाना जाता था। ‘तांडय ब्राह्मण’ और ‘महाभारत’ में सरस्वती के मरुस्थल में विलुप्त होने का वृत्तांत मिलता है। कभी सदानीरा जीवनदायिनी नदी के रूप में प्रसिद्ध सरस्वती आज एक बरसाती नदी के रूप में जानी जाती है। प्राचीन सरस्वती को पुनर्जीवित करने के आधुनिक प्रयास कभी काल्पनिक नदी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी इस पौराणिक नदी को पुनर्जीवित करने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। इसरो और ओ०एन०जी०सी० (ONGC) द्वारा उपग्रह से प्राप्त चित्रों और रिमोट सेंसिंग डाटा से इस अवधारणा की पुष्टि होती है कि वर्तमान में घग्घर का प्रवाह क्षेत्र वास्तव में 5,000 वर्ष पहले सरस्वती नदी का प्रवाह क्षेत्र होता था। भू-वैज्ञानिक मानते हैं कि लगभग 2,500 वर्ष पूर्व भू-गर्भिय हलचल के कारण सरस्वती विलुप्त हो गईं। पूर्व राजग सरकार के संस्कृति मंत्री श्री जगमोहन ने 2002 में इस नदी के पुनरोद्धार का निर्णय लिया था। तब से ही वैज्ञानिकों का एक कार्यबल लगातार इस कार्य में लगा हुआ है। ‘रिमोट सेंसिंग’ डाटा (Remote sensing Data) और ‘डिजिटल एलिवेशन मॉडल’ (Digital Elevation Model) की सहायता से इस नदी के प्रवाह क्षेत्र का अध्ययन किया गया है। वर्तमान हरियाणा सरकार ने वित्त वर्ष 2015-16 में ‘सरस्वती पुनरोद्धार परियोजना’ (Saraswati Revival Project) के लिए 50 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। हरियाणा सरकार के अधिकारी मानते हैं कि सरस्वती का उद्भव यमुनानगर जिले में जगाधरी से 30 कि०मी० दूर ‘आदि-बद्री’ से होता है और यह नदी भूतल से 60 फीट नीचे से बहती हुई यमुनानगर के 43 गाँवों से गुजरती है। 21 अप्रैल, 2015 को सरस्वती पुनरोद्धार परियोजना का शुभारंभ हरियाणा विधानसभाध्यक्ष श्री कँवरपाल गुज्जर द्वारा यमुनानगर जिले के ‘हुल्लाहेड़ी’ गाँव से किया गया। इस नदी के पुनरोद्धार के साथ-साथ हरियाणा सरकार की योजना सोंब नदी पर एक बाँध बनाकर 400 एकड़ के एक कृत्रिम जलाशय में जल संग्रह करके उसे सरस्वती नदी की ओर प्रवाहित करने की भी है। इस जलाशय को एक पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित किया जाएगा। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सरस्वती पुनरोद्धार परियोजना के साथ-साथ एक ‘एक्सप्रेस हाइवे’ (Express Highway) की भी घोषणा की है। पंचकुला जिले में कालका से लेकर यमुनानगर जिले के जगाधरी तक इस राजमार्ग का निर्माण किया जाएगा। ओ०एन०जी०सी (ONGC) ने भी यमुनानगर जिले में तीन स्थल कुरुक्षेत्र, कैथल और फ़तेहाबाद में एक-एक स्थान को चिन्हित किया है जहाँ नलकूप की सहायता से सरस्वती के भूमिगत जल को भूमि पर लाने के प्रयास किए जाएंगे।

  4. मारकण्डा नदी (Markanda River)

    यह एक पौराणिक नदी है जिसको प्राचीन काल में ‘अरुणा’ के नाम से जाना जाता था। कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद नगर में इस नदी के किनारे महर्षि मारकण्डेय का आश्रम था। यहाँ पर आज भी इस नदी के किनारे मारकण्डेश्वर महादेव का भव्य मन्दिर बना हुआ। इस नदी के किनारों पर कुरुक्षेत्र और अंबाला जिले में आज भी महर्षि मारकण्डेय के प्राचीन आश्रम देखे जा सकते हैं। महर्षि मारकण्डेय के नाम पर ही इस नदी का नाम ‘मारकण्डा’ नदी पड़ा। मारकण्डा नदी का उद्गम निम्न हिमालय की शिवालिक की पहाड़ियों से हिमाचल प्रदेश में नाहन के निकट ‘पोंटा घाटी’ के पश्चिमी छोर से होता है। शिवालिक की पहाड़ियों से निकल कर मारकण्डा नदी अंबाला जिले में ‘कालाअंब’ के निकट से हरियाणा में प्रवेश करती है। अंबाला से निकल कर मारकण्डा नदी कुरुक्षेत्र में प्रवेश कर जाती है। ग्रीष्मकाल में मारकण्डा नदी मृतप्राय हो जाती है। परन्तु वर्षाकाल में अनेक छोटी नदियों और पहाड़ी नालों से मिलने के पश्चात् यह विकराल रूप धारण कर लेती है। यह नदी वर्षा काल में अंबाला तथा कुरुक्षेत्र जिलों में बाढ़ का कारण बनती है। मारकण्डा के अतिरिक्त जल को सेनिसा झील में इकट्ठा किया जाता है। यहीं पर मारकण्डा नदी सरस्वती में मिल जाती है। टांगरी नदी, मारकण्डा की प्रमुख सहायक नदी है जो अंबाला में मुलाना के निकट मारकण्डा से आकर मिलती है।

  5. टांगरी नदी (Tangri River)

    यह मारकण्डा की प्रमुख सहायक नदी है। टांगरी एक बरसाती नदी है। इस नदी का उद्गम स्थल मोरनी की पहाड़ियाँ हैं। मोरनी पहाड़ियों से निकल कर अंबाला जिले में उमरा नाले के साथ-साथ बहते हुए मुलाना के निकट जाकर टांगरी नदी मारकण्डा में मिल जाती है। अंबाला के उत्तर भाग के निकट से मारकण्डा नदी गुजरती है और दक्षिणी भाग से टांगरी नदी गुजरती है।

  6. साहिबी नदी (Sahibi River)

    साहिबी नदी का उद्गम राजस्थान के जयपुर जिले में अरावली श्रृंखला की मेवात पहाड़ियों से होता है। यह एक बरसाती नदी है जिसे ‘साबी नदी’ और दिल्ली में ‘नजफगढ़ ड्रेन’ के नाम से भी जानते हैं। बरसात के मौसम में अरावली के बहुत से नालों से बरसात का पानी ग्रहण करने के पश्चात् अलवर क्षेत्र में आकर ‘साहबी नदी’ विशाल धारा का रूप धारण कर लेती है। साहबी के प्रवाह का अधिकतर क्षेत्र रेतीले धरातल से है। अरावली से निकलने वाली अधिकतर नदियाँ दक्षिण की ओर प्रवाहित होती हैं परन्तु साहिबी नदी एक अपवाद के रूप में जयपुर और अलवर जिलों से उत्तर की तरफ प्रवाहित होती हुई हरियाणा के रेवाड़ी जिले में प्रवेश कर जाती है। इसकी सबसे बड़ी सहायक नदी ‘इंदौरी नदी’ है। पटौदी के निकट ‘इंदौरी नदी’ आकर ‘साहिबी नदी’ में मिल जाती है। दक्षिणी हरियाणा के रेवाड़ी जिले के दक्षिणी क्षेत्र में बहने के बाद साहिबी नदी फिर से राजस्थान में प्रवेश कर जाती है। पुनः रेवाड़ी में प्रवेश करने के पश्चात यह नदी धारूहेडा के निकट से गडगाँव जिले में प्रवेश कर जाता है। 1977 में आई बाढ़ के पश्चात् धारूहेडा के निकट तीतरपर मसानी ग्राम के निकट ‘मसानी बैराज’ का निमाण किया गया है। गुड़गांव से निकलकर झज्जर के पूर्वी क्षेत्र से होती हई ‘कलानी’ गाँव के निकट से दिल्ली में प्रवेश कर जाती है और दिल्ली में नजफगढ़ झील से गुजर कर एक गन्दे पानी के नाले के रूप में यमना में विलीन हो जाती है। मेवात की पहाड़ियों से निकलने के पश्चात् यमुना में विलीन होने तक इस नदी की लंबाई 300 कि०मी० है।

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