हरियाणा राज्य के प्रमुख कुंड सरोवर और ताल

हरियाणा राज्य  को भगवान शिव का प्रदेश भी कहा जाता है। हरियाणावादी युग-युगांतर से शिवभक्त रहे हैं। इस प्रदेश में महर्षि च्यवन, महर्षि जमदग्नि, परशुराम, महर्षि उद्दालक, महर्षि दुर्वासा, महर्षि मारकण्डेय आदि अनेकानेक ऋषि-मुनियों के आश्रम थे। तप-साधना के स्थानों पर सरोवरोंकण्डों और ताल-तालाबों का मिलना स्वाभाविक ही है। यदि इन सरोवरों के इतिहास पर एक नज़र डालें तो इनके साथ अनेकानेक धार्मिक-ऐतिहासिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। श्री रणबीर सिंह इनके कलात्मक पक्ष को रेखांकित करते हुए लिखते हैं-“मानवीय ललित विधाओं के प्रतीक हमारे कुएँ, घाट, छतरिया और संलग्न मन्दिर ग्राम परिदृश्य को आज भी सौन्दर्यमय बनाए हुए हैं।” इनमें निहित सौंदर्य इतना सघन और सहज है कि ‘दृश्यावली दोष’ की खोज दुर्लभ हो सकती है।

हरियाणा के महत्वपूर्ण सरोवर के बारे में जानकारी के लिए निचे दिया हुआ यूट्यूब वीडियो जरूर देखे

  1. महाभारतकालीन सरोवरः पुंडरीक (Mahabharata Period Sarovar: Pundarik)

    ‘पुंडरीक’ नाम से प्रसिद्ध यह महाभारतकालीन सरोवर कैथल से 18 कि०मी० पूर्व तथा करनाल से 45 कि० मी० पश्चिम में कैथल जिले के ‘पुण्डरी’ नामक कस्बे के बीचों-बीच स्थित है। यह प्राचीन परंपरा थी कि नगरों या कस्बों का विकास नदी-तालाब के किनारे ही हुआ करता था। पुंडरी का नामकरण भी इस सरोवर पर आधारित माना जाता है। यह पांडवों के समय छावनी की स्थिति कही जाती है। ऐसी मान्यता है कि सतयुग से लेकर आज तक पुंडरीक सरोवर का जल कभी समाप्त नहीं हुआ। 1987 में कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड द्वारा यहाँ ‘नागहृदय कुण्ड’ का निर्माण कराया गया। संस्कृत में ‘पुंडरीक’ का अर्थ है-कमल। भक्त पुंडरीक की चर्चा भी अनेक ग्रंथों में मिलती है। प्राचीन मान्यता है कि पुंडरीक ने यहाँ ‘पुंडरीक यज्ञ’ का आयोजन किया था। इसी घटना के संबंध में इस सरोवर का नाम ‘पुंडरीक सरोवर’ पड़ा। इस सरोवर पर बने वृंदावन घाट, गऊ घाट, त्रिवेणी घाट और मुख्य घाट आज भी श्रद्धालुओं के आकर्षण के केन्द्र हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को यहाँ एक विशाल मेला लगता है और श्रद्धालु जप-श्राद्ध से मोक्ष प्राप्ति की कामना करते हैं।

  2. दादरी का श्यामसर सरोवर (Shyamsar lake of Dadri)

    दिल्ली से पश्चिम में चालीस कोस, भिवानी जिला मुख्यालय से चौबीस कि०मी० (24 कि०मी०) दूर दादरी में श्यामसर सरोवर स्थित है। रेतीले टिब्बों से घिरा तथा अरावली श्रृंखला के उत्तरी भाग में स्थित ‘पीतल नगरी’ के नाम से प्रसिद्ध दादरी लगभग 350 वर्ष पूर्व एक गाँव ही था। स्थानीय मान्यता के अनुसार आज से लगभग 825 वर्ष पूर्व फौगाट गोत्रीय जाटों ने जब हरियाणा में प्रवेश किया तो पहली बस्ती यहाँ स्थापित हुई थी जहाँ वर्तमान दादरी नगर स्थित है। इस स्थान का चयन महज उपलब्धता के कारण ही किया गया होगा। उन्हीं फोगाटो ने कच्चे बांध बनाकर यहाँ सरोवरों का विकास किया। ‘श्यामसर सरोवर’ भी इनमें से एक है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस सरोवर का निर्माण मुगल बादशाह के खजांची सेठ सीताराम द्वारा अपने दिए गए एक लाख रुपए से करवाया था । सेठ सीताराम और उनके कुल पुरोहित नेवंदराय के मध्य विवाद हो जाने के कारण एक साधु के निर्देश पर फौगाट बिरादरी के लोगों ने सेठ सीताराम द्वारा दिए गए दान से श्यामसर सरोवर खुदवाया| 20 हजार वर्ग फुट क्षेत्र में विस्तृत इस सरोवर में लगभग 32 लाख घनफुट वर्षा जल एकत्र किया जा सकता था| इस जल से पूरे वर्ष आस-पास के क्षेत्र की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। किसी समय दादरी कस्बे में जल की समूची भरपाई इस सरोवर पर निर्मित छह गहरे कुंओं से होती थी। सरोवर परिसर में निर्मित छतरियाँ इसके रूप को भव्यता प्रदान करती हैं। इस सरोवर पर बने शिवालय, तीन दिशाओं में निर्मित चौड़ी पौडियों वाले घाट. स्वामी दयाल की समाधि, ठाकुर द्वारा, ब्राह्मण भवन आज भी आकर्षण का केन्द्र हैं।

  3. निरपावाला सरोवर (खरक कलां, भिवानी)

    (Nirpawala Sarovar Khark Kalan, Bhiwani) यह सरोवर भिवानी जिले के खरक कलां गाँव में स्थित है। लगभग 125 वर्ष पूर्व निर्मित इस सरोवर को बाद में हाडा बणियों ने खदाई करवाकर गहरा करवाया और अपने पूर्वज निरपा के नाम पर इसका नामकरण “निरपावाला सरोवर’ कर दिया। यहाँ पर निर्मित पाँच मन्दिरों, पेयजल उपलब्ध करवाने हेतु निर्मित दस कुँओं तथा सात स्नान घाटों ने इस सरोवर को एक तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। निरपावाला सरोवर के दक्षिण-पूर्वी कठारे पर सौ वर्ष पूर्व हनुमान हाडा और रामरिख हाडा ने मराठी वास्तु-शिल्प का प्रयोग करके भव्य कृष्ण मन्दिर निर्मित करवाया। बाद के समय में सरोवर की दक्षिणी पाल के समीप सती जाब्दे मन्दिर, भर्तृहरि मन्दिर, हरनंद मन्दिर, भूरेवाला मन्दिर तथा गूगा पीर मढ़ी का निर्माण हुआ। भाद्रपद मास की पंचमी को यहाँ सती की स्मृति में मेला आयोजित होता है। निरपावाला सरोवर के पूर्वी छोर पर ‘बदधू क्या’ का कुँआ और धुर उत्तर में राधाकृष्ण मन्दिर बना हुआ है।

  4. सिमाण का मुरसी सरोवर (महम-चौबीसी रोहतक का सिमाण गाँव) (Mursi Sarovar Simana)

    किसी समय लगभग सौ बीघे में विस्तृत रहा ‘मुरसी सरोवर’ रोहतक की महम चौबीसी के सिमाण गाँव में स्थित है। इस सरोवर पर हुए भव्य निर्माण में सेठ चुन्नीराम तथा ‘सतगुरु मन्दिर’ के महन्तों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। महन्त छोट्दास ने लगभग 120 वर्ष पूर्व गाँव की ओर 50 फुट ऊँची पाल पर 90 हाथ गहरे कुएं का निर्माण करवाया और कुएँ की जगत पर चारों ओर चार सुन्दर छतरियाँ बनवाई। महिलाओं के लिए यह कुँआ बाबा वाली कुआ’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसी के समीप पश्चिम में सेठ चुन्नीलाल के पुत्र माता राम द्वारा निर्मित कुँआ है। लगभग सौ वर्ष पूर्व निर्मित इस कुएँ को ‘बणियाँ वाला कुँआ’ के नाम से जाना जाता है। इस सरोवर पर लगभग 40 फुट ऊँचा प्राचीन शिव मन्दिर बना हुआ है। इस मन्दिर की पाल के पश्चिम में एक पूरक सरोवर भी है जिसे ‘जैला वाला सरोवर’ के नाम से जाना जाता है। ‘मुरसी वाला सरोवर’ की निर्माण शैली भी बेजोड है। वर्षा का जल सीधे इस सरोवर में नहीं भरता बल्कि पश्चिमी पाल पर स्थित झरने तथा ‘जैला वाला सरोवर’ से होकर इसमें भरता है।

  5. नागक्षेत्र सरोवरः सफीदों

    (Nagkshetra Sarovar)- ऐतिहासिक कस्बा सफीदों, जीन्द जिले में तहसील मुख्यालय है। यहाँ का नागक्षेत्र सरोवर लगभग 5 हजार वर्ष पुराना माना जाता है। प्राचीन मान्यता है कि वर्तमान में जिसे हम नागक्षेत्र सरोवर के नाम से जानते हैं किसी समय यहाँ एक विशाल हवन कुंड था जिसका निर्माण नाग जाति के दमन हेतु हुआ था। जनश्रुति है कि मुनि शभीक के शाप के कारण सर्पदंश से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई। महाराजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने नाग यज्ञ किया और मंत्रों के प्रभाव से सभी सर्प अग्निकुण्ड में गिरकर भस्म होने लगे। आस्तीक मुनि ने सर्प जाति का पूर्ण विनाश रुकवा दिया। जनश्रुति है कि उस समय बचे हुए सर्प जोड़े ने मानव जाति को वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति सुनीत, आर्तिमान और असित मंत्रों का जाप करेगा, उसे सर्पभय नहीं होगा। इस नागक्षेत्र सरोवर का जीर्णोद्धार जीन्द रियासत के राजा गजपत सिंह ने करवाया था। इस तीर्थ के प्रांगण में माता जगदंबा की एक विशाल प्रतिमा है।

  6. बुआ वाला अद्भुत सरोवर (झज्जर)

    झज्जर शहर के उत्तरी छोर पर एक ही कतार में सात मकबरे और एक मस्जिद बनी हुई है। इन्हीं के साथ लगता यह सरोवर है जिसे ‘बुआ वाला सरोवर’ के नाम से जाना जाता है। लगभग चार सौ (400) वर्ष पुराना यह सरोवर 20 फुट गहरा है। पहले यहाँ एक कच्चा सरोवर था जिसे मुगलकाल में झज्जर के हाकिम की रूपवती पुत्री ‘बुआ’ ने पक्का करवाया था। बआ ने यहाँ पर अपने प्रेमी हसन का मकबरा भी बनवाया। सरोवर को पक्का करने के लिए चूना-पत्थर की शिलाओं और लाखौरी ईंटों का प्रयोग किया गया है। आठ लाख घन फुट जल-भराव क्षमता वाले इस सरोवर की चारों दीवारें समान रूप से दो सौ फुट लंबी हैं। इस चौकोर तालाब की उत्तरी, दक्षिणी तथा पश्चिमी दीवारों में घाट बने हुए हैं। पूर्वी दीवार में कोई घाट नहीं है। बुआ वाले सरोवर’ की विशेष पहचान इसके केन्द्र में स्थित अष्टकोणीय स्तंभ हैं। ये स्तम्भ जलस्तर मापने में सहायक है। यहाँ उपलब्ध एक शिलालेख के आधार पर कहा जाता है कि इस सरोवर का पक्का निर्माण 1628 में दुर्गामल द्वारा हुआ।

  7. बेरी के ऐतिहासिक सरोवर

    झज्जर जिले में स्थित धार्मिक नगरी ‘बेरी’ को सरोवरों की ऐतिहासिक नगरी भी कहा जाता है। बेरी में माता भीमेश्वरी देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है। यहाँ अनेकों सरोवर बने हुए हैं जिनका धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व पूरे हरियाणा प्रान्त में स्वीकार किया जाता है। बेरी के सरोवर दो श्रेणियों में बाँटे जा सकते हैं। एक श्रेणी उन सरोवरों की है जिनका निर्माण सामाजिक स्तर पर हुआ है तथा दूसरी श्रेणी उन सरोवरों की है जिनका निर्माण कुछ विशेष व्यक्तियों ने अपने या अपने पूर्वजों के नाम पर करवाया है।

  • कुल्लू वाला सरोवर

    इस सरोवर के साथ अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। ऐसा माना जाता है कि 19वीं सदी के आठवें दशक में यह क्षेत्र भीषण अकाल की चपेट में था। अंग्रेज गवर्नर के आदेश पर, स्थानीय जनता को रोजगार उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से, खूबीराम के पुत्रों निर्माण लाल तथा जयलाल ने इस सरोवर का निर्माण करवाया। पक्के निर्माण के बाद इस सरोवर में पानी भरा गया। आरंभ में सरोवर के नाम साठ बीघा (12 एकड़) जमीन थी। लेकिन जमीन पर कब्जा होते रहने के कारण इसका क्षेत्र दिन-प्रतिदिन घटता गया। सरोवर के चार घाट होते थे जिनमें से दो घाट थे-महिला घाट और गऊ घाट। जीर्णावस्था में पड़े इस सरोवर के तट पर कभी दशहरे के अवसर पर लगातार 16 दिन तक रामलीला का आयोजन होता था

  • भीमेश्वरी सरोवर

    स्थानीय मान्यता के अनुसार इस सरोवर का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। सरोवर के तट पर बने भीमेश्वरी देवी मन्दिर के कारण ही इस सरोवर का यह नामकरण हुआ। दंत कथाओं के अनुसार महाभारत काल में यहां एक सघन वन था और इसके पास से एक बरसाती नदी प्रवाहमान थी। महाभारत युद्ध से पूर्व विजय की कामना से पांडु पुत्र भीम अपनी कुलदेवी को हिंगलाज (पाकिस्तान) से इसी मार्ग से ले जा रहे थे । उन्हें लघु-शंका निवारण हेतु कुलदेवी के स्वरूप को भूमि पर रखना पडा। लघुशंका से निवृत्ति के उपरान्त जब भीम लौट कर आए तो उनको नदी सूखी मिली । क्रोधित भीम ने अपनी गदा से धरती पर प्रहार किया और भूमि से जलधारा बह निकाली। इसी जलधारा से इस सरोवर का निर्माण हुआ । माता भीमेश्वरी की स्थापना भी यहीं की गई। यहाँ पर हर छह मास के बाद नवरात्रों में मेला लगता है। श्रद्धालु अपने हाथों से इस सरोवर से मिट्टी निकालना बड़ा शुभ मानते हैं। इस सरोवर पर वर्ष में दो बार एशिया का दूसरा सबसे बड़ा ‘गधा-मेला’ भी लगता है।

  • रामाणी सरोवर

    बेरी एक धार्मिक नगरी है जहाँ भगवान शिव, श्री कृष्ण, महिषासुरमर्दिनी और श्रीराम के भव्य मंदिर है| चूल्याण पाने के कादियान गोत्रिय जाटों के कल देवता हनुमान हैं। रामाणी सरोवर को यह नाम इन्होंने भगवान श्री राम की स्मृति में दिया है । इस सरोवर की पाल (बांध) संयोगवश धनुषाकार है। रामायणी सरोवर की विशेषता उसके तट पर बने 12 कुए हैं प्रत्येक कुआं 20 से 25 फुट ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है इनका निर्माण तथा खुदाई राजस्थान के घुमंतू बंजारों ने की थी| सरोवर के तट पर एक कुआं बंजारों का कुआं के नाम से भी प्रसिद्ध है| किसी समय 85 बीघा (70 एकड़) में विस्तृत यह सरोवर सघन वन क्षेत्र से घिरा होता था |

  • घांघसर सरोवर

    बेरी में स्थित इस सरोवर के तट पर पांच मन्दिर, पांच कुंओं तथा एक छतरी का निर्माण हुआ है। अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा बनवाये गए पाँच घाट में से दो का अस्तित्व समाप्त हो चुका है, दो घाट जर्जर अवस्था म ह। केवल एक घाट ही अब सुरक्षित है। घांघसर शब्द ‘गंगा सागर’ का अपभ्रंश माना जाता है। तीन सरोवर ‘घाघसर’, ‘कुलद तथा ‘बीथलसर’ आपस में एक सांकल के रूप में जुड़े थे।

  • जानकीदास सरोवर

    बेरी के जानकीदास सरोवर का निर्माण 1924-25 में सेठ जानकीदास ने अपने भाई की याद में करवाया था। इस सरोवर के चारों तरफ चारदीवारी है। तट पर बने बरामदों में पत्थर के 64 स्तंभ और 32 द्वार हैं। सरोवर के परिसर में कुछ भवन भी बने हुए हैं। जब भी बेरी में किसी जल-क्रिड़ा का आयोजन होता है तो इसी सरोवर का चयन किया जाता|

  • बारसर सरोवर

    यह एक प्राचीन सरोवर है, जिसके किनारे एक ऊँचा टीला है। यह टीला किसी नरसंहार में दफन हुए लोगों के शवों का बना बताया जाता है।

  1. टिक्कर ताल, मोरनी

    यह झील चण्डीगढ से 45 कि०मी० दूर शिवालिक श्रृंखला की मोरनी की पहाड़ियों (मोरनी-हिल्स) में स्थित है। यहाँ बने दो टिक्कर ताल अपने ऐतिहासिक तथा पुरातात्त्विक महत्व के कारण प्रसिद्ध हैं। मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में अज्ञातवाश के दौरान एक दुर्दान्त दानव से युद्ध करते समय महाबली भीम के घुटने जमीन पर जा लगे तथा उस स्थान पर दो गडळे बन गए, जिन्होने जलाशय का रूप ले लिया। इन तालों को ‘भीमताल’ के नाम से भी जानते हैं। अज्ञातवास के दौरान बनाई गई द्रौपदी की अर्धनिर्मित रसोई भी यहाँ विद्यमान है। इन दोनों जलाशयों का क्षेत्र काफी विस्तृत है। बड़े ताल का क्षेत्रफल लगभग दो वर्ग कि०मी० तथा छोटे ताल का क्षेत्रफल लगभग डेढ वर्ग कि०मी० है जिन्हें एक ढलावदार टीला अलग करता है। इन झीलों में वर्ष भर जल भरा रहता है। पहाडी से देखने पर ताल जल से भरे कटोरे की तरह प्रतीत होते हैं।

  2. महम की बावड़ी – रोहतक

    महम के दक्षिण-पूर्व में स्थित ‘जानी चोर की गुफा’ के नाम से प्रख्यात बावड़ी ना भारत में शिल्प और स्थापत्य कला की दृष्टि से अपने आप में अद्भुत है। मान्यता के अनुसार मुगल बादशाह शाहजहाँप काल में छत्रबरदार सैद् कलाल द्वारा 1656 ई० में इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया। किसी समय यह बावडी दमन में जलापर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत थी। इस बावड़ी पर जल-तल तक जाने के लिए एक सौ एक (101) सीदियाँ बनी अन्तिम छोर पर एक कुँआ है, जो पानी को रोके रहता है। कुँए के ऊपरी पत्थरों पर फारसी भाषा में निर्माता का अंकित है। जीर्णावस्था में अपने उद्धार के इंतजार को विवश इस बावड़ी के साथ जानी चोर की दन्तकथा जडी हुई और से अनेक सरगे जडी थी। जिन्हें कालान्तर में बन्द कर दिया गया। यह सुरग महम का अन्य शहरों से जोडती र के अनुसार इन सुरंगों के बन्द किए जाने का कारण इनमें एक बारात का गुम होना बताया जाता है।

  3. दरगू वाला कुआं, दुजाना (झज्जर)

    यह कुआं लगभग 200 साल पुराना एक ऐतिहासिक स्मारक है झज्जर जिले के दुजाना में स्थित यह कुआं अपने आकार तथा निर्माण शैली के कारण अपना विशिष्ट स्थान रखता है इस कुएं पर 12 भौण लगे हुए हैं यह कुआं लगभग 9 हाथ चौड़ा और 90 हाथ गहरा है|

हरियाणा के सरोवर पर आधारित परीक्षा उपयोगी कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. पुंडरीक सरोवर कहां पर स्थित है?

उत्तर – पुंडरीक सरोवर हरियाणा राज्य के कैथल जिले के पुंडरीक गांव में स्थित है|

प्रश्न 2. टिक्कर ताल झील कहां पर स्थित है?

उत्तर – टिक्कर ताल झील पंचकूला जिले के शिवालिक पर्वत श्रंखला में मोरनी की पहाड़ियों में स्थित है.

प्रश्न 3. महम की बावड़ी किस मुगल शासक के शासनकाल में बनवाई गई थी?

उत्तर – महम की बावड़ी का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहाँप काल में छत्रबरदार सैद् कलाल द्वारा 1656 ई० ने किया गया|

 

Note: उपरोक्त दी गई जानकारी में यदि कोई भी संदेह या फिर किसी प्रकार की त्रुटि है तो कृप्या निचे दिए हुए कमेंट बॉक्स में जरूर लिखे.

 

 

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