लोहारू रियासत

1803 ई. में अग्रेजों ने अपने एक विश्वस्त सैन्य सरदार अहमद बख्श खान को लोहारू तथा फिरोजपुर-झिरका का क्षेत्र भरतपुर राज्य के खिलाफ सघर्ष में सहायता के बदले इनाम स्वरूप दे दिया। इस प्रकार स्वतंत्र लोहारू राज्य की नींव पड़ी। उसने 1827 ई. तक शासन किया। 1827 ई. में उसका बड़ा बेटा समसुद्दीन खान लोहारू का शासक बना। परन्तु, 8 वर्ष बाद 1835 में अंग्रेजों ने उस पर दिल्ली के रेजीडेंट सर विलियम फ्रेजर की हत्या का आरोप लगाकर समसुद्दीन खान को फांसी दे दी तथा फिरोजपुर-झिरका का क्षेत्र हड़प लिया। 1835 ई. में समसुद्दीन के उपरान्त उसका भाई अमीनुद्दीन अहमद खान गद्दी पर बैठा। परन्तु, अंग्रेजों ने उस पर विश्वास नहीं किया। 1857 की क्रान्ति के समय अंग्रेजों ने अमीनुद्दीन और उसके भाई जियाउद्दीन को अपनी निगरानी में रखा था। प्रसिद्ध शायर मिर्जा गालिब नवाब अमीनुद्दीन अहमद खां के दामाद थे।

लोहारू रियासत के अन्य शासक हैं

  • अलाउद्दीन अहमद खां (1869-84 ई०) इस रियासत के शासकों में नवाब अलाउद्दीन अहमद खां ने सर्वप्रथम ‘नवाब’ की उपाधि धारण की थी।
  • अमीरूद्दीन अहमद खां (1884-1920 ई०) 1893-1903 ई. तक 10 वर्ष के कार्यकाल में नवाब अमीरूद्दीन मलेर कोटला रियासत के सलाहकार और प्रशासक रहे। इस दौरान लोहारू का कार्यभार उनके भाई बसीरूद्दीन अहमद खां संभालते थे।
  • अजीजुद्दीन अहमद खान (1920-26 ई०)
  • अमीनुद्दीन अहमद खान (1926-1947 ई०)

नवाब अमीनुद्दीन को बाल्यकाल में ही गद्दी संभालनी पड़ी। 1931 ई. तक राज्य का कामकाज इनके दादा अमीरूद्दीन ही देखते थे। आजादी के बाद वह राजस्थान विधानसभा के सदस्य भी रहे। 1974-81 ई. तक वह हिमाचल तथा 1981-82 ई. में पंजाब के राज्यपाल भी रहे थे। नवाब अमीनुद्दीन प्रजापालक शासक नहीं था। उसने बेगार तथा भारी करों से जनता की कमर तोड़ दी। रियासत में धर्मांधता और कट्टरपंथियों का बोलबाला था। नवाब के अत्याचारों को सर्वप्रथम चुनौती देने का श्रेय आर्यसमाज को जाता है। धीरे-धीरे इस आन्दोलन में सामाजिक तथा आर्थिक मामले भी जुड़ गए। 8 अगस्त, 1935 को नवाब ने सिंहाणी नामक गाँव में शांतिपूर्ण जुलूस पर फायरिंग करवा दी। इसमें 22 लोग शहीद हुए। जनता में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई तथा आन्दोलन जोर पकड़ गया। सूबेदार दिलसुख, ठाकुर भगवंत सिंह, चौ. मोहर सिंह, पं. सत्यव्रत आदि ने रियासत में प्रजामण्डल की स्थापना करके कुशासन को चुनौती दी। 1946 ई. में नवयुवकों ने प्रजामण्डल आन्दोलन में जान फूंक दी। अंतत: नवाब ने आंदोलनकारियों से सुलह कर ली। 1947 में लोहारू रियासत का हिसार जिले में विलय हो गया।

 

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