बालकों के सीखने की विधियाँ

Learning methods of Children

आधुनिक शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि परम्परागत विधियाँ उतनी प्रभावशाली नहीं हैं जितनी कि आज की शिक्षा की माँग है। अतः परिणामस्वरूप कुछ आधुनिक सीखने की विधियों का प्रतिपादन किया गया जिन्हें तुलनात्मक रूप से अधिक प्रभावशाली माना गया है।

इनमें से कुछ प्रमुख विधियाँ निम्नवत् हैं

प्रेक्षण द्वारा सीखना (Observation learning)

  • शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बालक किसी प्रक्रिया को प्रेक्षण द्वारा अधिक जल्दी से सीख लेते हैं। इस विधि का प्रतिपादन बैण्डुरा द्वारा किया गया था।
  • बैण्डुरा ने कई प्रयोगात्मक अध्ययनों में यह देखा कि जब बालक किसी प्रक्रिया को पुनर्बलित होते देखता है, तो उनमें वैसा ही करने की एक तीव्र प्रवृत्ति जाग उठती है जिसके फलस्वरूप वह उसी प्रक्रिया को तेजी से सीख लेता है। इस विधि के माध्यम से बालक जल्दी सीख लेता है और उसे सीखने के बाद लम्बे समय तक धारण किए रहता है।

विवेचना विधि (Deliberation method)

  •  इस विधि पर भी शिक्षकों ने अधिक बल डाला है। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक ऐसी विधि है जिसमें बालक प्राय: समूह में सीखे जाने वाले विषय के गुण-दोष की विवेचना करता है।
  • अपनी रुचि के अनुसार कई बालक विषय के प्रत्येक पहलू का मूल्यांकन करते हैं और एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं।
  • इबेल का मत है कि इस विधि में चूँकि छात्रों में सहभागिता की भावना होती है, इसलिए इससे सीखा गया या ग्रहण किया गया विषय बालकों को अधिक समय तक याद रहता है।

करके सीखना (learning by doing)

  • जब बालक किसी कार्य को स्वयं करके देखता है या स्वयं ही उसके विशेष स्वरूप को समझने के लिए कुछ प्रयोग करता है, तो इससे वह तेजी से उस कार्य को सीख लेता है।
  • मनोवैज्ञानिकों का मत है कि जब बालकों को कोई कार्य स्वयं करने का मौका दिया जाता है, तो इससे वे उस कार्य में आई विशेष कठिनाइयों से अवगत होते हैं, उस पर विशेष ध्यान देते हैं तथा उसके समाधान में भी विशेष रुचि दिखाते हैं। इन सबका परिणाम यह होता है कि वे उस कार्य को आसानी से सीख लेते हैं।

आवृत्तिकरण तथा पुनः निरीक्षण विधि (Frequency and re-inspection method)

  • आवृत्तिकरण विधि तथा पुन: निरीक्षण विधि एक-दूसरे के पूरक हैं। आवृत्तिकरण विधि में बालक किसी पाठ को सीख लेने के बाद बिना देखे ही उस विषय को मन-ही-मन दोहराता है। जरूरत पड़ने पर वह बीच में उस सीखे गए पाठ का पुन: निरीक्षण भी कर लेता है अर्थात् उसे पुन: देख भी लेता है।
  • ह्वाईट के अनुसार ये दोनों विधियाँ आपस में मिलकर सीखने की एक उत्तम प्रभावकारी विधि का निर्माण करती हैं, क्योंकि इस विधि में बालकों को अपनी भूल सुधारने का उचित अवसर मिलता है जिससे वे सक्रिय होकर विषय को सीखने के लिए प्रेरित हो उठते हैं।

रटकर तथा समझकर सीखने की विधि (Method of learning by rote and understanding)

  • बालकों में विषय को रटकर सीखने अथवा समझकर सीखने की विधि भी काफी लोकप्रिय है। स्पीयर्स तथा सोलोमोन ने इन विधियों से सीखे गए विषयों के स्वरूप तथा सीखने वाले बालकों के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है।
  • इन लोगों ने बताया है कि 4 से 6 वर्ष की उम्र के बालक किसी विषय को रटकर अर्थात् बिना उसका विशेष अर्थ समझे हुए सीख लेता है, परन्तु जैसे-जैसे बालकों की उम्र बढ़ती जाती है, वे विषय को समझकर अधिक सीखते हैं तथा रटने की विधि का प्रयोग यदा-कदा करते हैं।
  • बालक प्राय: उन विषयों को रटते हैं जिनका कठिनाई-स्तर अधिक होता है। रटने की विधि छोटे बालकों के लिए एकप्रभावकारी विधि मानी गई है जबकि समझकर सीखने की विधि . बड़े बालकों के लिए एक प्रभावकारी विधि मानी गई है।

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