कुरुक्षेत्र शहर

Kurukshetra City

ऐतिहासिक नगरी कुरूक्षेत्र आर्य संस्कृति का विश्वप्रसिद्ध प्राचीन केन्द्र है। ऐसी मान्यता है कि महाराज कुरू के नाम पर कुरूक्षेत्र को यह नाम मिला। श्रीमद्भागवतगीता की जन्मस्थली माने जाने वाले कुरूक्षेत्र को अनेकों सभ्यताओं और संस्कृतियों का केन्द्र होने का गौरव प्राप्त है। कुरूक्षेत्र जिले में अनेकों प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान और सांस्कृतिक केन्द्र हैं। ऐसी मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना यहीं पर की थी।

कुरुक्षेत्र जिले की स्थापना एवं प्रशासनिक परिदृश्य

करनाल जिले से थानेसर तथा कैथल का क्षेत्र अलग करके 23 जनवरी, 1973 को – हरियाणा के उत्तरी भाग में स्थित कुरूक्षेत्र जिला प्रदेश के 10वें जिले के रूप में अस्तित्व में आया। कुरुक्षेत्र जिले के उत्तर में अंबाला जिला, उत्तर-पश्चिम में पंजाब का पटियाला जिला, उत्तर-पूर्व में यमुनानगर, पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम में कैथल जिला तथा दक्षिण में करनाल जिला स्थित है। 1424 वर्ग कि.मी. में विस्तृत कुरूक्षेत्र जिला प्रशासनिक दृष्टि से अंबाला मण्डल का भाग है। कुरूक्षेत्र का जिला मख्यालय करुक्षेत्र में स्थित है। जिले में चार उपमण्डल, 04 तहसील, 02 उपतहसील तथा 07 खण्ड हैं। कुरूक्षेत्र जिले में 381 ग्राम पंचायतें, 07 पंचायत (ब्लॉक) समिति तथा 17 जिला परिषद् वार्ड हैं। जिले में कुल 419 गाँव हैं।

संसदीय लोकतंत्र की दृष्टि से कुरूक्षेत्र जिला कुरूक्षेत्र लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। जिले में 04 विधानसभा क्षेत्र-थानेसर, शाहबाद (आरक्षित), लाडवा तथा पेहोवा हैं। नवंबर 2016 में हरियाणा सरकार ने लाडवा को नई तहसील तथा उपमण्डल बनाया है। इसी प्रकार पीपली को नया ब्लॉक (खण्ड) बनाया गया है।

कुरूक्षेत्र जिले का ऐतिहासिक परिचय (Historical introduction of Kurukshetra district)

प्राचीनकाल में थानेसर नगरी श्रीकण्ठ जनपद की राजधानी थी। 7वीं सदी के शक्तिशाली वर्धन वंश का उदय यहीं पर हुआ था। इस वंश – के शासनकाल में थानेसर नगर पूरे भारत में राजनैतिक तथा धार्मिक महत्व के चरम को छू रहा था। थानेसर नगर का गौरवपूर्ण इतिहास बाणभट्ट द्वारा रचित ‘हर्षचरित’ चीनी यात्री ह्यूनत्सांग के वृतांत तथा ऐसे अनेकों अन्य ग्रन्थों में मिलता है। बौद्ध तथा जैन साहित्य में थानेसर का वर्णन ‘थूण’ अथवा ‘थूणा ग्राम’ के रूप में मिलता है। कुरूक्षेत्र का महाभारत काल से गहरा संबंध है। कृष्ण जी ने ज्योतिसर सरोवर के निकट अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। कुरूक्षेत्र रेलवे स्टेशन से लगभग 8 कि.मी. दूर ज्योतिसर सरोवर पौराणिक नदी सरस्वती के लुप्तप्राय प्रवाह पथ के किनारे स्थित है। कुरूक्षेत्र में ही कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं के बीच महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध लड़ा गया था। 18 दिन तक चले इस युद्ध में जन-धन की भयंकर तबाही हुई थी। महाभारत काल से पूर्व कुरूक्षेत्र में 10 राजाओं के मध्य युद्ध का वृतांत भी इतिहास में मिलता है।

कुरुक्षेत्र जिले के प्रमुख शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थानों के लिए यहाँ पढ़ें 

पुराणों के अनुसार भरतवंश के प्रतापी राजा कुरू के नाम पर कुरूक्षेत्र को यह नाम मिला। 1947 में विभाजन के समय ‘कुरूक्षेत्र’ नाम से यहाँ एक शरणार्थी कैंप लगाया गया। इससे पूर्व इस क्षेत्र को थानेसर तहसील के नाम से जाना जाता था। ‘थानेसर’ को ‘स्थाणीश्वर’ शब्द का अपभ्रंश माना जाता है, जिसका अर्थ होता है-“ईश्वर का स्थान’। थानेसर स्थित ‘स्थाणीश्वर महादेव मदिर’ इस क्षेत्र के सबसे प्राचीन मन्दिरों में से एक माना जाता है। कुरूक्षेत्र के साथ लगता गाँव-अमीन है। अमीन स्थित ऊँचे टीले का संबंध महाभारत के युद्ध से माना जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि महाभारत युद्ध के दौरान यहीं पर द्रोणाचार्य द्वारा रचे गए चक्रव्यूह में अभिमन्यु की हत्या की गई थी।

प्राचीन हिन्दू साहित्य में कुरूक्षेत्र का वृत्तांत एक शहर के रूप में नहीं बल्कि एक क्षेत्र के रूप में मिलता है। कुरूक्षेत्र की सीमाएँ दक्षिणी पंजाब, मध्य तथा पश्चिमी हरियाणा तक विस्तृत थी। वामन पुराण के अनुसार सरस्वती नदी के किनारे सरस्वती तथा दृशाद्वती नदियों के मध्य के इस क्षेत्र को राजा कुरू ने आध्यात्म के आठ गुणों- सत्य, तप, क्षमा, दया, दान, यक्ष, शुचि तथा ब्रह्मचर्य के क्षेत्र के रूप में चुना था। राजा कुरू के इस कार्य से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि इस क्षेत्र को हमेशा धर्मक्षेत्र के रूप में जाना जाएगा तथा इस क्षेत्र में प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

इस क्षेत्र को अलग-अलग कालखण्ड में उत्तरवेदी, ब्रह्मवेदी, धर्मक्षेत्र तथा कुरूक्षेत्र आदि विभिन्न नामों से जाना जाता रहा है। जब राजा कुरू यहाँ आए उस समय इस क्षेत्र को उत्तरवेदी के नाम से जाना जाता था।

यों तो कुरुक्षेत्र पर भारतवर्ष के सभी महान् राजवंशों का शासन रहा। सम्राट अशोक के शासनकाल में कुरूक्षेत्र धर्म, आध्यात्म और शिक्षा का प्रमुख केन्द्र रहा था। यहाँ बौद्ध धर्म का भी प्रमुख केन्द्र था। परन्तु कुरूक्षेत्र ने अपने वैभव के चरम को प्राप्त किया राजा हर्षवर्धन के काल में। राजा हर्ष ने थानेसर को अपनी राजधानी बनाया। ह्यूनत्सांग के वृत्तांत में थानेसर शहर के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में राजा अशोक द्वारा निर्मित 300 फीट ऊँचे स्तूप का वर्णन मिलता है। कनिंघम के अनुसार सरस्वती के प्रवाह क्षेत्र में औजसघाट के निकट स्थित टीले इस स्तूप के अवशेष से बने हो सकते हैं।

कुरूक्षेत्र जिले के महत्वपूर्ण स्थलों के लिए यहाँ पढें

पंजाब और थानेसर के क्षेत्र को लगातार हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। पुष्पभूति राजा प्रभाकर वर्धन ने हूणों का सामना करने के लिए अपने पुत्र राज्यवर्धन और हर्षवर्धन को भेजा। प्रभाकरवर्धन के उपरान्त राज्यवर्धन थानेसर की गद्दी पर बैठा परन्तु जल्दी ही गौड़ा नरेश द्वारा मार दिया गया। राज्यवर्धन के उपरान्त राजा हर्षवर्धन ने क्षेत्र को राजनैतिक तथा सामरिक दृष्टि से सुदृढ़ किया। यशोवर्मन के काल में कुरूक्षेत्र कन्नौज साम्राज्य का अंग था। यशोवर्मन के पश्चात् कुरूक्षेत्र पर कश्मीर के शासक ललितादित्य का अधिकार हो गया। 10वीं सदी के मध्य तक आते-आते दिल्ली और हरियाणा के अधिकांश क्षेत्र तोमर साम्राज्य के अधीन आ गए थे।

अपनी विशेष भौगोलिक और सामरिक स्थिति के कारण कुरूक्षेत्र को अनेकों तुर्क-अफगान आक्रमणों का सामना करना पड़ा। तुर्क शासक मुहम्मद गजनवी मूलतः एक लुटेरा था। उसने 1014 ई. में थानेसर पर आक्रमण किया। लुटेरे गजनवी ने थानेसर के ऐतिहासिक चक्रपाणि मन्दिर को तहस-नहस कर दिया। उसने भगवान चक्रस्वामी की प्रतिमा को उखाड़कर गजनी भिजवा दिया और उसे आम रास्ते पर गाड़ने के आदेश दिए। दिल्ली के तोमर शासक विजयपाल ने गजनवी के विरुद्ध अन्य राजे-राजवाड़ों से सहायता मांगी परन्तु, उसे निराशा ही हाथ लगी। इसके पश्चात् लगभग एक सदी तक इस क्षेत्र में शान्ति बनी रही। 1192 ई. में कुरूक्षेत्र को मुहम्मद गौरी के रूप में पुनः तुर्क आक्रमणों का सामना करना पड़ा।

सुल्तान इल्तुतमिश ने राज्य को ‘इक्तों’ में बांटा हुआ था। आधुनिक कुरूक्षेत्र जिला तत्कालीन ‘पीपली’ इक्ते का भाग था। इल्तुतमिश के उपरान्त क्षेत्र में अशान्ति बनी रही। 1266 में बलबन के सत्ता संभालने के उपरान्त इस क्षेत्र में शान्ति स्थापित हुई। उसने थानेसर में चेक-पोस्ट का निर्माण किया। फिरोजशाह तुगलक की एक पत्नी का संबंध थानेसर से था। वह एक हिन्दू स्त्री थी। फिरोजशाह तुगलक ने अरबी विद्वान मौलाना अहमद थानेश्वरी को प्रश्रय दिया। मौलाना अहमद थानेश्वरी का संबंध भी थानेसर से था। अफगान सरदार शेरशाह सूरी ने लाहौर जाते समय थानेसर में सेना सहित ठहराव किया था। उसने थानेश्वर शहर में दो सराय का भी निर्माण करवाया। शेरशाह सूरी के शासनकाल में इस क्षेत्र में पूर्णतया शान्ति रही।

हुमाँयु की मृत्यु के पश्चात् पंजाब के कलानौर में अकबर ने खुद को दिल्ली का बादशाह घोषित कर दिया। अक्तूबर 1556 में दिल्ली आते समय बादशाह अकबर कुछ दिनों तक थानेश्वर शहर में रुका तथा प्रसिद्ध सूफी सन्त शेख जलाल का आशीर्वाद प्राप्त किया। 1567 में कुरूक्षेत्र के सन्यासियों के दो गुटों-कुरू और पुरी के मध्य विवाद और उनके मध्य खूनी संघर्ष को अकबर द्वारा तमाशा बनाए जाने का उल्लेख भी इतिहास के दस्तावेजों में मिलता है। अकबर ने अन्तिम बार 1598 ई. में इस क्षेत्र का दौरा किया। औरंगजेब के काल को कुरूक्षेत्र के लिए ‘दुर्भाग्य का काल’ माना जा सकता है। धर्मान्ध बादशाह औरंगजेब ने इस धर्मनगरी के अनेकों मन्दिरों को तहस-नहस किया।

औरंगजेब ने ब्रह्म सरोवर में स्नान करने पर 5रु. और जल ग्रहण करने पर 1रु. का भारी शुल्क लगा दिया। उसने यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं पर अपने सैनिकों से अत्याचार करवाए। उसने ब्रह्मसरोवर के निकट एक तोपखाने का निर्माण करवाया जहाँ से उसके सैनिक श्रद्धालुओं पर हमला करने को स्वतंत्र थे। स्थानीय मान्यता के अनुसार मराठाओं ने 18वीं सदी में इस तोपखाने को नष्ट किया।

मुगलकाल में कुरूक्षेत्र में अन्य संप्रदाय भी अस्तित्व में आए। अकबर के काल में थानेसर सूफी और चिश्ती विचार धारा का प्रमुख केन्द्र बनकर उभरा। चिश्ती संत हजरत जलालुद्दीन का भी इस क्षेत्र में काफी प्रभाव था। उन्होंने यहाँ थानेसर में एक मदरसा भी स्थापित किया। उसका दामाद शेख निजामुद्दीन भी इस्लामिक विद्वान था। 1605 में जहांगीर के खिलाफ विद्रोह के दौरान शहजादा खुसरो शेख निजामुद्दीन के पास आया। विद्रोही शहजादे के साथ सहानुभूति रखने के कारण बादशाह जहांगीर ने शेख निजाम को मक्का निष्काषित कर दिया। एक अन्य प्रसिद्ध सूफी संत शेख चेहली का संबंध भी थानेसर से था। हजरत शेख चेहली एक ईरानी संत थे। वह हजरत जलालुद्दीन से मिलने थानेसर आए थे और तदुपरांत यहीं अपना ठिकाना बना लिया। थानेसर में उनकी मृत्यु के उपरांत शहजाहा दाराशिकोह ने थानेसर में शेख चेहली का मकबरा बनवाया जिसे ‘हरियाणा का ताजमहल’ भी कहते हैं।

मुगलकाल में कुरूक्षेत्र में सिख धर्म का भी काफी प्रभाव रहा। दस में से नौ सिख धर्म गरुओं ने करूक्षेत्र की यात्रा की। 1709 ई. में बाबा बन्दा बहादुर ने थानेसर और शाहबादं की मुगल सेनाओं पर हमला किया और इन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। परन्तु, 1710 ई. में ये क्षेत्र पुनः बहादुर शाह की सेनाओं द्वारा हथिया लिए गए। दिल्ली की कमजोर सत्ता और अपनी विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण कुरूक्षेत्र को लगातार आक्रमणों का सामना करना पड़ा। 1739 ई. में कुरूक्षेत्र को नादिर शाह के आक्रमण की पीड़ा झेलनी पड़ी। तुर्क लुटेरों ने इस क्षेत्र में खूब लूट-पाट की और जनता पर अत्याचार किए। 1754-56 ई. तक कुरूक्षेत्र पर पंजाब के गवर्नर अदीना बेग का अधिकार रहा। 1756 ई. में अब्दाली की सेनाओं ने अदीना बेग को इस क्षेत्र से भगा दिया।

1758 ई. में यह क्षेत्र मराठों के अधिकार में चला गया। मराठों ने कुरूक्षेत्र के धार्मिक महत्व को पुन:स्थापित करने का प्रयास किया। 1761 ई. में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों की हार के उपरान्त थानेसर और शाहबाद के क्षेत्र पर अहमद शाह अब्दाली की सेनाओं का अधिकार हो गया। अब्दाली की सेनाओं की पंजाब से वापसी के उपरान्त इस क्षेत्र में सिखों का आधिपत्य हो गया। 30 दिसम्बर, 1803 को मराठों और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच ‘सर्जी अंजन गाँव’ की सन्धि के उपरान्त यह जिला अंग्रेजों के अधिकार मे चला गया। परन्तु, लाडवा के सिख सरदार गुरदीत सिंह और थानेसर के सरदार बंगा सिंह ने अंग्रेजों का आधिपत्य स्वीकार नहीं किया। भयंकर संघर्ष के उपरान्त अप्रैल 1805 तक आते-आते अंग्रेजों ने इन दोनों सिख सरदारों को हरा दिया।

अंग्रेजों ने सरदार गुरदीत सिंह से करनाल का परगना छीन लिया परन्तु, सद्भावना के रूप में लाडवा का क्षेत्र गुरदीत सिंह के पास रहने दिया। यह व्यवस्था 1830 ई. तक चलती रही। राजा जमीयत सिंह की बिना उत्तराधिकारी मृत्यु हो जाने के कारण 1832 में अंग्रेजों ने थानेसर का 2/5 भाग अपने अधिकार में ले लिया। बचा हुआ 3/5 भाग 1850 में राजा फतेहसिंह की विधवा, रानी चांदकौर की मृत्यु के उपरान्त अंग्रेजों ने हथिया लिया। लाडवा के शासक अजीत सिंह द्वारा विद्रोह के उपरान्त 1845 में अंग्रेजों ने लाडवा को भी कब्जा लिया। उस समय लाडवा पर राजा अजीत सिंह का अधिकार था। लाडवा में कुरूक्षेत्र जिले की सर्वाधिक प्राचीन नगरपालिका है। इसकी स्थापना 1867 में की गई।

1892 में कुरूक्षेत्र में सनातन धर्म सभा की शाखा खुली। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में कुरूक्षेत्र जिले में आर्य समाज का भी काफी प्रभाव रहा। कुरूक्षेत्र जिले में 1893 में शाहबाद में आर्य समाज की शाखा खुली। 1894 में थानेसर तथा 1900 ई. में लाडवा में भी आर्य समाज की शाखाएँ स्थापित हुई। 13 अप्रैल, 1912 को बैसाखी के दिन स्वामी ऋद्धानन्द ने कुरुक्षेत्र गुरुकुल की नींव रखी। यह गुरुकुल हरियाणा का प्रथम आर्य समाज गुरुकुल है।

स्वामी श्रद्धानन्द जी के स्वप्न को साकार करने के लिए दानवीर लाला ज्योति प्रसाद जी ने विपुल भूमि तथा 10,000 रुपए इस गुरुकुल की स्थापना हेतु दान दिए।

कुरूक्षेत्र की जनता ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया। जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड का विरोध हो या लाला लाजपतराय पर अग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचार के विरुद्ध उमड़ा जनाक्रोश, कुरूक्षेत्र की जनता ने प्रत्येक आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। यद्यपि जिले में असहयोग आन्दोलन का प्रभाव अपेक्षाकृत कम था परंतु भारत छोड़ों अंदोलन में क्षेत्र की जनता ने तन-मन-धन से भाग लिया। आजादी के बाद से 1 नवंबर, 1966 तक कुरूक्षेत्र पंजाब का भाग रहा।

पेहोवा – कुरुक्षेत्र

पेहोवा, कुरुक्षेत्र जिले का एक महत्वपूर्ण उपमण्डल है। 1979 में पेहोवा को तहसील का दर्जा मिला तथा इसके दस वर्ष बाद 1 नवंबर, 1989 को यह उपमण्डल बना। उपमण्डल मुख्यालय होने के साथ-साथ पेहोवा का धार्मिक महत्व भी है।

पहोवा का संबंध राजा पृथु से है। राजा पृथु ने यहाँ अपने पिता वेणु की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना की थी तथा व्रत रखे थे। मान्यता है कि राजा पृथु के पिता वेणु जब मृत्यु-शैय्या पर थे तो उन्होंने राजा पृथु से इच्छा व्यक्त की कि वह अपनी अन्तिम साँस पवित्र सरस्वती नदी के तट पर लेना चाहते हैं। राजा पृथु ने पिता की इच्छा का पालन किया।

मान्यता है कि शिव और पार्वती की इच्छा के अनुसार पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने के उपरान्त भगवान कार्तिकेय ने पेहोवा के स्थान पर अपनी त्वचा उतारकर पार्वती को दे दी थी। इसी स्थान पर पेहोवा में भगवान कार्तिकेय का मन्दिर बना हुआ है। यह मन्दिर चट्टान के दो खण्डों से बना हुआ है। मन्दिर में भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा स्थापित है तथा दो तेल के दिये प्रज्जवलित रहते हैं। मान्यता है कि महाभारत युद्ध में मारे गए 18,00,000 लोगों की शान्ति के लिए कृष्ण जी ने ये दिये जलाने के लिए युधिष्ठिर को कहा था। मान्यता के अनुसार पत्थर के खण्डों तथा दिये में तेल चढ़ाने से भगवान कार्तिकेय प्रसन्न होते हैं तथा पूर्वजों को शान्ति मिलती है। यहाँ पर माता सरस्वती का मन्दिर भी है। प्राचीन मान्यता है कि ऋषि विश्वामित्र को यहीं पर ब्रह्मर्षि पद प्राप्त हुआ था।

पेहोवा में स्थित पशुपतिनाथ महादेव मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मन्दिर की विशेषता है कि यहाँ कोई शिवलिंग नहीं है। मन्दिर में भगवान शिव की पंचमुखी मूर्ति स्थापित है। पूरे प्रदेश में भगवान शिव की पंचमुखी प्रतिमा केवल पशुपतिनाथ मन्दिर, पेहोवा में ही स्थापित है।

पेहोवा का पृथूदक तीर्थ पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान से लोग अपने पूर्वजों का पिण्डदान करने आते हैं। यहाँ की विशेषता यह है कि यहाँ पिण्डदान करने वाले परिवारों का रिकॉर्ड यहाँ रखा जाता है। लोग अपने पिछले 400 वर्षों का पारिवारिक इतिहास यहाँ देख सकते हैं।

पेहोवा के अन्य धर्म-स्थल

  • गुरुद्वारा बावली साहिब
  • श्रवणनाथ मन्दिर गुरुद्वारा
  • श्री शीश महल साहिब
  • गरीबनाथ मन्दिर

कुरुक्षेत्र का सामाजिक एवं आर्थिक परिदृश्य (Social and Economic Scenario of Kurukshetra)

कुरूक्षेत्र जिले की कुल जनसंख्या 9,64,655 (2011 जनगणना) है। जिले में पुरुषों की जनसंख्या 5,10,976 तथा महिलाओं की जनसंख्या 4,53,679 है। 2011 की जनगणना के अनुसार जिले का जनसंख्या घनत्व 630 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. तथा लिंगानुपात 1000 पुरुषों पर 888 महिलाएँ हैं। कुरूक्षेत्र जिले की साक्षरता दर 76.3% (पुरुष साक्षरता दर 83.0% तथा महिला साक्षरता साक्षरता दर 68.0%) है। साक्षरता की दृष्टि से जिले का प्रदेश में 11वाँ स्थान हैं। कुरूक्षेत्र जिले की 71.05% जनता ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। जिले में औद्योगिकरण सीमित तथा अल्पविकसित अवस्था में है। जिले की अधिकतर जनता कृषि तथा कृषि से संबद्ध अन्य गतिविधियों से जुड़ी हुई है।

कुरूक्षेत्र जिला पौराणिक सरस्वती नदी द्वारा सिंचित रहा है। जिले में मारकण्डा तथा आपगा नदियों का प्रवाह है। यह जिला प्रदेश के विशाल जलोढ़ मृदा के मैदान का भाग है। कुरुक्षेत्र जिले में मुख्य रूप से गेहूँ, धान तथा गन्ने की खेती होती है। कुरूक्षेत्र जिला बासमती चावल की पैदावार के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। आलू तथा शकरकन्द के उत्पादन में कुरूक्षेत्र जिले का पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान है। कुरूक्षेत्र के स्योंठी गाँव में ‘क्लोनल सफेदा संवर्द्धन केन्द्र’ की स्थापना की गई है। जिले मे सूरजमुखी का उत्पादन किया जाता है तथा आम के उत्पादन में भी कुरूक्षेत्र जिला प्रसिद्ध है।

कुरूक्षेत्र जिला राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1 पर स्थित है। यातायात को सुचारु बनाने के लिए हाल ही में अंबाला-साहा-शाहाबाद मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किया गया है। कुरूक्षेत्र जंक्शन उत्तर रेलवे का पुराना जंक्शन है। हरियाणा का प्रमुख रेलमार्ग दिल्ली से होकर राज्य के पूर्वी किनारे के साथ-साथ उत्तर दिशा में सोनीपत, करनाल, कुरूक्षेत्र व अंबाला से होता हुआ अमृतसर तक पहुँचता है। एक अन्य रेलमार्ग कुरूक्षेत्र को कैथल के रास्ते नरवाना से जोड़ता है।

जिले को वायुमार्ग से जोड़ने के लिए कुरूक्षेत्र तथा करनाल के मध्य अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने को हरियाणा सरकार प्रयासरत है। _ यद्यपि जिले मे औद्योगिक विकास के लिए विशेष प्रयास किए जाने की अवश्यकता है परंतु शिक्षा तथा पर्यटन के क्षेत्र में कुरूक्षेत्र जिला परे देश में प्रसिद्ध है। यहाँ अनेकों राष्ट्रीय स्तर के शिक्षण स्थान हैं।

कुरुक्षेत्र जिले के प्रमुख शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान के लिए यहाँ पढ़ें 

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *