करनाल शहर

Karnal City

1966 में हरियाणा गठन के समय हरियाणा में कुल सात जिले थे। करनाल जिला भी उनमें से एक है। यह जिला हरियाणा का अत्यंत समृद्ध तथा सुंदर क्षेत्र है। करनाल शहर को इसकी सुंदरता के कारण ‘हरियाणा का पेरिस’ भी कहा जाता है।

करनाल जिले की स्थापना एवं परिचय (Establishment and introduction of Karnal district)

1 नवम्बर 1966 को हरियाणा गठन से पूर्व करनाल जिला पंजाब का भाग था। हरियाणा गठन के समय करनाल हरियाणा का जिला बना। करनाल जिला हरियाणा प्रदेश के मध्यपूर्व में स्थित है। जिले के पूर्व में उत्तर प्रदेश की सीमाएँ लगती हैं। करनाल जिले के दक्षिण में पानीपत, दक्षिण-पश्चिम में जीन्द, पश्चिम में कैथल, उत्तर में कुरुक्षेत्र तथा उत्तर-पूर्व में यमुनानगर जिलों की सीमाएँ लगती हैं।

करनाल जिले का ऐतिहासिक परिदृश्य (Historical landscape of Karnal district)

करनाल एक प्राचीन शहर है। शहर का प्राचीन नाम ‘कर्णलय’ होता था। ऐसी मान्यता है कि इस शहर को महाभारतकाल में अंगराज कर्ण ने बसाया था। स्थानीय मान्यता है कि महाभारतकाल में करनाल की कर्ण झील के स्थान पर एक विशाल तालाब होता था जहां पर स्नान और साधना करने के उपरान्त अंगराज कर्ण प्रतिदिन सोना दान किया करते थे। यहीं से अंगराज कर्ण ‘दानवीर कर्ण’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। शेष हरियाणा की तरह करनाल का क्षेत्र मौर्य, कुशाण, गुप्त तथा यौद्धेय गणराज्यों का भाग रहा है। 7वीं सदी में पुष्पभूति शासकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया। हर्षवर्धन के शासनकाल में थानेसर तथा करनाल का क्षेत्र पूरे उत्तर भारत के आकर्षण का केन्द्र था।

770-810 ई. के बीच यह क्षेत्र कन्नौज राज्य के अधीन रहा। उस समय कन्नौज पर बंगाल के पाल शासकों का शासन था। प्रतिहार शासक मिहिर भोज (836-885 ई.) ने 9 वीं सदी के मध्य तक आते-आते अपने राज्य को कन्नौज से पेहोवा तक विस्तृत कर दिया। 10वीं सदी तक आते-आते इस क्षेत्र से प्रतिहार शासकों की पकड़ ढीली होने लगी तथा दिल्ली में तोमर शासकों का प्रभाव बढ़ने लगा। 12वीं सदी तक आते-आते तोमरों की सत्ता को शांकभरी के चौहान शासकों से गंभीर चुनौती मिलनी आरंभ हो गई। चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ ने तोमर शासकों को पदच्युत करके दिल्ली और हरियाणा में चौहानों की सत्ता स्थापित कर दी। 1190-91 ई. में पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया। 1191 ई. में करनाल जिले के तरावड़ी में पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध को इतिहास में ‘तराईन का प्रथम युद्ध’ के नाम से जानते हैं। युद्ध में मुहम्मद गौरी की करारी हार हुई और उसे वापिस लौटना पड़ा।

एक वर्ष उपरान्त 1192 ई. में मुहम्मद गौरी ने पूरी तैयारी और छल-बल के साथ पुनः आक्रमण किया। तरावड़ी (तराईन) के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की करारी हार हुई। इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान वीरगति को प्राप्त हुआ। तरावड़ी (तराईन) के दूसरे युद्ध ने हिन्दुस्तान की गुलामी की नींव रख दी। यही कारण है कि तरावड़ी को ‘दिल्ली सलतनत का प्रवेश द्वार’ कहा जाता है।

इल्तुतमिश के शासनकाल में करनाल का क्षेत्र पिपली के इक्ते में शामिल था। 1398 ई. में जब दिल्ली की गद्दी पर नासिरूद्दीन महमूद बोझ बना बैठा था, लुटेरे तैमूर ने आक्रमण किया। घग्गर के रास्ते से राजस्थान से हरियाणा में प्रवेश करके सिरसा तथा हिसार जिलों में लूट मचाने के बाद वह करनाल पहुँचा। कैथल, असंध, तुगलकपुर तथा सालवान आदि क्षेत्रों में लूटपाट करने के बाद वह 3 दिसंबर, 1398 को पानीपत पहुँच गया। सुलतान कायर था और तैमूर लंग एक निर्दयी लुटेरा। वह एक महीने तक हरियाणा और दिल्ली को लूटने के पश्चात वापिस लौट

गया।

21 अप्रैल, 1526 को जहीरूद्दीन बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली सलतनत का अंत करके मुगल साम्राज्य की नींव रखी। 334 वर्ष पूर्व करनाल जिले के तरावड़ी (तराईन) से उदय हुआ दिल्ली सल्तनत का सूर्य पानीपत में डूब गया। धीरे-धीर बाबर ने इस पूरे क्षेत्र को हथिया लिया।

1556 ई. में अकबर गद्दी पर बैठा। प्रशासन की दृष्टि से अकबर ने अपने साम्राज्य को विभिन्न प्रान्तों (सूबों) में बांट रखा था। 1602 ई. में अकबर के साम्राज्य में 15 प्रान्त थे। करनाल शहर, दिल्ली सूबे (प्रान्त) के अन्तर्गत करनाल परगने का मुख्यालय था। शाहजहां के शासनकाल तक यही व्यवस्था चलती रही। शाहजहां ने ‘चकला’ के नाम से एक नई प्रशासनिक इकाई बनाई। परन्तु, करनाल का क्षेत्र अब भी दिल्ली सूब का ही परगना बना रहा।

3 मार्च, 1707 को औरंगजेब की मृत्यु के बाद देश में मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया। करनाल जिले के कंजपरा के फौजदार नजाबत खां ने भी बादशाह को आंख दिखानी आरंभ कर दी। 1739 ई. में फारस के शासक नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। उस समय बादशाह मुहम्मदशाह मुगल साम्राज्य को ढो रहा था। 24 फरवरी, 1739 को करनाल में नादिरशाह और मुहम्मदशाह की सेनाओं के बीच भिडंत हुई। इतिहास में इस युद्ध को ‘करनाल का युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में रेवाड़ी के तत्कालीन शासक राव बालकिशन ने मुहम्मद शाह के समर्थन में लड़ते हुए शहादत दी। नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की कमर तोड़ दी। नादिरशाह दिल्ली तक लूटपाट करक वापिस चला गया।

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