जीन्द रियासत

जीन्द रियासत की नींव 1763 ई. में फुलकियां मिसल के संस्थापक फूलसिंह के पौत्र गजपत सिंह ने रखी थी। उसने जीन्द में एक विशाल दुर्ग का निर्माण भी करवाया था। महाराज रणजीत सिंह उनकी बहन के पुत्र थे।

1786 ई. में गजपत सिंह की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र भागसिंह जीन्द की गद्दी पर बैठा। 1803 ई. में मराठाओं के साथ द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध में भागसिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया। इसी वर्ष राजा भागसिंह को लकवा मार गया तथा उसका पुत्र प्रतापसिंह जीन्द की गद्दी पर बैठा। वह अंग्रेजों का विरोधी था। 23 जून, 1814 ई. को उसने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों ने रणजीत सिंह की सहायता से उसे गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। 1816 ई. में कारावास में ही उसकी मृत्यु हो गई। प्रतापसिंह के उपरान्त राजकुमार फतेहसिंह गद्दी पर बैठा परन्तु, वह 1822 ई. में स्वर्ग सिधार गया। 1822 में 11 वर्ष की आयु में राजकुमार संगत सिंह राजा बना। 12 वर्ष के शासन के बाद संगत सिंह भी 2 नवंबर, 1834 को चल बसा।

संगत सिंह के युवावस्था में ही गुजर जाने के उपरान्त 1834 ई. में उसका चचेरा भाई सरूप सिंह राजा बना। वह धूर्त और अंग्रेजों का पिछलग्गू था। सरूप सिंह ने 1857 के विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों की सहायता की। यदि सरूप सिंह नहीं होता तो अंग्रेजों के लिए दिल्ली का पुनः हथियाना असंभव होता। 1864 ई. में सरूप सिंह की मृत्यु के उपरान्त उसके पुत्र रघुबीर सिंह ने सत्ता संभाली तथा उसने 1887 ई. तक 23 वर्ष शासन किया। दूसरे आंग्ल-अफगान युद्ध में रघुबीर सिंह की सहायता से प्रसन्न होकर अंग्रेजों ने रघुबीर सिंह को ‘राजा-ए-राजगा की उपाधि दी।

1887 ई. में रघुबीर सिंह की मृत्यु के पश्चात् उसका 8 वर्षीय पोता रणवीर सिंह राजा बना। परन्तु, उसे पूर्ण सत्ता नवंबर, 1899 म मिल पाई। 1911 ई. में उसे महाराज की उपाधि मिली। राजा सरूप सिंह, रघुबीर सिंह तथा रणबीर सिंह की नीतियों ने जनता का खूब आणि दोहन किया। महाराज रणबीर सिंह की जनता की भलाई में कोई रुचि नहीं थी।

1927 ई. में जब रियासतों की आजादी के लिए रियासती ‘प्रजामण्डल’ बना तो स्थानीय तौर पर महाराज रणबीर सिंह का नाम विरुद्ध जीन्द रियासत में भी ‘जीन्द राज्य प्रजामण्डल’ की नरवाना में स्थापना हुई। जीन्द राज्य प्रजामण्डल के संस्थापकों में हसराज रहा…..

पं. देवीदयाल, बनारसी दास गुप्त तथा राजेन्द्र कुमार जैन का अहम योगदान रहा है। समय के साथ-साथ जीन्द, सफीदों, दादरी तथा संगरूर में भी प्रजामण्डल का विस्तार हो गया। 1940 ई. तक आते-आते प्रजामण्डल का विस्तार पूरी जीन्द रियासत में हो चुका था। भूमिकर की ऊंची दर, बेगार, सरकार में जनप्रतिनिधित्व के मुद्दों पर प्रजामण्डल द्वारा लगातार कई आन्दोलन किए गए।

रणबीर सिंह ने प्रजामण्डल के नेताओं को जेल में डाल दिया। स्थिति बिगड़ जाने के डर से जन विरोध के दबाव में महाराज ने इनकी अधिकतर मांगें तो मान लीं परंतु. समझौते पर अमल नहीं किया। प्रजामण्डल नेताओं ने पुनः आंदोलन की घोषणा कर दी रणवीर सिंह और हीरासिंह चिनारिया के नेतृत्व में एक एक्शन कमेटी बना दी। इस कमेटी ने 8 दिसंबर, 1846 को सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दिया। 18 जनवरी, 1947 को राजा ने चुनी हुई राजसभा की मांग को स्वीकार कर लिया| इस राजसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री गंगाराम कौल की जगह नया प्रधानमंत्री तथा सात अन्य सदस्य थे। इनमें से दो सदस्य प्रजामण्डल से, दो अकाली दल से तथा 1 सदस्य मुस्लिम लीग से लिया गया था। परन्तु, जनता इससे भी संतुष्ट नहीं हुई और दादरी में पुनः आन्दोलन भड़क उठा। अगस्त, 1947 में प्रजामण्डल ने औपचारिक चुनाव के माध्यम से जनता की राय जानी। जीन्द की जनता ने पंजाब में शामिल होने का निर्णय लिया। परन्तु, सरकार ने 15 जुलाई, 1948 को जीन्द रियासत को नवगठित ‘पटियाला एवं पूर्वी राज्य संघ (पेप्सू)’ में शामिल कर लिया।

 

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