समावेशी शिक्षा

Inclusive Education

समावेशी शिक्षा का तात्पर्य समाज के सभी वर्गों (सामान्य, निर्धन, वंचित, पिछड़े, अनुसूचित जाति एवं जनजाति) के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें शिक्षा का समान अवसर उपलब्ध कराना तथा विकास की मुख्यधारा में लाना है। इस शिक्षा का उद्देश्य सभी बालकों को शिक्षा देना तथा देश की प्रगति में उनकी मानव संसाधन क्षमता का उपयोग करना है। समावेशी शिक्षा समाज में एकता, समता एवं बंधुता को बढ़ावा देती है।

समावेशी शिक्षा को सभी व्यक्तियों की समानता के अधिकार को पहचानने और सभी बालकों को विशिष्ट आवश्यकताओं के साथ-साथ शिक्षा के समान अवसर के रूप में देखा जाता है। कम प्रतिबन्धित वातावरण में समावेशी शिक्षा द्वारा अपंग बालकों की शिक्षा सामान्य स्कूल तथा साधारण बालकों के साथ कुछ अधिक सहायता प्रदान करने की ओर इशारा करती है। समावेशी शिक्षा, शारीरिक तथा मानसिक रूप से बाधित बालकों को सामान्य बालकों के साथ सामान्य कक्षा में विशिष्ट सेवाएँ देकर विशिष्ट आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए शिक्षा देने में सहायता करती है।

समावेशी शिक्षा को निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है

  • समावेशी शिक्षा का तात्पर्य है समाज के सभी वर्गों के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में समाविष्ट कर उन्हें शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना।
  • भारत विविधता से परिपूर्ण एक विशाल देश है। यहाँ जाति-सम्प्रदाय, रीति-रिवाज, आर्थिक-सामाजिक स्थिति आदि अनेक आधारों पर विविधता देखने को मिलती है। विविध पृष्ठभूमि के बालकों से तात्पर्य भारतीय समाज के विविध वर्गों; जैसे—निर्धन, वंचित, पिछड़े, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों से है।
  • भारतीय समाज के अन्तर्गत निर्धन, पिछड़े, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों में साक्षरता दर सामान्य वर्ग से काफी कम है। इन वर्गों के उद्धार के लिए यह आवश्यक है कि इनके बच्चों को सामान्य वर्गों की तरह शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए जाएँ।
  • समावेशन (Inclusion) का तात्पर्य अधिकतर लोग यह लगाते हैं कि इसमें विकलांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ शिक्षा दी जाती है, जबकि यह समावेशन का एक संकुचित अर्थ है।
  • वास्तविकता में समावेशन केवल विकलांग लोगों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका अर्थ किसी भी बच्चे का वंचित न होना भी है।
  • समावेशी शिक्षा कक्षा में विविधता को प्रोत्साहित करती है, जिससे सभी संस्कृतियों को एक साथ मिलकर आगे बढ़ने का समुचित अवसर मिलता है।
  • समावेशी शिक्षा के अन्तर्गत सभी विशेष शैक्षिक आवश्यकता वाले विद्यार्थियों को विद्यालय में प्रवेश से रोकने की कोई प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। समावेशन की नीति को प्रत्येक स्कूल और सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था में व्यापक रूप से लागू किए जाने की आवश्यकता है।
  • समावेशी शिक्षा उस विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था की ओर संकेत करती है, जो उनकी शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, भाषिक या अन्य विभिन्न योग्यता की स्थितियों को ध्यान में रखे बगैर, सभी बच्चों को शामिल करती है।
  • सफल समावेशन के लिए बच्चे के जीवन के हर क्षेत्र में वह चाहे स्कूल में हो या बाहर, शिक्षा में सभी बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है।
  • समावेशी शिक्षा में शिक्षक के सामाजिक-आर्थिक स्तर का अधिक महत्त्व नहीं है, इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है

बच्चों के प्रति उसकी संवेदनशीलता

विद्यार्थियों के लिए उसका लगाव और धैर्य

विद्यार्थियों की अक्षमताओं का ज्ञान

  • निर्धन, वंचित, अनुसूचित जाति एवं जनजाति तथा असंगठित घर से आने वाला बच्चा स्वतन्त्र अध्ययन में सबसे अधिक कठिनाई का अनुभव करता है। इसलिए इनके सफल समावेशन के लिए इस प्रकार के विशेष रूप से जरूरतमन्द बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध दूसरे सामान्य बच्चों के साथ होना चाहिए।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *