सृजनात्मक बालकों की पहचान

Identification of creative children

शैक्षिक दृष्टि से सृजनात्मक बालकों को पहचानना तथा उनकी सृजनात्मक अभिव्यक्ति को सही दिशा देने के साथ-साथ उसके सर्वोत्तम विकास का मार्ग प्रशस्त करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मनोवैज्ञानिकों ने सृजनात्मकता का अध्ययन करके सृजनात्मक बालकों को पहचानने के लिए कुछ विशेषताओं को ज्ञात करने के प्रयास किए हैं। जैसे टोरेन्स ने अनेक सृजनात्मक व्यक्तियों के व्यवहारों का विशद अध्ययन करने के उपरान्त, सृजनात्मक व्यक्ति की 84 व्यक्तित्व विशेषताओं की एक सूची तैयार की थी। सृजनात्मकता के मापन में सृजनात्मक व्यक्तित्व की परिचायक ये 84 विशेषताएँ महत्त्वपूर्ण व सार्थक भूमिका अदा कर सकती हैं।

इनमें से सृजनात्मकता की पहचान करने हेतु कुछ विशेषताएँ निम्नवत् हैं।

  •  अव्यवस्था को स्वीकारना
  • जोखिम उठाना
  • दृढ़ भावात्मकता
  • अन्यों के प्रति जागरुकता
  • अव्यवस्था की ओर आकर्षण
  • कठिन कार्यों को करना
  • रचनात्मक आलोचना
  • साहसिक

सृजनात्मकता के सिद्धान्त (Creative principles)

सृजनात्मकता के सिद्धान्त इस प्रकार हैं

मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त (Psychoanalytic theory)

इस सिद्धान्त का आधार फ्रायड एवं जुंग की धारणाएँ हैं। रुचि के सशक्त विचलन, प्रतिस्थापन तथा उत्तेजनात्मक उपादान व्यक्ति को नवीन कार्य के लिए प्रेरणा देते हैं। पूर्व चेतना के विकास पर ही सृजनात्मकता निर्भर करती है।

सम्बद्धता का सिद्धान्त (Theory of affiliation)

पुराने विचारों से नए विचारों का निर्माण होता है। अत: अधिक सम्बद्धता, अधिक विचारों और अधिक सजनात्मकता का उदय होता है। सृजनात्मक व्यक्ति नई सम्बद्धता बनाता है अथवा पुरानी को मान्यता प्रदान करता है।

गेस्टाल्ट का सिद्धान्त (Gestalt’s theory)

सृजनात्मकता प्रतिरूपों अथवा गेस्टाल्टों की पुनर्संरचना मात्र है। सृजनात्मक चिन्तन समस्यात्मक स्थिति से आरम्भ होता है। सृजनात्मकता में केन्द्रीय बिन्दु का परिवर्तन, अर्थ का परिवर्तन और अनूठी व्यवस्था निहित है। इसमें अन्तर्दृष्टि शामिल है जोकि नए विचारों के एकदम उत्पन्न होने का कारण है।

अस्तित्ववादियों का सिद्धान्त (Survival theory)

अस्तित्ववादियों ने गेस्टाल्ट सिद्धान्त के समान ही सिद्धान्त प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार सृजनात्मकता में नवीन पदार्थों का प्रत्यक्ष ज्ञान शामिल है तथा समझ के लिए संघर्ष।

सृजनात्मकता अन्तर्ज्ञान के रूप में (Creatively as intuition)

सृजनात्मकता अत्यधिक उन्नत अन्तर्ज्ञान का रूप है। कांट ने कहा है कि सृजनात्मकता प्राकृतिक है इसलिए इसे सिखाया नहीं जा सकता। सृजनात्मकता बुद्धि से अधिक विकसित की जा सकती है।

दैविक प्रेरणा का सिद्धान्त (Doctrine of divine inspiration)

प्लेटो के अनुसार एक सृजनात्मक लेखक स्वयं के नियन्त्रण में नहीं होता, किन्तु श्रेष्ठ शक्ति का एजेन्ट बन जाता है। अधिकांश कलाकारों को इस प्रकार की भावनाओं का अनुभव हो चुका है जिसमें वे अनुभव करते हैं कि किसी उच्चतर शक्ति के हाथों की कठपुतली हैं जोकि उनमें से सर्वश्रेष्ठता को निचोड़ रही है। आत्मनिष्ठ अनुभव होने के कारण यह वैज्ञानिक विश्लेषण की परिधि में नहीं आता।

सृजनात्मकता पागलपन के रूप में (Creatively as crazy)

नीत्शे के अनुसार सृजनात्मकता पागलपन के समान है। लॉम्ब्रासो ने ऐसे अनेक सृजनात्मक व्यक्तियों के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं जोकि पागल अथवा उन्मादी थे, किन्तु दोनों में कोई सम्बन्ध दिखाई नहीं देता। यह अलग बात है कि एक सृजनात्मक व्यक्ति पागल दिखाई देता है, किन्तु वह होता नहीं। वास्तव में सामान्य व्यक्तियों को सृजनात्मक व्यवहार पागलपन जैसा दिखाई दे सकता है।

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