आनुवंशिकता एवं वातावरण का शैक्षिक महत्त्व

Heredity and educational importance of the environment

आनुवंशिकता एवं वातावरण का शैक्षिक महत्त्व के सन्दर्भ में यह कहा जाता है कि ये दोनों आपस में इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि इन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता तथा इनके बिना बालकों के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती, ये बाल विकास को गहरे स्तर पर प्रभावित करते हैं।

आनुवंशिकता एवं वातावरण के शैक्षिक महत्त्व को इस प्रकार समझा जा सकता है।

  • विकास की वर्तमान विचारधारा में प्रकृति और पालन-पोषण दोनों को महत्त्व दिया गया है। आनुवंशिकता की भूमिका को समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है और इससे भी अधिक लाभकारी है कि हम समझें कि परिवेश में कैसे सुधार किया जा सकता है? ताकि बच्चे की आनुवंशिकता द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर सर्वोत्तम सम्भावित विकास के लिए सहायता की जा सके।
  • वस्तुत: बालक के सम्पूर्ण व्यवहार की सृष्टि, वंशानुक्रम और वातावरण की अन्तःक्रिया द्वारा होती है। शिक्षा की किसी भी योजना में वंशानुक्रम और वातावरण को एक-दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता है।
  • शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक, सभी प्रकार के विकासों पर आनुवंशिकता एवं वातावरण का प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बालक की शिक्षा भी इससे प्रभावित होती है। अत: बच्चे के बारे में इस प्रकार की जानकारियाँ उसकी समस्याओं के समाधान में शिक्षक की सहायता करती हैं।
  • वंशानुक्रम से व्यक्ति शरीर का आकार-प्रकार प्राप्त करता है। वातावरण शरीर को पुष्ट करता है। यदि परिवार में पौष्टिक भोजन बच्चे को दिया जाता है, तो उसकी माँसपेशियाँ, हड्डियाँ तथा अन्य प्रकार की शारीरिक क्षमताएँ बढ़ती हैं। बौद्धिक क्षमता के लिए सामान्यत: वंशानुक्रम ही जिम्मेदार होता है। इसलिए बालक को समझने के लिए इन दोनों कारकों को समझना आवश्यक है।
  • बालक की रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ तथा अभिवृत्ति आदि के विकास के लिए भी वातावरण अधिक जिम्मेदार होता है, लेकिन वातावरण के साथ यदि वंशानुक्रम भी ठीक है, तो इसको सार्थक दिशा मिल जाती है। उदाहरण के लिए एक व्यवसायी के बच्चे के जीवन में व्यावसायिक अभिरुचि एवं क्षमता पाई जाती है। यदि उसे व्यवसाय का परिवेश प्राप्त हो, तो उस दिशा में सफलता मिल सकती है।
  • आनुवंशिकी एवं वातावरण के बालक के विकास पर पड़ने वाले प्रभावों के ज्ञान के अनुरूप शिक्षक विद्यालय के वातावरण को बच्चों के लिए उपयुक्त बनाता है, जिससे छात्रों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन किया जा सके एवं शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके।

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