आजाद हिन्द फौज में हरियाणा का योगदान

हरियाणा की जनता स्वभाव से ही पराक्रमी रही है। सिंगापुर में हजारों भारतीय सैनिक अंग्रेजों की फौज में लड़ रहे थे। फरवरी, 1942 में जापानियों ने सिंगापुर में अंग्रेजों को धूल चटा दी। 17 फरवरी, 1942 को अंग्रेजों की ओर से ले. कर्नल हंट ने जापानी अफसर मेजर फ्यूजीवारा को 42,000 सैनिक युद्धबंदियों के रूप में सौंप दिए। मेजर फ्यूजीवारा ने भारतीय सैनिकों को अपना एशियाई भाई बताते हुए उन्हें अपनी आजादी के लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया। मेजर फ्यूजीवारा ने इन सैनिकों को भारतीय सेना के कप्तान मोहन सिंह को सौंप दिया और आजाद हिंद फौज बनाने में उनकी मदद की। थोड़े ही समय में बहुत से जवान और अफसर आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। 1943 ई. में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस दक्षिण-पूर्वी एशिया पहुँचे और 15 जुलाई, 1943 को नेताजी ने आजाद हिन्द फौज के गठन की वैश्विक घोषणा कर दी। इस क्रांतिकारी सेना की कमान 25 अगस्त, 1943 को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने अपने हाथों में ले ली।

आजाद हिन्द फौज में हरियाणा के लगभग 2,715 सैनिक शामिल थे जिनमें 398 अफसर और 2317 जवान थे। तत्कालीन रोहतक जिले (रोहतक, सोनीपत तथा झज्जर) से सर्वाधिक 149 अफसर तथा 724 सैनिकों सहित 873 योद्धा इस सेना में शामिल हुए। गुड़गाँव जिले से (गुड़गाँव, फरीदाबाद, पलवल, मेवात, रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़) 106 अफसर तथा 580 जवानों सहित कुल 686 सैनिक इस मुक्ति सेना का हिस्सा बने। इन वीरों ने ‘मित्र राष्ट्रों’ की सेनाओं से जमकर लोहा लिया। जनवरी 1944 में आजाद हिन्द फौज की सुभाष ब्रिगेड को जनरल शाहनवाज खां के नेतृतव में अंग्रेजों से सशस्त्र युद्ध करने का अवसर प्राप्त हुआ। इस बिग्रेड की दूसरी बटालियन (कुल 3 बटालियन) का नेतृत्व झज्जर जिले में जन्मे ले. कर्नल रणसिंह ने किया। इस ब्रिगेड की प्रथम बटालियन में भी हरियाणा से मेजर सूरजमल ने कलादान घाटी से अंग्रेजों को खदेड़ा। इस बटालियन ने मोदोक पर अधिकार कर लिया।

आजाद हिन्द फौज द्वारा मई 1944 में मुक्त कराया गया मोदोक का क्षेत्र भारत का प्रथम क्षेत्र था जो इस मुक्ति सेना द्वारा छड़वाया गया था। मेजर सूरजमल ने सितंबर 1944 तक मोदोक में अंग्रेजों को फटकने नहीं दिया। इससे प्रसन्न होकर नेताजी सुभाष ने मेजर सूरजमल को ‘सरदार-ए-जंग’ के तमगे से सम्मानित किया। इनके अलावा गुप्तचर विभाग के इंचार्ज रहे हरियाणा निवासी कर्नल रामस्वरूप को भी ‘सरदार-ए-जंग’ के तमगे से सम्मानित किया गया था। तीसरी बटालियन की प्रथम कंपनी के कप्तान कंवल सिंह ने लेगी के युद्ध में तथा मेजर चन्द्रभान यादव ने पागन के युद्ध में अपने जौहर दिखाए। ले. कर्नल दिलसुख मान ने डिप्टी क्वार्टर मास्टर के रूप में अपनी सेवाएँ दी तथा नायक मौलड़सिंह ने मातृभूमि को मुक्त कराने के इस यज्ञ में अपनी शहादत दी।

नेताजी ने इस वीर नायक को ‘शहीद-ए-भारत’ के तमगे से विभूषित किया। कप्तान हरीराम को उनकी असाधारण वीरता के लिए ‘नेताजी’ ने ‘तमगा-ए-बहादुरी’ से सम्मानित किया था। आजाद हिन्द फौज की ओर से लड़ते हुए इस पवित्र युद्ध में हरियाणा के कुल 22 वीर अफसर तथा 324 बहादुर जवान वीरगति को प्राप्त हुए।
शेष बचे हुए सैनिकों पर अंग्रेजी सरकार ने मकददमे कर लाकर कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही की तैयारी कर रखी थी। परन्तु, व्यापक जन-विरोध के कारण इनको मुक्त करना पड़ा। .

आजादी और विभाजन साथ-साथ

1946 में चुनाव हुए। प्रदेश में कांग्रेस की लोकप्रियता काफी बढ़ चुकी थी। यनियनिस के सबसे कददावर नेता चौ. छोटूराम अब नहीं रहे थे। मुख्य मुकाबला कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच था। हरियाणा के हर कांग्रेस को 18, यूनियनिस्ट पार्टी को 7 तथा मुस्लिम लीग को 1 स्थान मिला। परन्तु, पूरे पंजाब में मुस्लिम लीग सबसे बड़ा बना। कांग्रेस ने यूनियनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई। राजनैतिक असुरक्षा की भावना से ग्रसित मुस्लिम लीग ने पाकिस की मांग और तेज कर दी। पंजाब में सांप्रदायिक दंगे फूट पड़े। पूरा पंजाब लहू-लुहान था। दोनों संप्रदायों के हजारों लोग मारे गा मेवात में स्थिति और भी खराब थी। इन्हीं हालातों के बीच 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ। गाँधी जी ने दिसंबर 1947 में मेवात का दौरा किया। नूंह जिले के घासेड़ा गाँव में 19 दिसंबर, 1947 को गाँधीजी ने जनसभा की तथा मेवात के मेवों को सुरक्षा का आश्वासन दिया। इसके पश्चात् मेव पाकिस्तान पलायन से रुक गए। यही कारण है कि मेवात के घासेड़ा गांव को ‘गांधी ग्राम’ भी कहा जाता है।r

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