हरियाणा का इतिहास एवं गठन

1 नवंबर 1966 को अस्तित्व में आया हरियाणा प्रदेश इससे पूर्व पंजाब राज्य का एक भाग था। प्राचीन काल से ही भारत की सभ्यता में इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार हरियाणा को हिन्दू सभ्यता का उदभव स्थल माना जा सकता है क्योंकि यहाँ आर्यों का प्रथम स्तोत्र गाया गया था। मनु के अनसार इस प्रदेश का अस्तित्व देवताओं से हुआ था. इसलिए इसे ‘ब्रह्मवत’ नाम दिया गया था।
हरियाणा के विषय में वैदिक साहित्य में अनेक उल्लेख मिलते हैं। शास्त्र वेत्ताओं, पराण-रचयिताओं एवं विचारकों ने लंबे समय तक इस ‘ब्रह्मर्षि प्रदेश’ की मनोरम गोद में बैठ कर अनेकों धर्म-ग्रन्थों की रचना की और धर्म का प्रसार किया। यह भी मान्यता है कि मानव जाति का उत्पत्ति जिन वैवस्तु मन से हई. वे इसी प्रदेश के राजा थे। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार आद्यैतिहासिक कालीन-प्राग्डप्पा, हडप्पा, परवती हडप्पा आदि अनेक संस्कृतियों के अस्तित्व के प्रमाण हरियाणा के बनावली, सीसवाल, कुणाल, मिर्जापुर, दौलतपुर और भगवानपुरा आदि स्थानों के उत्खननों से प्राप्त हुए हैं। सर्वप्रथम हरियाणा शब्द का प्रयोग दुनिया के अति प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में ‘रज हरयाणे’ के रूप में हुआ है।

हरियाणा प्रदेश का नामकरण

हरियाणा शब्द मूलत: एक बौद्धिक शब्द ‘हरयाणा’ से बना है जिसका अर्थ है ‘हरि’ (हिन्दू देव विष्णु) आयन (घर) अर्थात् परमात्मा का निवास स्थल। कुछ विद्वान ‘हरि’ अर्थात् भगवान कृष्ण से इसका संबंध जोड़ते हैं तो कोई ‘हर’ अर्थात् ‘भगवान शंकर’ का क्षेत्र मानते हैं। कुछ इतिहासकार ‘हरियाणा’ शब्द को आर्यों का आगमन स्थल होने के कारण ‘आर्याना’ का बिगड़ा हुआ रूप ‘हरियाणा’ मानते हैं।
अलग-अलग काल में विभिन्न विद्वानों ने प्रदेश को अलग-अलग नाम से संबोधित किया है। यदुनाथ सरकार मानते हैं कि 9वीं सदी में प्रदेश की हरियाली के कारण इसे ‘हरियाल’ कहा जाता था।
बाणभट्ट ने हर्ष चरित में हरियाणा को श्रीकण्ठ जनपद के नाम से संबोधित किया है। पुष्पदंत रचित ‘महापुराण’ में प्रदेश की पहचान हरियाणा के रूप के रूप में की गई है, वहीं महाभारत काल में राजा कुरु के नाम पर इसे ‘कुरुक्षेत्र’ के नाम से जाना जाता था।

हरियाणा का प्राचीन नाम क्या है?

राहुल सांस्कृत्यायन – हरिधानक्या
डा० बुद्ध प्रकाश – अभिरयाणा
डा० एच०आर०गुप्ता – आर्यना
यदुनाथ सरकार – हरियाल
ऋग्वेद में उल्लिखित नाम – रज हरयाणे

 

विभिन्न काल खण्ड में हरियाणा प्रदेश

आदिकाल

हरियाणा राज्य में लगभग 1.5 लाख वर्ष पूर्व भी मानव जीवन के अस्तित्व के प्रमाण मिले हैं। चण्डीगढ के निकट पिंजौर से प्राप्त एक मानव खोपड़ी के अध्ययन के बाद प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा० गाई पिलग्रिम इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि लगभग 1.5 लाख वर्ष पर्व इस क्षेत्र में आदि मानव का अस्तित्व था। धामली, पिंजौर के क्षेत्र, सुकेत्तड़ी, पपलीना (कालका), कोटला. झिरका आदि क्षेत्रों से परापाषाण कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं। ये उपकरण छोटे, गोल व चपटे पत्थर के रूप में हैं। इन उपकरणों का प्रयोग आदिकाल में इंसान द्वारा शिकार के लिए किया जाता था। हिसार के सीसवाल, भिवानी के मिताथल, हाँसी के राखीगढी फतेहाबाद वाली अदि स्थानों से फावड़ा, मूसल, खरल तथा तेज धार वाली दराँती आदि के पाषाण कालीन अवशेष मिले हैं।

हिसार के सीसवाल क्षेत्र से काफी मात्रा में उत्तर-पाषाण यग-कालीन चाक पर बने मिट्टी के लाल रंग के बर्तन, सलेटी रंग के बर्तन, मनके, मिटटी की चूड़ियाँ तथा कृषि के यंत्र प्राप्त हुए हैं जिनसे सिद्ध होता है कि उत्तर-पाषाण काल में इस क्षेत्री जिनसे सिद्ध होता है की उत्तर पाषाण कल में इस क्षेत्र में कृषि कार्य आरम्भ हो चूका था|

मध्यपाषाण युग

(लगभग 10 हजार ई०प०) तक आते-आते जलवायु में काफी पर्वतो से बर्फ पिघल गई। नदियों में भरपुर जल आ गया था। जगह-जगह जंगल अस्तित्व में आये|
मध्यपाषाण युग के लगभग छ:-सात हजार वर्ष बाद नवपाषाण युग आया। समय के साथ अर्जित ज्ञान से मानव ने उन्नति की। इस काल में बलुआ पत्थर, क्वार्ट्ज आदि के प्रयोग से घिस कर बड़े उत्तम किस्म के औजार बनाए जाने लगे। नवपाषाण युग तक आते-आते हमारे पूर्वज शिकारी से खाद्य-संग्राहक तथा कृषक बन गए। कृषक बनने पर उन्हें कृषि के लिए पहाड़ों से उतर कर मैदानी क्षेत्रों में आना पड़ा। अरावली क्षेत्र से अनेकों कबीलों के इस क्षेत्र में आने के संकेत मिलते हैं। खाद्य-संग्राहक से कृषक बनने पर मानव की आवासीय स्थिति में भी परिवर्तन आया। फसल बिजाई के बाद उन्हें काफी समय तक एक जगह पर रहना पड़ा। फलस्वरूप, स्थायी झोपड़ी के एक साथ बनने पर गाँव बस गए। यह हमारी संस्कृति का पहला बड़ा पड़ाव था। चूंकि इस संस्कृति का पता हमें सर्वप्रथम हिसार जिले के एक छोटे से गाँव सीसवाल से पुरातात्त्विक खुदाई से चला, इसलिए इतिहासकार इसे ‘सीसवाल संस्कृति’ भी कहते हैं। सीसवाल, मिताथल, बनावली, बालु, फरमाणा, गिरावड़, भिरड़ाना, कुणाल आदि स्थानों से सीमित खुदाई के पश्चात् सीसवाल संस्कृति के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
सीसवाल संस्कति एक कृषि प्रधान संस्कृति थी। कृषि आरंभ हो जाने के पश्चात् अनेकों नए औजारों का भी अविष्कार हुआ। फावड़ा, सिलबटा, ऊखल-मूसल, खरल आदि का धीरे-धीरे विकास हुआ। पशुओं को विधिवत् पालना भी नवपाषाण काल में आरंभ हो गया था। चूल्हे, तंदूर आदि से आग जलाकर लोग खाना पकाने लग गए थे।

ग्राम्य जीवन

उत्खननों से पता चलता है कि इस समय के लोग झोपडियों या कच्ची ईंटों से बने घरों में रहते थे। कई जगह 2-3 मीटर चौड़े गड्ढे मिले हैं। कछ इतिहासकारों का मत है कि ये आवासीय गड्ढे थे जिनमें लोग रहते थे। इनके अन्दर की दीवारें खूब लिपी-पुती हैं। कुछ गड्ढों के ऊपर खंभे गाड़े जाने के भी संकेत हैं। इनका प्रयोग संभवतः गड्ढों को घास-फूस से ढकने के लिए किया जाताना नवपाषाण काल तक आते-आते कई प्रकार के मिट्टी के बर्तन इनमें मिट्टी के बड़े-बड़े भांड, अनाज रखने के छोटे-बड़े बर्तन प र मटके, पानी पीने के लिए प्रयुक्त कुल्हड़ियाँ, अनाज को पकाने के लिा की कुंडियाँ और हंडियाँ, लोटे आदि प्रमुख हैं। बर्तन पहले हाथ में इन्हें चाक पर बनाया जाने लगा। ये खुले आवे में पकाए जा पर खब रंगाई-पुताई होती थी। गिरोह तथा अन्य कई सामान आरंभ होने के संकेत मिलते हैं। लेकिन विवाह भी में इस काल में किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं मिल पूर्वज किस जाति (नस्ल) से संबंध रखते थे। इस बारे में भी को नहीं मिल पाई है।

दरियाणा का आधतिहासिक सस्कृति (सीसवाल संस्कति) के कछ प्रमख केन्द्र और उनका महत्व
स्थल का नाम ऐतिहासिक महत्व

सीसवाल (जिला-हिसार)
• जिला मुख्यालय से लगभग 26 कि.मी.

यह आद्यैतिहासिक गाँव हिसार से 26 कि०मी० दूर चौतंग नदी के किनारे स्थित है। सीसवाल | सभ्यता के अवशेष सबसे पहले इसी गाँव से प्राप्त हए थे। सीसवाल की थेह (टीला) से
निम्नलिखित अवशेष प्राप्त हुए हैं1. हाथ से बने मृदभाण्ड 2. कुछ मृदभाण्ड जो धीमी गति से चलने वाले चाक से बने हुए हैं। 3. नवपाषाण कालीन चाक से बने चित्रित मृदभाण्ड 4. मिट्टी की बनी चित्रित चूड़ियाँ, मनके आदि।
5. ताँबे के हत्थे वाला गंडासा तथा कुछ पत्थर के उपकरण।

2. मिताथल (जिला-भिवानी)
• जिला मुख्यालय से 10 कि०मी० दूर

1. यह थेह दो भागों में बँटा है जिसकी ऊँचाई 4-5 मी० के करीब है।
2. उत्खनन के दौरान धूप में सुखाई हुई कच्ची ईंटों के बने मकान मिले हैं। इन मकानों की
छत छप्परनुमा होती थी। 3. बस्तियाँ हड़प्पा कालीन शहर कालीबंगा की तर्ज पर बसी थी। 4. यहाँ से चाक पर बने और आवा में पके मृदभाण्ड मिले हैं। 5. मृदभाण्ड के अतिरिक्त मिट्टी की बनी चूड़ियाँ, फियाल की हरी चूड़ियाँ, पत्थर की गेंद
– पत्थर का मैलखोरा, ताँबे की चूड़ियाँ और हाथी दांत की पिन आदि संसाधन मिले हैं।

3. बनावली (जिला-फतेहाबाद)
• जिला मुख्यालय से लगभग-14 कि०मी०

बनावली गाँव के निकट दो टीलों का एक उजड़ा थेह है। इस थेह की विधिवत् खुदाई 1974 से प्रारंभ होकर बाद में कई चरणों में हुई। खुदाई के दौरान पुरातत्त्व की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण
वस्तुएँ मिली हैं जैसे1. बस्ती की सुरक्षा दीवार का कुछ भाग। 2. कच्ची ईंटों से बने सीधी कतारों में खड़े घर। 3. गोल आकार का चूल्हा और एक भट्टी। 4. कहीं-कहीं आकार में 1:2:3 अनुपात की पक्की ईंटें भी मिली हैं। 5. मृदभाण्ड, दुर्लभ पत्थरों के जेवर, रसोई में काम आने वाले बर्तन, कुण्डे आदि खनन के
दौरान मिले हैं।
6. मृदभाण्ड के अलावा बच्चों के खिलौने (छतरीदार गाड़ी) भी इस थेह से प्राप्त हुए हैं।

4. बालू (जिला-कैथल)
• जिला मुख्यालय से लगभग 20 कि०मी०

बालू गाँव के बाहर स्थित टीले की विधिवत् खुदाई 1979 ई० में प्रारंभ हुई। यह खुदाई 15 | सत्रों तक चली। खुदाई के दौरान यहाँ से तीन अलग-अलग काल से संबंधित अवशेष मिले हैं।
प्रथम काल के अवशेष सीसवाल संस्कृति से संबद्ध हैं। इन अवशेष में प्रमुख हैं1. कच्ची ईंटों के मकान के अवशेष। 2. लाल, पांडु और स्लेटी रंग के चाक से बने मृदभाण्ड। 3. मृदभाण्ड के अतिरिक्त यहाँ से मिट्टी के बने मनके, चूड़ियाँ, गेंद तथा दुर्लभ पत्थर के
कुछ मनके भी मिले हैं। उत्खनन के दौरान जो अवशेष यहाँ से मिले हैं उनमें रिहायसी मकानों के अवशेष मुख्य हैं। मकान कच्ची ईंटों के बने होते थे जिनका आकार 1:2:4 होता था। यहाँ से कच्ची ईंटों से बने एक परकोटे के अवशेष भी मिले हैं। बालू की थेह से लाल व स्लेटी रंग के मृदभाण्ड मिले हैं। रसोई के बर्तनों के अलावा मिट्टी की बनी पशुओं की मूर्तियाँ, चूड़ियाँ, खिलौना-गाड़ियाँ, पहिए, गेंद, हड्डी के सूए, सिलबट्टे, फियांस
की चूड़ियाँ, दूर्लभ पत्थर के मनके तथा कुछ तांबें के उपकरण आदि भी यहाँ से मिले हैं।

5. फरमाणा (जिला-रोहतक)
• महम से 13 कि०मी० दूर

फरमाणा गाँव के निकट एक पुराने खेड़े की खुदाई वर्ष 2007-2009 के दौरान की गई। यह
स्थान सीसवाल संस्कृति के प्रारंभिक चरण से संबद्ध है। यहाँ 2-3 मीटर के कुछ गड्ढ़े मिले | हैं जिनकी अन्दर की दीवारें उचित प्रकार से लिपी-पुती हैं। कई गड्ढों में चूल्हें भी बने हैं। इन गड्ढों का प्रयोग संभवत: रसोई के रूप में होता था।

6. गिरावड़ (जिला-रोहतक)
ऐतिहासिक महत्व 2007 ई० में यहाँ से विधिवत् उत्खनन के दौरान महत्वपूर्ण पुरातात्विक जानकारी प्राप्त हुई है। सीमित उत्खनन के दौरान 13 गड्ढ़े, 2 भट्ठियाँ और काफी मात्रा में मृदभाण्ड प्राप्त हए हैं। यहाँ से मृदभाण्ड पकाने की दो भट्ठियाँ भी मिली हैं।
7. भिरड़ाना. (जिला-फतेहाबाद)

 

गाँव के बाहर सीसवाल संस्कृतिकालीन ऊँचे टीले की खुदाई 2003-2005 के दौरान की गही फरमाणा और गिरावड़ की तरह यहाँ भी अन्दर से लिपाई किए हुए गड्ढे मिले हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ लाल व स्लेटी रंग के मृदभाण्ड भी मिले हैं।
8. कुणाल (जिला-फतेहाबाद)

यहाँ से भी खुदाई के दौरान सीसवाल संस्कृति से संबंधित अवशेष मिले हैं। कुणाल गाँव के | निकट थेह से छोटे-बड़े अनेक गड्ढे और मृदभाण्ड मिले हैं।

हड़प्पा संस्कृति का स्वरूप एवं विशेषताएँ

इतिहासकार के०सी० यादव के अनुसार हड़प्पन लोग नस्ल से द्रविड़ थे। ये लोग कृषि, उद्योग, व्यापार, कारीगरी, पशु-पालन आदि व्यवसायों से जुड़े थे। हड़प्पाकालीन नगर व्यवस्था पूरी तरह से नियोजित थी। नगर पूरी तरह शतरंज की बिसात के नमूनों के आधार पर बसे थे। प्रत्येक नगर के चारों तरफ सुरक्षा के लिए चारदीवारी बनी होती थी। नगरों में समकोण पर काटती हुई सड़कें होती थी तथा जल निकासी के लिए पक्की नालियाँ बनी होती थी। – मकान सुन्दर होते थे तथा कभी-कभी ऊँचे चबूतरों पर भी बनाए जाते थे। हड़प्पा कालीन शहरों में घर प्रायः कच्ची ईंटों से बने होते थे तथा अन्दर से अच्छी तरह से लिपे-पुते होते थे। ईंटों का आकार 1:2:4 के अनुपात में होता था।
इन लोगों का भोजन काफी सादा था। बनावली से जौ का काफी बड़ा ढेर मिला है। यहाँ के घरों से मछलियों आदि की हड्डियों के अवशेष भी मिले हैं जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कुछ लोग मांसाहारी भी हो सकते हैं। हड़प्पा काल में स्त्री और पुरुष दोनों जेवरों का प्रयोग करते थे। जेवर सोने, तांबे, हाथी दांत, कीमती पत्थर, स्फटिक तथा नीलोत्पल आदि के बने होते थे।

हरियाणा में हड़प्पा संस्कृति

पुरातत्त्वेताओं ने इस संस्कृति को विकासक्रम में तीन चरणों में रखा है-प्रारंभिक, उन्नत और अवनत। प्रारंभिक चरण की 241 बस्तियाँ, दूसरे चरण की 145 और तीसरे चरण की 842 बस्तियाँ मिली हैं। इस संस्कृति के प्रतिनिधि सिंध प्रांत तथा पंजाब से उखड़ कर आए और यहाँ बस गए। इनमें से कई बस्तियों की विधिवत खुदाई भी हो चुकी है। हरियाणा में स्थित कुछ महत्वपूर्ण हड़प्पाकालीन पुरास्थलों का विवरण यहाँ दिया जा रहा है।

हड़प्पाकालीन स्थल महत्व

मित्ताथल (जिला-भिवानी)

मिताथल के सैन्धव कालीन टीले की खुदाई से हड़प्पा कालीन भवन निर्माण पद्धति, मृदभाण्ड बनाने के
तौर-तरीके और लोगों द्वारा प्रयोग होने वाली वस्तुओं, आभूषण, बच्चों के खिलौने आदि के विषय में | महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। इस पुरास्थल से वर्ष 1915-1916 में गुप्त तथा कुशाण कालीन सोने के सिक्के प्राप्त हुए थे। टीले के दोनों भागों में काफी संख्या में मकानों के अवशेष मिले हैं। मकान कतारबद्ध ढंग से बने हुए थे तथा नगर चौपड़ की बिसात के नमूने के आधार पर योजनाबद्ध तरीके से बसे हुए थे। यहाँ से दुर्लभ पत्थर, फियांस, स्टेटाइट तथा मिट्टी के बने मनके मिले हैं। मित्ताथल से मिट्टी, फियांस तथा ताँबे की बनी चूड़ियाँ, ताँबे का हार्पून (भाला) तथा हाथी दाँत की पिन भी मिली है।

 

2. बनावली (जिला-फरीदाबाद)

बनावली के टीले पर उत्खनन सर्वप्रथम 1974 में आरंभ हुआ था। नगर शतरंज की बिसात के नमूने पर बड़े सुनियोजित तरीके से बसा हुआ था। शहर का पश्चिमी भाग बड़ा और महत्वपूर्ण था परन्तु, पूर्वी भाग साधारण था और यहाँ सामान्यजन रहते होंगे। नगर में काफी सड़कें होने के साक्ष्य मिले हैं। ईंटों की बनावट 1:2:3 के अनुपात में होती थी। यहाँ से अनेकों घर-गृहस्थी की वस्तुएँ; जैसे- चूल्हे, तंदूर, तथा मृदभांड आदि प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त दुर्लभ पत्थरों से बने आभूषण, चूड़ी, मनके, तुलाई के बाट-बट्टे आदि भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं। बनावली से सोने-चाँदी के टुकड़े भी प्राप्त हुए हैं। जिनसे प्रमाणित होता है कि इन लोगों को धातुओं के बारे में भी ज्ञान था। कुछ मुद्रांक भी मिले हैं जिन पर जंगली बकरी, दरियाई घोड़े तथा अन्य कई प्रकार के पशुओं के चित्र उकेरे गये हैं। यहाँ एक घर से | अधजले जौ के अवशेष भी मिले हैं।न से लाल रंग से बने और काले रंग से चित्रित मृदभाण्ड प्राप्त हुए हैं।

 

3. राखीगढ़ी (जिला-हिसार)

सखागढ़ी गाँव नारनौंद उपमंडल मुख्यालय से लगभग 5 कि०मी० की दूरी पर स्थित है। राखीगढ़ी के टाल क उत्खनन से यह बात सिद्ध होती है कि यह गाँव किसी समय हड़प्पा संस्कृति का प्रसिद्ध केंन्द्र रहा होगा। हड़प्पा और मोहनजोदडो शहरों के पाकिस्तान में स्थित होने के कारण भारत में यह सबस बड़ा हड़प्पा कालीन स्थल है। अन्य हड़प्पा कालीन नगरों की तरह यह शहर भी दो भागों में विभक्त था। नगर के चारों तरफ सुरक्षा के लिए परकोटा बना होने के संकेत मिले हैं। राखीगढ़ी से भी
अन्य नगरों जैसी हडप्पा कालीन सामग्री प्राप्त हुई है।

4. फरमाणा (जिला-रोहतक)

वर्ष 2007-2009 के दौरान हई खदाई से प्राप्त अवशेष के आधार पर फरमाणा को दो संस्कृतियों-सीसवाल संस्कृति और हड़प्पा संस्कृति से संबंधित माना गया है। हड़प्पा कालीन मृदभाण्ड तथा अन्य छोटी-छोटी वस्तुओं के अलावा हडप्पन मोहरें भी यहाँ मिली हैं। टाल से कुछ दूरी पर कब्रिस्तान के अवशेष भी मिले हैं। इस कब्रिस्तान से कई नर कंकाल भी मिल चुके हैं। ऊनी तथा सूती दोनों प्रकार के वस्त्रों के अवशेष यहाँ से मिले हैं।

आर्थिक स्थिति

हड़प्पा काल में व्यापारी और कषक दोनों ही वर्ग मिलते थे। यहाँ की प्रमुख उपज जौ थी। गेहूँ, चावल तथा अन्य कई प्रकार के अन्न भी उगाए जाते थे। कषि के साथ-साथ पशपालन भी होता था। सांड, गाय, भैंस, बकरी, गधे आदि भी पाले जाते थे। हड़प्पा काल के लोगों की लिपि चित्रलिपि थी। जिसे विद्वान आज तक पढ़ नहीं पाए हैं। हड़प्पा काल म कई प्रकार की धार्मिक मान्यताओं का प्रारंभ भी हो चका था। पीपल आदि वक्ष और कई प्रकार के पशु भी उनके लिए पूज्य था बनावली से प्राप्त एक मुद्रांक पर एक विचित्र पश का चित्र अंकित है-इसका धड शेर का तथा सींग बैल के हैं। यह विचित्र जानवर भी पूज्य रहा होगा।

आर्यों का आगमन एवं वैदिक संस्कृति

वैदिक संस्कृति के विकास के क्रम के बारे में जानने से पहले आर्यों के विषय में जान लना आवश्यक है। इस विषय पर अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग धारणा व्यक्त की है। कोई ब्रह्मर्षि प्रदेश, कोई सप्तसिंधु प्रदेश को तो कोई मध्य प्रदेश को इनका उद्गम स्थल मानता है। कुछ विद्वान इन्हें विभिन्न स्थानों जैसे- यूरोप, दक्षिणी रूस आदि से आया हुआ मानते हैं तो कुछ इनका संबंध मध्य एशिया से जोड़ते हैं। इतिहासकार जयचन्द्र विद्यांलकार का मत सर्वाधिक तर्कसंगत माना जा सकता है कि भारतीय आर्यों की अनुश्रुति में उनके उत्तर-पश्चिम से आने की बात कहीं नहीं है। उनकी अनुश्रुति में ऐसी चर्चा है कि आर्य सरस्वती नदी के कांठे से देश के अन्य भागों की तरह उत्तर-पश्चिम भारत में भी फैल गए। साथ ही, कैलाश-मानसरोवर प्रदेश और मध्य हिमालय के स्थानों की चर्चा उनकी प्राचीनतम अनुश्रुति में है। परन्तु, उत्तर भारत में बसने के बाद आर्यों के इन प्रदेशों की ओर फैलने का कोई उल्लेख नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि आर्यों की एक शाखा पूर्वी-मध्य एशिया अर्थात् तूरीन नदी के कांठे से नई चरागाहों की खोज करती पश्चिमी तिब्बत की ओर चढ़ी और उसके दक्षिणी छोर पर पहुँचने के बाद लगभग 3000 ई०पू० हिमालय से नीचे उतरकर गंगा-यमुना-सरस्वती नदियों के काँठों से हरियाणा में आई। अलकनंदा-दून (गढ़वाल) से हिमालय के भीतर-भीतर वह कश्मीर तक फैल गई। इसी अवधारणा को हम सर्वाधिक सटीक मान सकते हैं। परन्तु निश्चय पूर्वक कुछ भी कहना कठिन है।

आर्यों का हरियाणा वास

वैदिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि सदानीरा सरस्वती और दृषाढती नदियों से सिंचित हरियाणा की शस्य-श्यामला भूमि को देख कर आर्य सम्मोहित हो उठे। हरियाणा को देव निर्मित भूमि मानकर उन्होंने अपना प्रथम ठिकाना इसी क्षेत्र को बनाया। इसीलिए डा. एच. आर. गुप्ता जैसे कई इतिहासकार ‘हरियाणा’ शब्द का उद्गम ‘आर्याना’ शब्द से हुआ मानते हैं। पुरातत्वविद् बी०बी० लाल आर्यों को चित्रित धूसर मृदभाण्डीय (PG Wares) संस्कृति से जोड़ते हैं। पुरातात्विक सर्वेक्षणों के माध्यम से हरियाणा में चित्रित धूसर मृदभाण्डीय (PG Wares) संस्कृति से संबंधित लगभग 300 स्थानों का पता चला चुका है जिनमें भगवानपुर, दौलतपुर, सुघ तथा राजा कर्ण का किला (थानेसर) आदि प्रमुख हैं। परातात्त्विक उत्खनन में आर्यों के स्थानीय आदिवासियों के साथ किसी संघर्ष तथा मार-काट की अवधारणा से संबंधित कोई प्रमाण हरियाणा के किसी भी क्षेत्र से नहीं मिले हैं। इसके विपरीत आर्यों व स्थानीय आदिवासियों के सह-अस्तित्व के प्रमाण सीसवाल आदि स्थानों से अवश्य प्राप्त हुए हैं। आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व ये लोग सरस्वती और दृषद्वती नदियों की वादियों में बस गए तथा यहाँ इन्होंने खूब आर्थिक और सामाजिक उन्नति की। आर्य हरियाणा को ‘देवभूमि’ कहते थे।
आर्यों का पहला प्रमख संघर्ष ‘पणियों’ के साथ हुआ। पणियों ने आर्यों की संस्कृति को स्वीकार नहीं किया। पणि स्थानीय आदिवासी थे और संभवतः इनका क्षेत्र ‘पाणिप्रस्थ’ ही आधुनिक पानीपत है।

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