हरियाणा में राजनैतिक चेतना का विकास एवं सामाजिक पुनर्जागरण

1857 की क्रान्ति के बाद की पराधीनता और शोषण ने विभिन्न सामाजिक समूहों को एकत्रित होकर काम करने के लिए विवश किया। हरियाणा में बंगाल जैसे क्षेत्रों से सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक हर क्षेत्र में भिन्नता थी। यहाँ न तो अंग्रेजीदा अभिजात्य वर्ग था और न ही आधनिक पश्चिमी साहित्य। इन परिस्थितियों के बावजूद भी हरियाणा की मिट्टी से एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तथा धार्मिक पुनर्जागरण का भाव उपजा और समय के साथ विस्तार लेता हुआ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का एक मजबूत स्तंभ बन गया। इसमें सबसे बड़ा योगदान आर्यसमाज का था।

हरियाणा में आर्यसमाज की स्थापना एवं विस्तार

वर्तमान में हरियाणा देश के सर्वाधिक विकसित राज्यों में से एक है। प्रदेश के आर्थिक विकास का श्रेय यदि आजादी के बाद की सरकारों के योगदान को जाता है तो प्रदेश के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण का श्रेय आर्य समाज को दिया जा सकता है। आर्य समाज की स्थापना नि:संदेह स्वामी दयानंद जी ने 10 अप्रैल, 1875 को मुंबई में की थी परन्तु, आर्य समाज की सर्वाधिक उपलब्धियाँ हरियाणा में ही हैं। अपने ग्रन्थ ‘आर्याभिविनय’ में स्वामी दयानंद जी ने अपने अनुयायियों से कहा था कि प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है कि अपने देश के उत्थान के लिए और स्वराज्य के लिए प्रतिदिन कार्य करे।

स्वामी दयानन्द जी 17 जुलाई, 1878 को हरियाणा में पहली बार पंजाब से उत्तराखण्ड जाते हुए अंबाला में ठहरे थे। आर्यसमाज की स्थापना के 5 वर्ष उपरान्त 1880 ई. में स्वामी दयानन्द जी पुनः हरियाणा में आए और रेवाड़ी में प्रवास किया। उन्होंने कई दिनों तक ठहरकर रूढ़िवाद तथा अज्ञानता के विरुद्ध प्रचार किया। स्वामी जी ने राव युधिष्ठिर सिंह के सहयोग से 1880 ई. में रेवाड़ी में हरियाणा की पहली आर्यसमाज की शाखा भी स्थापित की। उनके आग्रह पर रेवाड़ी में एक गौशाला भी स्थापित की गई।

तत्पश्चात् चौ मातूराम, चौ. रणपतसिंह, चौ. रामजीलाल हुड्डा और चौ. पीरू सिंह के सहयोग से 1885 ई. में रोहतक में आर्यसमाज की शाखा खुली तथा 1886 ई. में लाला लाजपत राय, लखपत राय, चूडामणि, चन्दूलाल आदि 59 सदस्यों के सहयोग से हिसार में शाखा खुली। 1889 में हांसी में भी शाखा खुल गई। 1890 ई. में बाबू मुरलीधर सहित 14 सदस्यों के सहयोग से अंबाला शहर में आर्यसमाज की शाखा खोली गई। 1890 ई. में ही भिवानी तथा हथीन में भी आर्यसमाज की शाखाएँ खोली गईं।

इनके अलावा हरियाणा में 1890 से 1900 ई. के बीच स्थापित आर्यसमाज की शाखाएँ यहाँ सूचीबद्ध हैं
वर्ष  – शहर

 

हरियाणा में शिक्षा के प्रसार, सामाजिक तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण और रूढ़िवाद के विरुद्ध जागृति लाने में आर्यसमाज का अद्वितीय योगदान है। स्वामी श्रद्धानंद जी के प्रयासों से हरियाणा में आर्यसमाज द्वारा कई गुरूकुल तथा स्कूल खोले गए। 1914 ई. में प्रसिद्ध आर्यसमाजी मातूराम हुड्डा के प्रयासों से रोहतक में जाट ऐंग्लो-संस्कृत उच्च विद्यालय की स्थापना की गई। 1926 में इस विद्यालय का विलय जाट हीरोज मेमोरियल उच्च विद्यालय में हो गया। प्रसिद्ध आर्यसमाजी स्वामी श्रद्धानंद जी द्वारा कुरुक्षेत्र गुरूकुल की नींव रखी गई। खानपुर में भगत फूल सिंह तथा सोनीपत के मटिण्डु में चौ. पीरू सिंह के प्रयासों से गुरूकुल स्थापित हुए।

सनातन धर्म सभा

सनातन धर्म सभा का निर्माण आर्यसमाज के रूढ़िवाद पर हमले के प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था। इस आन्दोलन के नेता पं. दीनदयालु शर्मा व्याख्यान वाचस्पति थे। इनका जन्म 1863 ई. में झज्जर में हुआ था। इन्होंने झज्जर में ‘रिफा-ए-आम’ सोसाइटा बनाई थी। हिन्दू-मुसलमान सभी इस सभा के सदस्य थे। पं. दीनदयालु शर्मा ने 1887 में सनातन धर्म सभा की स्थापना की तथा 1892
ई. तक प्रदेश के सभी बड़े कस्बों में इस सभा की शाखाएँ खोल दीं। सनातन धर्म सभा का प्रदेश के रूढ़िवादी वर्ग में काफी प्रभाव था।

हरियाणा प्रदेश में स्वतंत्रता आन्दोलन का प्रभाव

इन सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के प्रभाव (विशेषकर आर्यसमाज) से प्रदेश में राष्ट्रवाद के बीज अंकरित हुए। दिसंबर 1885 ई. म कारा की स्थापना के साथ ही हरियाणा के रायबहादुर मुरलीधर, लाला लाजपतराय, चौ. मातूराम जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने खुद को इस आद से संबद्ध कर लिया।

रायबहादुर मुरलीधर जी के प्रयासों से 1886 ई. में अंबाला में कांग्रेस की शाखा खली। यह शाखा केवल हरियाणा ही नहीं संभवतः पूरे उत्तर-पश्चिमी भारत में कांग्रेस की प्रथम शाखा थी। इसके अगले वर्ष 1887 ई. में लाला लाजपतराय जी के प्रयासों से हिसार में भी काग्रs—- की शाखा खुल गई। प्रारंभ में कांग्रेस में शामिल होने वाले कार्यकर्ताओं में सबसे ज्यादा लोग आर्यसमाज से जुड़े थे। 12 अक्तूबर, 1888 को हिसार में कांग्रेस की पहली सार्वजनिक आमसभा हुई। इस सार्वजनिक सभा की अध्यक्षता तुर्रेबाज खां ने की थी। प्रदेश में कांग्रेस की गतिविधियों को आगे बढ़ाने तथा संगठन खड़ा करने में लाला लाजपतराय तथा रायबहादुर मुरलीधर ने अपना तन-मन झोंक दिया।

प्रदेश के अन्य राष्ट्रवादी नेताओं में बाबू बालमुकुन्दगुप्त, छबीलदास, शादीलाल, गौरीशंकर, चूडामणी, लाला दुनीचंद आदि प्रमुख थे। लाला लाजपतराय ने 1891 ई. में नागपुर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया तथा लोगों से स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल का आहवान किया। इस मंच से लालाजी ने अग्रेजो का खुलकर ललकारा। 1905 ई. में बंगाल विभाजन के विरुद्ध पूरे देश में गहरी प्रतिक्रिया हुई। रायबहादुर मुरलीधर ने जनता को इस आन्दोलन से जोड़ने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उन्होंने विदेशी माल के बहिष्कार के लिए न केवल लोगों को प्रेरित किया बल्कि इस आन्दोलन का जन-जन तक पहुँचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया। स्वदेशी के प्रचार से कांग्रेस में एक नए उत्साह का संचार हुआ।

अक्तूबर 1907 में अंबाला में पंजाब प्रांतीय कांग्रेस की कांफ्रेंस हई। इसमें पूरे पंजाब से लोग सम्मिलित हए। इस कांफ्रेंस में प्रदेश के प्रत्येक जिल में काग्रेस की शाखाएँ स्थापित करने, जन समस्याओं के लिए संघर्ष करने तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने जैसे महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। इस कांफ्रेंस के प्रस्तावों के अनुरूप फरवरी 1908 तक प्रदेश के सभी जिलों में कांग्रेस की शाखाएं खुल गई।
लाला लाजपतराय की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर वायसराय लार्ड मिण्टो ने उनको देश निकाला देकर माण्डले जेल भेज दिया। सरकार के इस कदम के विरुद्ध पूरे पंजाब में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। जन विरोध के कारण 14 नवंबर, 1907 को सरकार को यह निर्णय वापिस लेना पड़ गया। परन्तु 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस दोफाड हो गई। लालाजी वाले गर्मदल के कांग्रेस से अलग हो जाने के बाद कांग्रेस की गतिविधियाँ पूरे देश में शिथिल पड़ गईं।

हरियाणा प्रदेश में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

20वीं सदी के शुरुआती दशक में कांग्रेस और आर्यसमाज के साथ-साथ कुछ सशस्त्र गतिविधियाँ भी देखने को मिली हैं। कांग्रेस में फूट से राष्ट्रवादी युवाओं को बड़ी निराशा हुई। इनमें से कुछ ने अंग्रेजों से सीधे टकराने का निश्चय किया। हरियाणा में अंबाला में क्रान्तिकारियों का अच्छा प्रभाव था। अंबाला का उपायुक्त सिकेस इन क्रान्तिकारी गतिविधियों पर नियंत्रण हेतु काफी सख्ती से काम ले रहा था। 27 दिसंबर, 1909 को क्रांतिकारियों ने रात को उसके बंगले में बम रख दिया। सिकेस तो बच गया परन्तु, उसका नौकर मारा गया।

इस घटना के कुछ दिन उपरान्त कलकत्ता में 10वीं जाट रेजिमेंट ने बगावत कर दी। इस पलटन में रोहतक तथा हिसार के आर्यसमाजी जाट सैनिक थे। पलटन का सिपाही सुरजन सिंह प्रत्यक्ष रूप से स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा हुआ था। 1908 ई. में बहुत से सैनिकों ने लाला लाजपतराय की सभाओं में भाग लिया। इस पलटन का सूबेदार हरीराम इन आंदोलनकारी सैनिकों का प्रेरणास्रोत था। अलखपुरा (हिसार) के सेठ छाजूराम कलकत्ता के प्रसिद्ध आर्यसमाजी थे।

उन्होंने क्रान्तिकारियों को समझाया कि अलीपुर जेल में बहुत से देशभक्त क्रान्तिकारी कैद हैं। जब वह पलटन तबादला होकर मिदनापुर पहुँची तो इन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध मातृभूमि की सेवा की शपथ ली। इन क्रान्तिकारियों ने 25 दिसंबर, 1909 को भारत के वायसराय तथा अन्य अधिकारियों को बंगाल के गवर्नर के घर पर एक उत्सव में बम से उड़ाने की योजना बनाई। परन्तु, ललित मोहन चक्रवर्ती नामक एक सैनिक द्वारा इस योजना का भेद अंग्रेज अधिकारियों के समक्ष खोल दिए जाने के बाद सूबेदार हरीराम, हवलदार चुनीलाल, नायक जोतराम, सिपाही सरजन समेत इनके सभी साथियों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया।

सरकार ने भविष्य में इस पलटन में हरियाणा के आर्यसमाजी जाटों की भर्ती पर रोक लगा दी। रोहतक तथा हिसार में सेडिसियस मीटिंग एक्ट लागू कर दिया गया। इस एक्ट के लागू हो जाने के उपरान्त इन जिलों में कोई भी राजनैतिक सभा आयोजित नहीं की जा सकती थीं
1909 ई. में सरकार ने देश में मार्ले-मिन्टो सुधार लागू कर दिए। कांग्रेस के नरम दल ने इन सुधारों का स्वागत किया, परन्तु, गरम दल वाले इन सधारों का विरोध कर रहे थे। बाबू बालमुकुंद गुप्त ने इन सुधारों का खुलकर विरोध किया। मार्ले-मिन्टो सुधारों के माध्यम से अंग्रेज सरकार देश को सांप्रदायिक आधार पर बांटने में सफल रही। इससे राष्ट्रीय आन्दोलन को गहरा धक्का लगा। यह हालात 1919 तक चलते रहे।

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