हरियाणा में 1857 की क्रान्ति

1857 Revolution in Haryana

1803 ई. में सर्जी अंजन गाँव की संधि के बाद हरियाणा के अधिकतर क्षेत्र पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार हो गया। अंग्रेजों ने हरियाणा का यमुना के दाएँ तट के साथ-साथ का क्षेत्र ‘असाइंड टेरिटरी’ के रूप में अपने पास रख लिया तथा शेष क्षेत्र अपनी सहूलियत के अनुसार राजा-नवाबों में बाँट दिया। हरियाणा की स्वराजप्रिय जनता ‘कंपनी राज’ को स्वीकार नहीं कर पाई। 1803 ई. से लेकर 1810 ई. तक प्रदेश में जगह-जगह हरियाणा की जनता ने अंग्रेजों और इनके पिछलग्गू राजा-नवाबों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किए। अंग्रेजों ने इन विद्रोहों को निर्दयता के साथ दबा दिया और धीरे-धीरे अपना शिकंजा कसते चले गए। अंग्रेज यहीं नहीं रुके। प्रदेश में जो भी शासक अंग्रेजों को खटकते थे अंग्रेजों ने एक-एक करके उन शासकों की रियासतों को अलग-अलग बहाने बनाकर हथियाना आरंभ कर दिया। 1818 ई. से लेकर 1851 ई. तक के तीन दशक के अन्तराल में अंग्रेजों ने अकेले हरियाणा में 13 रियासतों को हथिया कर उनका अंग्रेजी राज्य में विलय कर लिया।

ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा कब्जाई गई रियासतें –

रियासत का नाम —–छीनने की तिथि——–छीनने जाने का कारण
रानिया           ———–1818—-नवाब जाबिता खाँ द्वारा विद्रोह
छछरोली                      —1818——रानी रामकौर की अयोग्यता, जोधसिंह का हस्तक्षेप
अम्बाला—–1824—–राजा गुरबख्शसिंह की विधवा सरदारनी दयाकौर की मृत्यु।
रादौर—–1828—–राजा दुलचासिंह की विधवा सरदारनी इंदकौर की मृत्यु।
दियालगढ़ (दयाकौर का हिस्सा)——- 1829——— राजा भगवानसिंह की विधवा माई दयाकौर की मृत्यु।
थानेसर (भंगासिंह का 2/5 भाग)——- 1832——— राजा जमियतसिंह की बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु।
कैथल———–1834———– भाई उदयसिंह की बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु।
बुफोल———- बुफोल ———— राजा हरनामसिंह की बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु। 1838
चलौंडी———–1844———– सरदार भागलसिंह की विधवा सरदारनी रामकौर की मृत्यु।
लाडवा—————1845———- राजा अजीतसिंह द्वारा विद्रोह की सजा।
थानेसर (भंगासिंह का 3/5 भाग)—— 1850——राजा फतेहसिंह की विधवा रानी चांदकौर की मृत्यु।
हलाहर——–1850————– राजा फतेहसिंह की बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु।
दियालगढ़ (माई सुखन का एक हिस्सा)—– 1851 —-राजा भगवानसिंह की विधवा माई सुखन की मृत्यु।

अग्रेजों की विस्तारवादी नीति, आर्थिक दोहन, सांस्कृतिक दुर्व्यवहार, अत्याचार आदि अनेकों ऐसे कारक थे जिनके कारण समय-समय पर न केवल जनता अंग्रेजों से नाराज होती चली गई, अपितु सैनिक और राजा-नवाब भी अंग्रेजों से संतुष्ट नहीं थे। इस असंतोष को हवा दी चर्बी वाले कारतूसों की खबर और उसके परिणामस्वरूप होने वाले विद्रोह ने। पूरे उत्तर भारत की तरह हरियाणा भी इस विद्रोह से अछूता नहीं रह पाया।
जनवरी 1857 में बंगाल की सेना को यह खबर लग गई कि नई एनफिल्ड राइफल के कारतूस में सूअर और गाय की चर्बी लगी हुई है। इस खबर से हिन्दू, सिख तथा मुसलमान सैनिक भड़क उठे। अंततः 10 मई, 1857 को अंबाला में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। उस समय अंबाला में अंग्रेजों की एक बहुत बड़ी सैनिक छावनी थी। यहाँ के सैनिक मेरठ तथा दिल्ली छावनियों के विद्रोही सैनिकों से निरंतर संपर्क में थे तथा अन्दर खाने शस्त्रागर, तोपखाने और घुड़साल पर कब्जा करके अंग्रेजों को मार भगाने की योजना बना रहे थे। परन्तु, शामसिंह नामक एक सैनिक ने उनकी इस योजना के विषय में अंग्रेज अधिकारियों को सूचना दे दी। योजनानुसार मेरठ में क्रान्ति होने से 9 घंटे पहले 10 मई, 1857 को अंबाला में 60वीं देशी पलटन ने विद्रोह कर दिया।

अंग्रेजों को पहले ही विद्रोह की खबर मिल चुकी थी इसलिए विद्रोहियों को तुरंत घेर लिया गया। इसके कुछ समय उपरांत 5वीं बटालियन ने विद्रोह कर दिया परंतु इन सैनिकों को भी अंग्रेजों ने घेर लिया। विद्रोहियों को अंग्रेजों के वफादार सैनिकों ने घेर रखा था और अंग्रेजों के 50 अफसर विद्रोहियों के कब्जे में थे। फलस्वरूप, दोनों ही पक्ष समझौते के लिए मजबूर थे। विद्रोहियों ने हथियार डाल दिए और अंग्रेजों ने उन्हें माफी दे दी। इस प्रकार यहाँ विद्रोह शुरु होने से पहले ही खत्म हो गया।

13 मई, 1857 की रात को दिल्ली से 300 विद्रोही सैनिक गुड़गाँव पहुँच गए। बिजवासन के स्थान पर क्रान्तिकारियों ने गुड़गाँव के जिलाधीश विलियम फोर्ड को हरा दिया। विलियम फोर्ड भाग गया। क्रान्तिकारियों ने 7,80,000 रुपयें गुड़गाँव के खजाने से लूट लिए। मेवात के क्षेत्र में मेवों ने संघर्ष का बिगुल बजा दिया। मेवात के विद्रोहियों में सबसे बुजुर्ग सरफुद्दीन मेवाती था। फिरोजपुर झिरका के क्षेत्र में सआदत खां, पिनगवा और तिगांव के क्षेत्र में सदरुद्दीन तथा सोहना-तावडू के क्षेत्र में फिरोजशाह ने मेवातियों का नेतृत्व किया। विद्रोहियों ने धीरे-धीरे पुरे मेवात को मुक्त करवा लिया।

विद्रोह को दबाने के लिए जून के महीने में जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट डब्लू एफ. एडम को भारी सेना और हथियारों के साथ भेजा गया। मेवात के क्षेत्र में एडम को आग से खेलना पड़ा। मेवातियों ने एडम के छक्के छुड़ा दिए। नौबत यहाँ तक आ गई कि उसके खंद के राजपूत सैनिक भी अपने सरदार ठाकुर शिवसिंह के नेतृत्व में विद्रोहियों से मिल गए। 20 जुलाई को विद्रोहियों ने सीधे एडम पर हमला कर दिया। इस हमले में वह बाल-बाल बचा और अंततः जयपुर वापिस चला गया।

अहीरवाल के वीर भी क्रान्ति के इस यज्ञ में पीछे नहीं रहे। जनता ने रेवाड़ी रियासत के शासक राव तुलाराम के नेतृत्व में यहाँ से अंग्रेजों को मार भगाया। इस विजय से गद्गद् बादशाह बहादुरशाह ने राव तुलाराम जी को रेवाड़ी-शाहजहांपुर-भोड़ा के 421 गाँव का शासक घोषित कर दिया। तलाराम ने क्रान्ति में तन-मन-धन से सहयोग दिया। उसने बादशाह को 45,000 रुपये की आर्थिक सहायता भेजी तथा सितंबर 1857 में बारूद बनाने के लिए गंधक और खाने के लिए 43 गाड़ी अनाज भी भिजवाया।

मेवात और अहीवाल के साथ-साथ फर्रूखनगर के नवाब अहमद अली, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह तथा पटौदी के नवाब अकबर अली ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में अंग्रेजों को मार भगाया। जब जौहर दिखाने की बात हो तो रोहतक की जनता कहाँ पीछे रहती है? 24 मई, 1857 को बहादुर शाह का दूत तफजुल हुसैन एक सैन्य दस्ते के साथ रोहतक पहुँचा। उसने जनता के सहयोग से रोहतक के डिप्टी कमिश्नर को यहाँ से भगा दिया। सभी जातियों और संप्रदायों के लोग अंग्रेजों के खिलाफ उठ खडे हए। अंग्रेजों ने उसी दिन (24 मई) सेना की 60वीं देशी पलटन को रोहतक रवाना कर दिया। परन्तु, इस पलटन ने 10 जन. 1857 को खद ही विद्रोह कर दिया। अगस्त में ले. हडसन के नेतृत्व में अंग्रेजों ने भारी सैन्यबल रोहतक भेजा। उसने क्रान्तिकारियों के नेता सबेदार विसारत अली और उसके सहयोगियों को सोनीपत के खरखौदा के निकट मार भगाया। उसके बाद उसने जींद रियासत की सेना के सहयोग से रोहतक पर धावा बोला परन्तु, हडसन असफल रहा। मजबूर होकर उसे यहाँ से वापिस दिल्ली लौटना पड़ा।

हिसार, हांसी तथा सिरसा में हरियाणा लाइट इंफेंटरी ने विद्रोह कर दिया। विद्रोहियों ने हिसार के उपायुक्त को मार डाला, सरकारी दफ्तरों में आग लगा दी तथा सरकारी खजाने से 1,70,000 रुपये लूट लिए। हिसार में क्रान्तिकारियों का नेतृत्व भटू के सहायक कस्टम अधिकारी शहजादा मुहम्मद आजिम बेग ने किया। हांसी में हुक्मचन्द और मुनीर बेग क्रान्तिकारियों के नेता थे। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए फिरोजपर के उपायुक्त जनरल वान कोर्टलैंड को भेजा गया। उसने 17 जून को रानिया के नवाब नूर मुहम्मद खां को हरा दिया। अंग्रेजों ने नवाब को फांसी दे दी।

चत्तरावन, खिरका तथा रोहणात गाँवों में अंग्रेजी सेनाओं ने भयंकर रक्तपात किया। तत्पश्चात् वान कोर्टलैंड ने बीकानेर रियासत की सहायता से सिरसा पर कब्जा कर लिया। 17 जुलाई को कोर्टलैंड रक्तपात करता हुआ हिसार पहुँच गया। हांसी में शहजादा मुहम्मद आजिम बेग और अंग्रेजों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें बेग की हार हुई। पानीपत में विद्रोहियों ने अंग्रेज अफसर जनरल एनपेन की हत्या कर दी तथा जरनेली सड़क (जी.टी. रोड) पर कब्जा कर लिया। परन्तु, अंग्रेजों ने पंजाब से सेना मंगवाकर इस रणनीतिक मार्ग को मुक्त करवा लिया। बू अली शाह कलंदर की मस्जिद के सभी बड़े इमाम पानीपत में क्रान्तिकारियों का नेतृत्व कर रहे थे। अंग्रेजों ने बड़े इमाम को फांसी पर चढ़ा दिया। परन्तु, सितंबर 1857 में ‘दिल्ली पतन’ तक क्रान्ति को नहीं रोक पाए।

इस प्रकार मई, 1857 के अंत तक लगभग पूरा हरियाणा (कुछेक रियासतों को छोड़कर) अंग्रेजों से मुक्त हो गया। यहाँ के स्थानीय नेताओं ने बादशाह बहादुरशाह जफर को अपना शासक घोषित कर दिया। जो क्षेत्र सीधे अंग्रेजों के हाथ में था वह अब बादशाह के अधिकार में आ गया जिसका प्रशासन वह एक कोर्ट के माध्यम से चलाता था। शेष क्षेत्र का इंतजाम स्थानीय चौधरियों के हाथों में चला गया।

क्रांतिकारियों का पराभव एवं क्रांति की विफलता

20 सितंबर, 1857 को अंग्रेज कुछ स्थानीय शासकों की सहायता से दिल्ली को पुनः हथियाने में कामयाब हो गए। अब उन्होंने हरियाणा की ओर कदम बढ़ाए।
25 सितंबर, 1857 को क्रान्तिकारियों ने तोशाम के तहसीलदार नंदपाल, थानेदार प्यारेलाल तथा कानूनगो खजानसिंह को मारकर तोशाम पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उनका संघर्ष हांसी के निकट हाजिमपुर गाँव में कोर्टलैंड की सेनाओं से हुआ। इस संघर्ष में अंग्रेज विजयी रहे। विद्रोहियों को फिरोजपुर की 10वीं पलटन तथा झज्जर की विद्रोही सेना का सहयोग मिल गया। मंगवा गांव में पुनः क्रान्तिकारियों तथा कैप्टन पीयरसन की सेनाओं में डटकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में लगभग 400 विद्रोही मारे गए। मजबूर होकर शहजादा मुहम्मद आजिम बेग को हिसार छोड़कर नारनौल जाना पड़ा। आजिम बेग के हिसार छोड़ते ही कोर्टलैंड की सेनाओं ने पूरे हिसार जिले पर कब्जा कर लिया। हिसार के उपरान्त कोर्टलैंड ने रोहतक पर कब्जा कर लिया तथा व्यवस्था कायम कर ली।

कैप्टन पीयरसन ने दो सप्ताह के संघर्ष के उपरान्त जून 1857 में कैथल को अपने अधिकार में ले लिया। लाडवा पर डिप्टी कमिश्नर मैकनील ने विजय प्राप्त की। इस प्रकार थानेसर के क्षेत्र पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया। विजयोन्मत्त अंग्रेजी सेना ने असंध, जजमाना, धतरू, चतरू, बलां आदि गाँवों में भारी आगजनी की तथा नरसंहार किया।

गुड़गाँव को नियंत्रण में लाने के लिए अंग्रेजों ने सर्वप्रथम मेवात पर हमला किया। दिल्ली के सहायक कमिश्नर किल्फोर्ड ने दिल्ली से सोहना तक भारी तबाही मचाई। सोहना के निकट फिरोजशाह मेवाती ने किल्फोर्ड के अत्याचारों को रोका।

उसने भीषण संघर्ष में किल्फोर्ड और उसके कई सैनिकों को मार डाला। किल्फोर्ड की मृत्यु के उपरान्त ब्रिगेडियर-जनरल शावर्स ने भारी सेना के साथ मेवात पर हमला किया। फिरोजशाह मेवाती एक लड़ाई में शहीद हो गया। शावर्स ने मेवातियों पर खूब अत्याचार किए परन्तु, वीरं मेवाती झुके नहीं। अंततः वह रेवाड़ी चला गया। दिल्ली के पतन के उपरान्त राव तुलाराम को रामपुरा के कच्चे किले में बैठकर आधुनिक हथियारों से लैस शावर्स के सैनिकों से पारंपरिक युद्ध लड़ने में कोई बुद्धिमानी नजर नहीं आई। अतः समझदारी दिखाते हुए राव तुलाराम ब्रिगेडियर-जनरल शावर्स के रामपुरा पहुँचने से पूर्व ही यहाँ से निकल गए।

1 सप्ताह उपरान्त शावर्स ने रेवाड़ी से झज्जर की ओर कूच किया। झज्जर के नवाब अबदुर्रहमान खां ने छुछकवास में शावर्स के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। शावर्स ने नवाब को बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया। इसके बाद उसने कानोड पर अधिकार कर लिया। कानोड को हथियाने के उपरांत शावर्स ने फर्रूखनगर का रूख किया। फर्रूखनगर के नवाब अहमद अली ने बिना लड़े ही समर्पण कर दिया। शावर्स ने उसे भी बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया।

फर्रूखनगर पर कब्जा करने के बाद शावर्स ने बल्लभगढ़ में महाराजा नाहर सिंह को छलपूर्वक बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया तथा १९ स्वयं भी लूटपाट करते हुए दिल्ली वापिस लौट गया।
शावर्स के वापिस जाने के उपरान्त मेवात में विद्रोह तीव्र हो गया। अंग्रेजों ने मेवात में व्यवस्था स्थापित करने के लिए कर्नल जराड यहां भेजा। घासेड़ा गाँव के निकट जेरार्ड की सेनाओं तथा मेवातियों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में 150 मेवाती देश के काम आए| अंग्रेजों ने घासेड़ा गाँव में आग लगा दी।
हथीन के क्षेत्र में कैप्टन डर्मण्ड को भेजा गया। रूपड़ाका के स्थान पर उसकी सदरूद्दीन के नेतृव में मेवों से भयकर लड़ा३ १२ -400 से अधिक मेव शहीद हुए। डर्मण्ड ने हथीन के कई गाँवों में आग लगा दी।
हरियाणा में 1857 की क्रांति के योद्धा और ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य कमांडर
क्रम संख्या स्थान/जिला===क्रान्तिकारी——-अंग्रेज सैन्य अधिकारी
1.बल्लभगढ़=====राजा नाहर सिह——– ब्रिगेडियर-जनरल शावर्स
2. रेवाड़ी रेवाड़ी ===राव तुलाराम————- ब्रिगेडियर-जनरल शावर्स
3.हिसार===== शहजादा मुहम्मद आजिम बेग ——-वान कोर्टलैंड
4.फिरोजपुर झिरका=== सआदत खां.———- कर्नल जेरार्ड
5.पिनगवा और तिगांव=====सदरूद्दीन——- कैप्टन रामजे
6.सोहना और तावडू======== फिरोजशाह मेवाती ——-ब्रिगेडियर-जनरल शावर्स
7.फर्रूखनगर===== नवाब अहमद अली ब्रिगेडियर——जनरल शावर्स
8.हांसी======= हुक्मचंद और मुनीर बेग ———वान कोर्टलैंड
9.रानियां नवाब नूर मुहम्मद खां——–वान कोर्टलैंड
10. झज्जर======= नवाब अब्र्दुरहमान खां ब्रिगेडियर-जनरल शावर्स

पिनगवा में भी मेवाती वीर सदरूद्दीन अंग्रेज अधिकारी कैप्टन रामजे की सेनाओं से भिड़ गया। इस संघर्ष में कई मेव शहीद हुए। वीर सदरूद्दीन को भी अपना बेटा खोना पड़ा।

फिरोजपुर झिरका में भी मेवों ने जौहर दिखाए। अंग्रेजों से लड़ते हुए मेवाती वीर सआदत खां ने बहुत से मेवों के साथ शहादत दी। भारी तबाही के बाद दिसंबर, 1857 तक मेवात शांत हो गया। मेवात के बाद नारनौल में कर्नल जेरार्ड के लिए एक और चुनौती इंतजार कर रही थी। हिसार के शहजादा मुहम्मद आजिम बेग, झज्जर के नवाब के दामाद जनरल समद तथा राव तुलाराम ने नारनौल में इकट्ठे होकर अंग्रेजों से लड़ने का निर्णय लिया। 16 नवंबर, 1857 को जेरार्ड ने नारनौल पर आक्रमण किया। यहां लगभग 5,000 सैनिक उसका इंतजार कर रहे थे। नारनौल से दो मील दूर नसीबपुर गाँव के निकट दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ।

भारतीय खेमे से कमांडर राव किशन वीरगति को प्राप्त हुए तथा अंग्रेजों की ओर से स्वयं कर्नल जेरार्ड मारे गए। अंग्रेज कमांडर कोलफील्ड ने स्थिति को संभाला और तोपों का मुँह खोल दिया। भारतीय लड़ाके तोपों के आगे मजबूती से लड़े। परन्तु, अंत में विजयश्री अंग्रेजों के हाथ लगी। इस युद्ध में राव रामलाल, शहजादा मुहम्मद अजिम बेग तथा जनरल समद खां का एक पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए। 500 से अधिक क्रान्तिकारी सैनिक इस युद्ध में काम आए। जीत के बाद फिरंगी सेना ने नारनौल और आसपास के गांवों को खूब लूटा। यह युद्ध हरियाणा में 1857 की क्रान्ति का निर्णायक युद्ध था। इतिहास में इसे ‘नारनौल का युद्ध’ के रूप में याद किया जाता है।

जनरल समद खां और राव तुलाराम यहाँ से सुरक्षित निकल गए। जनरल समद खां पहले लखनऊ गए और फिर पटियाला आ गए। यहाँ इनकी मृत्यु हो गई। राव तुलाराम पहले राजस्थान गए और फिर मध्यप्रदेश में तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों से युद्ध किया। इसके पश्चात् अफगानिस्तान चले गए और 23 सितंबर, 1863 को काबुल में 38 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई।

सीमित शस्त्रास्त्र, सीमित धन तथा अकुशल नेतृत्व के बावजूद, 20 सितंबर, 1857 को दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा हो जाने पर भी, हरियाणा की जनता का उत्साह कम नहीं हुआ और हरियाणावासी इस संघर्ष को दिसंबर, 1857 तक खींच ले गए। परन्तु, पराजय तो निश्चित थी। इस क्रान्ति में हरियाणा के लगभग 115 गाँव बर्बाद हुए (सबसे ज्यादा गाँव मेवात से थे) तथा लगभग 3,467 लोगों ने अपनी जान दी (मेवात से सर्वाधिक 1,019 व्यक्ति शहीद हुए)।

क्रान्ति का हरियाणा की प्रशासनिक तथा राजनैतिक व्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। फरवरी, 1858 में हरियाणा प्रदेश को उत्तर-पश्चिमी प्रांत से अलग करके पंजाब में मिला दिया गया। उस समय पंजाब के चीफ कमिश्नर सर जॉन लॉरेंस थे। प्रशासनिक दृष्टि से हरियाणा के क्षेत्र को दो डिवीजनों में बांट दिया गया-दिल्ली डिवीजन तथा हिसार डिवीजन। दिल्ली डिवीजन का मुख्यालय दिल्ली में था तथा इसमें दिल्ली, गडगांव और पानीपत जिले सम्मिलित थे और हिसार डिवीजन का मुख्यालय हिसार में था तथा इसमें हिसार, सिरसा और रोहतक जिले सम्मिलित थे। प्रत्येक जिले की व्यवस्था डिप्टी कमिश्नर के अधीन होती थी।

हरियाणा की देशी रियासतों की व्यवस्था में भी व्यापक बदलाव आए। झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान खां, फर्रूखनगर के शासक अहमदअली तथा बल्लभगढ़ नरेश नाहर सिंह को बिना सुनवाई के चांदनी चौक में सरेआम फांसी दे दी गई। इन रियासतों को अंग्रेजों ने हड़प लिया। बहादुरगढ़ के नवाब के क्रान्ति से अलग रहने के बावजूद उसकी रियासत छीन ली गई। दोजाना, पटौदी और लोहारू रियासतों के शासकों को रियासत देते हुए उनकी रियासत बख्श दी गई।

जीन्द नाभा और पटियाला रियासतों को क्रान्ति के दमन में अंग्रेजों की सहायता के लिए अंग्रेजों ने खुलकर बख्शीश दी। जीन्द रियासत के राजा सरूप सिंह को उसकी वफादारी के लिए दादरी की पूरी रियासत तथा कानोंड (महेन्द्रगढ़) के कुछ परगने इनाम स्वरूप दिए गए। नाभा के राजा को बावल रियासत के कांटी तथा बावल परगने दिए गए। महाराजा पटियाला को नारनौल के आसपास का एक बड़ा भू-भाग पुरस्कार स्वरूप दिया गया।

1857 की क्रान्ति में हथियार उठाने की कीमत हरियाणा की जनता ने भी खूब चुकाई। महारानी विक्टोरिया की आम माफी की घोषणा बावजूदअंग्रेज अधिकारियों के मन से जनता के लिए द्वेष कम नहीं हुआ। फलस्वरूप, अगले दो-तीन दशक तक दमन का ये दौर चलता रहा|

 

 

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