हरियाणा की भाषा शिक्षा एवं साहित्य

Language Education and Literature of Haryana

भाषा (L anguage)

वैदिक युग में प्रारंभ में ‘छांदस’ भाषा का प्रयोग होता था। सरस्वती और दृषद्वती के पवित्र कांठों पर ऋग्वेद की रचना इसी भाषा में हुई। यह काव्यात्मक (छंदात्मक) भाषा थी। समय के साथ इस कठिन भाषा का सरल रूप भी आया जिसे ‘औदिच्य’ कहा गया। लगभग 500 ई०पू० पाणिनी ने औदिच्य को व्याकरण के नियमों में बाँधकर सँवार दिया। इस सुधरी हुई भाषा का नामकरण संस्कृत के रूप में हुआ। इसी काल में (500 ई०पू०) ब्रह्मी लिपि भी अस्तित्व में आई।

शिक्षा (Education )

शिक्षा के अर्जन के लिए बालक को गुरुकुल भेजा जाता था। इस अवसर पर एक साधारण-सी रस्म भी अदा की जाती थी जिसे ‘उपनयन संस्कार’ कहा जाता था। विद्यार्थी की योग्यता एवं रूचि के अनुसार गुरु ही बालकों के लिए पाठ्यक्रम का निर्णय लेते थे। अध्यापन का कार्य गुरु द्वारा धार्मिक कर्तव्य मानकर किया जाता था।

साहित्य (Literature)

वैदिक काल में हरियाणा में ढेर सारा साहित्य रचा गया। इस साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण चारों वेद हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। साहित्य सृजन की यह उत्तम स्थिति काफी लंबे समय तक बनी रही। अतः यहाँ सभी लोग सुशिक्षित तथा सुसंस्कृत हो गए।

धार्मिक अवस्था (Religious status)

वैदिक काल में हरियाणा के लोगों का धार्मिक जीवन काफी सरल था। उनका ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक निराकार, अनादि, अनंत, अजन्मा तथा निर्विकार था। उस समय के लोग न मन्दिर बनाते थे और न ही मूर्ति पूजा का चलन था। वैदिक काल में लोग वेद मंत्रो के उच्चारण के साथ यज्ञ के द्वारा पूजा संपन्न करते थे। यद्यपि उस समय के लोग मूर्तिपूजा नहीं करते थे परन्तु, भिन्न-भिन्न शक्तियों को देवी-देवता के रूप में अवश्य देखते थे।

हरियाणा के प्रमुख देवी-देवता (Major deities of Haryana)

हरियाणा के प्रमुख देवी देवता निचे दिए हुए आलेख में उल्लेखित किये गए हैं जो इस प्रकार हैं:

  • वरूण – संसार का अधिष्ठाता
  • इंद्र – शत्रुओं का संहारक तथा कृषि को विकसित करता था।
  • सूर्य देव – मार्गदर्शक
  • उषा – समस्त सांसारिक कोष की स्वामिनी, अंधकार को दूर करने वाली।
  • अग्नि . – सब यज्ञों को पूर्ण करने वाली।

इनके अतिरिक्त वायु, पृथ्वी, सोम, यम (दिन), यमी (रात) आदि भी आर्यों के पूज्य देवी-देवता थे।

सामाजिक व्यवस्था (Social System)

समाज की आधारभूत इकाई ‘कुल’ या ‘परिवार’ होते थे। परिवार पितृ प्रधान थे। परिवार का स्वामी होने के कारण पिता ‘गृहपति’ या ‘कुलपति’ कहलाता था। परिवार में स्त्रियों की दशा अच्छी थी। वह गृहस्वामिनी मानी जाती थी। वह सभा धार्मिक कार्यों में भाग लेती थी। पर्दे की प्रथा उस काल में नहीं थी। अपाला. लोपामद्रा, विश्ववारा, घोषा जैसी स्त्रियों ने वैदिक मत्रा की रचना करकापपद का प्राप्त कर लिया था। बालविवाह तथा सती प्रथा उस काल में प्रचलित नहीं थी। विधवा पनः विवाह कर सकता था। कुछ अपवादा को छोड़कर बहविवाह की प्रथा भी प्रचलित नही थी। मनष्य का जीवन चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गहस्थ वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम में विभक्त था।

ब्रह्मचर्य आश्रम (Brahmacharya Ashram)

25 वर्ष की आयु तक यह आश्रम चलता था। सर्वप्रथम, ब्रह्मचारी को उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार करना पड़ता था। इस विधि से वह ‘द्विज’ बनता था।

गृहस्थ आश्रम (Grihastha Ashram)

25 वर्ष की आयु में विवाह से लेकर 50 वर्ष की आयु तक। यह आश्रम भोगों व लोकपालन कार्यों का आश्रम था।

वानप्रस्थ आश्रम (Vanaprastha Ashram)

50 वें वर्ष से 75 वें वर्ष तक तीसरा आश्रम ‘वानप्रस्थ आश्रम’ होता था।

संन्यास आश्रम (Sannyas ashram)

75 वें वर्ष के उपरान्त संन्यास आश्रम होता था।

जाति प्रथा (Caste System)

वैदिक युग में जातिप्रथा का प्रचलन नहीं था। यद्यपि, समाज चार वर्णों-ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में बंटा हुआ था। पण जन्म सनहा कम से निर्धारित होता था। परन्त. उत्तर-वैदिक काल में वर्ण जाति में बदल गए तथा इनका निर्धारण जन्म से होने
लगा।

भाोजन, आभूषण तथा व्यवसाय (Food, Jewelry & Business)

वैदिक युग में लोगों का भोजन सरल तथा सात्विक था। सर्वप्रथम जौ का प्रयोग हुआ, फिर गेहूँ, दाल तथा शाक-भाजा भी इसी काल में आईं। फलों के साथ-साथ गाय के दूध का भी प्रयोग होता था। इस काल में जडी-बूटियों से बने सोमरस नामक पेय का भी चलन था। उस काल के वस्त्र ऊन, कपास तथा रेशम के बने होते थे। तीन तरह के वस्त्र होते थे जो लपेट कर और गाँठ लगा कर पहने जाते थे। ये थ-नीवी (नीचे पहने जाने वाले वस्त्र), वास (शरीर के मध्यभाग के वस्त्र), अधिवास (शरीर के ऊपर के वस्त्र)। पुरुष सिर पर पगड़ी बाँधते थे। अमीर लोग स्वर्ण आभूषण भी पहनते थे। वैदिक काल की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान थी। गाय, घोडे, भेड़, बकरियाँ आदि घरों में पाले जाते थे। बहुत से लोग व्यापार भी करते थे। इनमें प्रमुख धंधा कपड़ा बुनने का था। वस्त्रों को रँगने और उन पर कढ़ाई करने का भी चलन था। बढ़ई का पेशा भी उन दिनों आदर से देखा जाता था। सुनार आभूषण तैयार करते थे और लोहार उस्तरे, नेजे तथा तलवार आदि बनाते थे। जड़ी-बूटी तथा शल्य चिकित्सा के माध्यम से वैद्य बीमारों का ईलाज करते थे।

 

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