हरियाणा की राजनितिक गतिविधियां तथा व्यस्था

स्थानीय मान्यता के अनसार मनु वैवस्त यहाँ का प्रथम प्रतापी राजा हुआ। उसके चार पुत्रों में से दो सुद्युम्न (सतलुज व सरस्वती के बीच के क्षेत्र पर शासन) तथा शर्याति (राजस्थान की सीमा तक का मत्स्य-‘मेवात’ के क्षेत्र पर शासन) का संबंध हरियाणा से था। शर्याति ने भार्गव ऋषि च्यवन’ के पुरोहित्व में अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था। नारनौल के निकट ‘ढोसी’ नामक स्थान से ऋषि च्यवन के जुड़े होने की पबल परंपरा है। शर्याति की नि:संतान मृत्यु के पश्चात् सुद्युम्न के उत्तराधिकारी सतलुज से लेकर साहबी नदी के क्षेत्र तक के स्वामी सीकल में राजा परू हए जिनके नाम से यह वंश ‘पौरव वंश’ हो गया। इसी पौरव वंश’ में प्रतापी राजा भरत हुए। इन्होंने अपने पराकम से राज्य का विस्तार गंगा तक कर लिया। उनके नाम पर ही देश का नाम भारत पड़ा। राजा भरत के पश्चात् पौरव वंश को ही ‘भरत-कला नाम से जाना जाने लगा। इसी कुल में महाप्रतापी राजा ‘कुरू’ हुए।
हरियाणा में एक व्यवस्थित राजनैतिक व्यवस्था का विकास वैदिक काल में ही हुआ माना जाता है।

हरियाणा में वैदिक कालीन व्यवस्था के प्रमुख अंग:

ग्राम

कई परिवारों के समूह से बनता था तथा राजनैतिक व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई था। ग्राम का मुखिया ‘ग्रामणी’ कहलाता था।

विश

ग्रामों का समूह ‘विश’ कहलाता था। इसे हम आधुनिक जिले के समान समझ सकते हैं। विश का मुखिया ‘विशपति’ कहलाता था। जिसकी नियुक्ति चुनाव के माध्यम से होती थी।

जन

कई विशों को मिलाकर जन होता था जो संभवतः आजकल के प्रातों जैसी इकाई था। ‘जन’ राजसत्ता के अधीन गणराज्यिक
प्रणाली से संचालित होते थे। राजा में निरंकुशता नही थी। उसे प्रजा स्वयं चुनकर बनाती थी।

समीति

जन के समस्त लोगों का समूह होता था। यह जन की हर प्रकार की समस्या पर गंभीरता से विचार करके राजा को उनके हल सुझाती थी।

सभा

यह मुख्य अधिकारियों तथा विद्वानों का संगठन था। इसमें राज्य के खास-खास मसलों पर विचार होता था।

राजा

राजा निरंकुश नहीं था। वह समिति तथा सभा की सलाह से काम करता था। कई जगह राजा चुना जाता था और कई जगह
वंशानुक्रम से बनता था।

अन्य अधिकारी:

पुरोहित

राजा को परामर्श देना व सभी धार्मिक कार्य।

सेनानी

सैन्य व्यवस्था देखता था। सेना कई इकाईयों में विभक्त होती थी जिसके नाम ‘शर्ध’, ‘वात’ और ‘गण’ थे।

 

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