हरियाणा का मध्यकालीन इतिहास

Medieval History of Haryana

जैसा की हम सभी जानते हैं कि किस प्रकार तुर्क और अफगान आक्रमणकारियों की गिद्ध दृष्टि पंजाब और हरियाणा समेत समस्त उत्तर-पश्चिमी भारत पर जमी हुई थी। इस क्षेत्र में आक्रमणों और लूट का क्रम तो 11वीं सदी के प्रारंभ में महमूद गजनवी के आक्रमण से ही आरंभ हो चुका था। सन् 986 ई० में गजनी के शासक सुबुक्तिगीन ने जयपाल पर आक्रमण करके पेशावर पर अधिकार कर लिया। 1014 ई० में महमूद गजनवी ने जयपाल को हराकर थानेसर शहर में लूट-पाट की। परन्तु, पृथ्वीराज (तृत्तीय) चौहान की मुहम्मद गौरी के हाथों तराईन (तरावड़ी) के द्वितीय युद्ध में हार (1192 ई०) भारतीय इतिहास की एक असाधारण घटना थी। इस घटना ने भारत की हजार साल की विदेशी दासता की आधारशिला रख दी।

पंजाब का कुछ क्षेत्र तो इससे पूर्व भी अफगानिस्तान और मध्य एशिया की राजनैतिक स्थितियों में फँसा रहा था परन्तु, सतलुज के नीचे के क्षेत्र की यह दशा इसके पूर्व कभी नहीं हुई थी। बड़ी लज्जा का विषय है कि इस अनहोनी राजनैतिक दशा को भी भारत के तत्कालीन राजे-रजवाड़े स्वार्थपूर्ण ढंग से देखते रहे। 1190 ई० से 1206 ई० के 16 वर्ष के काल में न तो मुहम्मद गौरी और ना ही उसका दास कुतुबुद्दीन ऐबक इस क्षेत्र में कोई बड़ी शक्ति बन पाए थे। यदि एक संगठित भारतीय शक्ति इनका सामना करती तो बड़ी आसानी से इनको इस धरती से भगाया जा सकता था। परन्तु, तत्कालीन राजे-रजवाड़ों की स्थार्थपूर्ण राजनीति ने इनको पैर जमाने का पूरा अवसर प्रदान किया और भारत गुलामी के एक कुचक्र में फंस गया जो 15 अगस्त 1947 तक चला।

दास वंश और हरियाणा

1206 ई. में मुहम्मद गौरी का देहान्त हो गया। उसके विश्वास पात्र दास जनरल कुतुबुद्वीन ऐबक हरियाणा में दास वंश के शासक ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए 24 जुलाई, 1206 को लाहौर के स्थान पर खुद को भारत का  सुल्तान घोषित करके यहाँ तुर्क-अफगान राज्य की नींव डाल दी। इतिहास में कुछ स्थानों जैसे हांसी, सिरसा, मेवात, रोहतक, सोनीपत, रेवाड़ी और थानेसर आदि स्थानों पर सैनिक चौकियाँ
स्थापित की गई थीं। संभवत: सैनिक चौकियों के दारोगा ही अपने-अपने अधीन भू-भागों का  आर्थिक इंतजाम भी देखते हों परन्तु, हरियाणा की साधारण जनता इन ‘सैनिक न्यायालयों’ की अपेक्षा परंपरागत ग्राम पंचायतों में ही जाती थी। 1206-10 ई० के काल में ऐबक ने सैनिक
कार्यवाही करके हरियाणा की जनता को पूरी तरह अपने शिकंजे में कस डाला था। इसलिए ऐबक के काल में (1206-10 ई०) जनता ज्यादा विरोध नहीं कर पाई।

दास वंश के दौरान हरियाणा में प्रमुख मुस्लिम शासक

  • कुतुबुद्दीन ऐबक 1206-10 ई०
  • इल्तुतमिश – 1210-36 ई०
  • स्कनुद्दीन – अप्रैल से नवंबर, 1236 ई०
  • रजिया सुल्तान – 1236-1240 ई०
  • मुईजुद्दीन बहराम 1240-42 ई०
  • नासिरद्दीन महमूद 1246-1266 ई०
  • उलूगखाँ महमूद 1266-87 ई०

इल्तुतमिश का शासन (1210-1236 ई०)

1210 ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के पश्चात् इल्तुतमिश दिल्ली की गद्दी पर बैठा। उसको हरियाणा में विरोध का सामना करना पड़ा। पंजाब के प्रशासक कुबाचा ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया और सिरसा के आसपास का काफी क्षेत्र अपने अधीन कर लिया। वह एक शक्तिशाली सरदार था। 1227 ई० में उसने सिरसा में अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने का ऐलान कर दिया। सुल्तान ने कुबाचा को हराकर हरियाणा में अपनी प्रभुत्ता स्थापित कर ली। पूरे क्षेत्र को इक्तों में बाँट दिया और प्रत्येक इक्ते को अपने विश्वासपात्र सरदारों के अधीन कर दिया। इक्तों के हाकिम-सैनिक, नागरिक और न्यायिक सब प्रकार के काम देखते थे। उसे मुक्ती या वली कहते थे।

समसामयिक ग्रन्थों में सात इक्तों का उल्लेख मिलता है। इनमें प्रमुख थे-दिल्ली, हांसी, सिरसा, पिपली, रेवाड़ी, नारनौल और पलवल। इनमे से दिल्ली, हांसी और सिरसा के इक्ते काफी बड़े और महत्वपूर्ण थे।

1236 ई० में इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद रूकनुद्दीन (अप्रैल-नवंबर, 1236 ई०) गद्दी पर बैठा। रूकनुद्दीन एक निकम्मा शासक सिद्ध हआ। इसका लाभ उठाते हुए कई सरदारों ने विद्रोह कर दिया। इनमें हांसी के मुक्ती सैफुद्दीन कूची का विद्रोह काफी जोरदार था। तरावडी के पास भी बगावत हो गई। सुलतान इन विद्रोहों को दबाने के लिए जब दिल्ली से बाहर निकला तो उसकी अनुपस्थिति में इल्तुतमिश की पुत्री रजिया ने गद्दी पर कब्जा जमा लिया।

रजिया सल्तान

रूकनुद्दीन के निकम्मेपन के कारण राजनैतिक उथल-पुथल आरंभ हो चुकी थी यहाँ के हकिम विद्रोह पर उतारू थे। हरियाणा के लोग भी विद्रोह को उतारू हो गए। जब उसका सेनापति कुतुबुद्दीन हसन गौरी रणथंभौर के राजपूत शासक पर आक्रमण करने जा रहा था तो मेवात की जनता ने गुरिल्ला पद्धति से उसकी सेना की कमर तोड़ दी फलस्वरूप, उसे नाकामयाब होकर लौटना पड़ा। इसी बीच बठिण्डा और लाहौर के सूबेदारों ने विद्रोह कर दिया। रजिया को बन्दी बनाकर मुईजुद्दीन बहराम को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया।

रजिया ने सिंहासन पुनः हासिल करने के उद्देश्य से मलिक अल्तुनिया से निकाह कर लिया। अक्तूबर, 1240 में सुल्तान व रजिया की सेनाओं में मुठभेड़ हुई जिसमें रजिया को दुर्दशा झेलनी पड़ी। 14 अक्तूबर, 1240 को कैथल के पास विरोधियों ने मलिक अल्तुनिया और रजिया की हत्या कर दी।

बहराम और मासूद

रजिया की मृत्यु के बाद मुईजुद्दीन बहराम (1240-42 ई०) और मासूद (1242-46 ई०) भी अप्रभावी सिद्ध हए इनका अल्पकाल का शासन राजनैतिक उथल-पुथल में ही बीत गया। हरियाणा के लगभग सभी इक्ते इस समय पूरी तरह स्वतंत्र हो गए और मनमाने ढंग से चलते रहे। प्रदेश में यह उथल-पुथल का दौर था।

नासिरूद्दीन महमूद (1246-66 ई०)

1246 ई० में नासिरूद्दीन महमूद गद्दी पर बैठा। उसने व्यवस्था स्थापित करने के गंभीर प्रयास आरंभ किए। उसने हांसी के शक्तिशाली मुक्ती उलूग खां (बलबन) पर भी नियंत्रण करने को सेनाएँ भेजी। परन्तु इसी समय मेवात की जनता ने विद्रोह कर दिया। फलस्वरूप, सुल्तान को बलबन से संधि करनी पड़ी। उसे पुराना पद देकर ‘आमिर-ए-हाजिब’ बना लिया। बलबन ने सुल्तान के कहने पर मेवात पर नियंत्रण का प्रयास किया परन्तु, सफलता नहीं मिल पाई। 1248-49 ई. में उलूगखाँ (बलबन) पूरे दलबल सहित मेवात के विद्रोह को दबाने व मेवात की जनता को दण्डित करने पहुँचा। वीर मेवातियों ने डटकर मुकाबला किया।

मेवात का हर गाँव युद्ध के मैदान में बदल गया। उलूग खाँ को मेवात से वापस लौटना पड़ा। उलूग खाँ के वापस आते ही वीर मेवातियों ने पुन: विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया। 1257 ई० में मेवातियों ने हांसी के निकट नासिरूद्दीन महमूद के प्रधान सेनापति के ऊँटों के कारवाँ पर हमला कर दिया। विद्रोहियों का नेतृत्व मलखा नामक एक मेवाती सरदार कर रहा था। सुलतान की सेनाएँ उस वक्त सिंध और लाहौर में मंगोल आक्रमण का सामना कर रही थी। इसलिए सुलतान को इस अपमान को सहना पड़ा। 1260 ई० में सुल्तान ने पुन: उलूगखाँ (बलबन) को मेवातियों के विद्रोह को दबाने के लिए भेजा। लगातार 20 दिन तक भीषण संघर्ष चला। मेवाती डटकर लड़े परन्तु सुल्तान की सेनाओं के संख्याबल के सामने टिक नहीं पाए।

बहादुर मलखा अपने परिवार के साथ उलूग खाँ (बलबन) की सैनाओं द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। 9 मार्च, 1260 को भरे दरबार में सभी को मृत्युदण्ड दिया गया और इसके दो दिन बाद मलखा सरदार को हाथियों के पैरों तले कुचलवा दिया गया। जुलाई 1260 ई० में मेवाती फिर उठ खड़े हुए। उलूग खाँ और सुलतान नासिरूद्दीन महमूद ने मेवातियों के विद्रोह को दबाने की पुरजोर कोशिश की परन्तु, सफल नहीं हो पाए। हर बार जैसे ही शाही सैनाएँ मेवात से निकलती वीर मेवाती फिर आ डटते।

उलूगखाँ (बलबन) का शासन (1266-87)

1265 ई. में नासिरूद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद 1266 ई० में बलबन दिल्ली सल्तनत का स्वामी बना। उसने लंबे समय तक शासन किया। बलवन ने विद्रोहियों से निबटने की योजना बनाई और पूरी ताकत से मेवातियों पर हमला किया। उसने मेवात क्षेत्र से जंगल साफ करवाए ताकि विद्रोहियों के छुपने के ठिकाने नष्ट किए जा सकें। पर वीर मेवाती डटे रहे। इस संघर्ष में लाखों बहादुर मेवाती अपने जीवन का मोल चुका गए।

मेवात में स्थाई शांति बनाए रखने के लिए बलबन ने गोपालगीर में एक दुर्ग का निर्माण किया तथा वहाँ एक सैन्य ठिकाना बना दिया। इसके साथ ही मेवात में अनेक थाने बनाए गए जहाँ उसने अफगानों की चौकियाँ बिठा दी। इससे कुछ समय के लिए मेवात में शांति स्थापित हो गई। बलबन के इन प्रयासों से मेवात में तो व्यवस्था कायम हो गई परन्तु, हरियाणा के अन्य स्थानों पर बगावत हो गई। बलबन ने सभी विद्रोहों को क्रूरता से दबाया। उसने नारनौल, कानोंड, सोनीपत, थानेसर, धतरत, बरवाला और हांसी आदि स्थानों पर भी अफगान चौकियाँ स्थापित करके सैनिक व्यवस्था कायम की।

नागरिक प्रशासन पर नियंत्रण करने के लिए सोनीपत, कैथल, शिवालिक आदि नए इक्तों की स्थापना की। बर्नी के अनुसार इक्ते नागरिक प्रशासन की इकाई थे जो आजकल की तहसील की तरह थे। यद्यपि बलबन ने बड़ी कठोरता से विद्रोहों को दबाया परन्तु इतिहासकार सर बल्जरों हेग लिखते हैं कि ‘इन कठोर उपायों के बावजूद भा बलबन मेवात को पूरी तरह अपने अधीन नहीं कर सका।

हरियाणा में खिलजी वंश उदय

बलबन के उत्तराधिकारी अयोग्य सिद्ध हुए। विभिन्न इक्तेदारों ने सिर उठाना आरंभ कर दिया। 1290 ई० में कैथल के मुक्ती (जो कि एक । सरदार था) जलालुद्दीन खिलजी ने बलबन के उत्तराधिकारियों से सत्ता छीनकर दिल्ली में खिलजी वंश की सत्ता स्थापित कर ली।

हरियाणा में खिलजी वंश के मुख्य शासक

  • जलालुदान खिलजी (1290-1296 ई०)
  • अलाउद्दीन खिल्जी (1296-1316 ई.)
  • कुतुबुद्दीन मुबारक शाह (1316-20 ई.)

जलालुदान खिलजी

जलालुदान खिलजी ने 6 वर्षों (1290-1296 ई०) तक शासन किया। जलालुद्दीन खिलजी ने सहानुभूति से शासन करने की नीति अपनाई। हरियाणा के स्वाभिमानी लोगों ने उसे भी चुनौती दी। सुल्तान ने विद्रोहों को दबाने की खूब चेष्टा की और प्रशासनिक व्यवस्था को बनाए रखा।

अलाउद्दीन खिल्जी

जलालुद्दीन खिलजी को सत्ता से हटाकर अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना। अलाउद्दीन, सुल्तान जलालुद्दीन का भतीजा था और उसका दामाद भी। अपने भाई अल्मास बेग के साथ मिलकर अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 ई० में जलालुद्दीन को मार डाला और सत्ता पर कब्जा कर लिया। अलाउद्दीन ने 1316 ई० तक शासन किया।

अलाउद्दीन को इतिहास में क्रूर शासक होने के साथ-साथ अपने आर्थिक सुधारों के लिए भी जाना जाता है। अरब हतिहासकार इसामी के अनुसार अलाउद्दीन क शासन काल के दौरान सन् 1305 ई० में मंगोलों ने हरियाणा पर आक्रमण कर दिया था। अलाउद्दीन के एक हिन्दू जनरल नानक न सिरसा और हांसी के बीच मंगोलों का सामना किया और उन्हें हरा दिया। नानक ने बहुत से मंगोल सरदारों को बंदी बना लिया था। अलाउद्दीन एक कट्टर शासक था। उसके काल में जनता हमेशा विद्रोह के लिए तैयार रहती थी। परन्तु, उसने सख्ती से काम लिया और किसी को भी सिर उठाने का अवसर नहीं दिया।

 

कुतुबुद्दीन मुबारक शाह (1316-20 ई.)

अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् 1316 ई० में कुतुबुद्दीन मुबारक शाह शासक बना। उसने जलालुद्दीन की तरह जनता के साथ सहानुभूतिपूर्वक संबंध स्थापित करने के प्रयास किए। अलाउद्दीन के शासन काल में जनता पर थोपे गए करों का बोझ कुछ कम किया। परन्तु शीघ्र ही उसका पतन हो गया और एक षडयंत्र के द्वारा नसीरूद्दीन खुसरों खान (15 अप्रैल, 1320) को दिल्ली का सुल्तान घोषित किया गया।

मुबारक शाह के शासन काल में एक-एक करके लगभग सभी इक्तेदार खुद मुख्तियार हो गए। दिपालपुर (पंजाब) का हाकिम गाजी मलिक तो सिरसा तक बिना रोक-टोक आगे बढ़ आया था। सिरसा में शाही सेना ने उसे रोकने का प्रयत्न किया परन्तु हार गई। अमीर खुसरो के अनुसार गाजी मलिक ने आगे बढ़ते हुए हांसी, मदीना, रोहतक, माण्डोठी तथा पालम पर अधिकार कर लिया।

हरियाणा में तुगलक वंश की स्थापना

22 अगस्त, 1320 को नसीरूद्दीन खुसरों खान की सेना के सेनापति को मारकर गाज़ी मलिक ने दिल्ली सल्तनत पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार गयासुद्दीन तुगलक का नाम धारण करके गाज़ी मलिक दिल्ली का पहला तुगलक सुलतान बना। उसने हरियाणा पर विशेष ध्यान दिया। उसने अपने खास विश्वासपात्रों को प्रत्येक इक्ते और शिकों में तैनात किया। व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के लिए कठोर कदम उठाए।

 तुगलक वंश के संथापक

  • गाजी मालिक (1320-1324 ई.)
  • मुहम्मदशाह तुगलक (1325-51 ई.)
  • फिरोजशाह तुगलक (1351-1388 ई.)
  • अबुबक्र (1389 -1390 ई.)
  • महमूद नसीरुद्दीन तुगलक (1394 -1412 ई.)

गयासुद्दीन तुगलक

गयासुद्दीन तुगलक के बाद उसका पुत्र मुहम्मदशाह तुगलक दिल्ली की गद्दी पर बैठा। तुगलक के समय दिल्ली, हांसी और सिरसा के इक्ते अधिक प्रसिद्ध थे। मुहम्मद तुगलक ने प्रशासनिक नियंत्रण के लिए अलाउद्दीन खिल्जी की नीति अपनाई। उसने जनता पर धार्मिक ज्यादतियाँ भी की। मुहम्मद तुगलक के शासन काल में अनेकों मन्दिर तोड़े गए। इन ज्यादतियों से परेशान होकर जनता भड़क उठी। दिल्ली के निकट का क्षेत्र तो नियंत्रण में रहा परन्तु उत्तरी हरियाणा की जनता ने तीव्र बगावत कर दी।

सुलतान स्वयं सेना लेकर विद्रोह को दबाने निकला। शाही सेना ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया तथा लाखों लोगों से जबरन धर्म-परिवर्तन कराया गया। इन ज्यादतियों के बावजूद सुलतान पूर्णत: शान्ति स्थापित नहीं कर पाया। हरियाणा के कैथल. समाना, सुनाम, गहराम आदि अनेकों क्षेत्रों के लोगों ने कर देना बन्द कर दिया। एक तरफ जनता का असन्तोष और दूसरी ओर सुलतान की विचित्र-मूर्खतापूर्ण नीतियों से फैली अव्यवस्था के बीच सन् 1351 ई० में सिन्ध के थट्टा नामक स्थान पर सुलतान की मृत्यु हो गई।

फिरोजशाह तुगलक (1351-1388 ई.)

मुहम्मद तुगलक की 1351 ई० में मृत्यु के बाद फिरोजशाह तुगलक सलतान बना। वह महम्मदशाह तुगलक का चचेरा भाई था। फिरोजशाह ने लोगों को आर्थिक राहत तो दी परन्तु, उसने धार्मिक कट्टरवाद की सभी हदें पार कर दी। उसने अनेक हिन्दू धार्मिक स्थलों को नष्ट किया। सुलतान फिरोजशाह ने अपनी पुस्तक ‘फुतुहाते फिरोजशाही’ में बड़े गर्व के साथ गोहाना में शिव मन्दिर को तोड़ने, हिन्दुओं की धार्मिक पुस्तकें जलाने और लोगों पर धार्मिक ज्यादतियाँ किए जाने का वर्णन किया है। इन ज्यादतियों से तंग आकर जनता ने विद्रोह कर दिया। मोहम्मद विहामह खानी ने हिसार व सफीदों में विद्रोह का उल्लेख किया है जिसे क्रूर फिरोजशाह ने बड़ी कट्टरता से दबा दिया।

फिरोजशाह तगलक को हरियाणा का क्षेत्र बहुत पसंद था। वह यहाँ के जंगलों में शिकार खेलता था। 1354 ई० में फिरोजशाह तगलक ने हिसार-ए-फिरोजा (हिसार) शहर की स्थापना की। हिसार का क्षेत्र उसे इतना पसन्द था कि वह अक्सर यहीं रहता था। उसने यहाँ एक किला बनवाया। इस किले के चार द्वार थे जिन्हें दिल्ली गेट, नागौरी गेट, मौरी गेट और तलाकी गेट कहा जाता था। हिसार फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है- ‘दुर्ग’ या ‘किला’। फिरोजशाह ने हिसार में अपनी प्रेमिका एक गूजरी के लिए ‘गजरी महल’ बनवाया था। इतिहासकार अफीक के अनुसार फिरोजशाह ने हांसी के स्थान पर हिसार-ए-फिरोजा को इक्ता बना दिया तथा हांसी, अग्रोहा, फतेहाबाद और सरसूती अर्थात् सिरसा का सालोदा तक का क्षेत्र इसमें सम्मिलित कर दिया।

पोलिसार और फतेहाबाद के बीच के क्षेत्र जैसे जीन्द, धतरत, तुगलकपुर (सफीदों) आदि को सीधे अपने अधिकार में ले सोनोने वाली आय को वह आलिम-फाजिलों में बांट देता था। 1388 ई० में फिरोजशाह तुगलक की मत्य हो गई।

फिरोजशाह उत्तराधिकारी और तुगलकों का पतन

फिरोजशाह के उपरान्त उसके उत्तराधिकारी नकारा सिद्ध हुए। उनके बाद अब 1289-90 ई०) ने दिल्ली की गद्दी संभाली। वह अपने छोटे से शासनकाल में कोई प्रभावशाली शासन नहीं दे पाया| अबुबक्र ने फिरोजशाह की प्रशासनिक व्यवस्था में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं किया। 1394 ई० में महमूद नसीरुददीन तगल (1394-1412 ई०) ने दिल्ली सल्तनत का ताज पहना। वह कुल मिलाकर एक निकम्मा शासक सिद्ध हआ। वर्षों से को दलाई हुई जनता ने विद्रोह आरंभ कर दिए। चारों तरफ अराजकता की स्थिति थी। शिकदार और मुक्ती खुदमुक्तार हो चुके थे। कभी कान की तरह सदृढ रहा तुगलक साम्राज्य बालू की दीवार की तरह अस्थिर था। अराजकता की इस स्थिति का लाभ उठाते हा 1000 ई० में लटेरे तैमर लंग ने भारत पर आक्रमण कर दिया।

यह हरियाणा के इतिहास की सबसे भयावह घटनाओं में से एक श्री मर 1398 ई में भटनेर (हनुमानगढ़) लूटने के उपरान्त घग्घर नदी के किनारे से हरियाणा में प्रवेश कर गया। तैमूर की आत्मकथा मलफजात-ए-तीमरी’ के अनुसार वह सिरसा, फतेहाबाद, टोहाना, मूणक, कैथल, असंध व पानीपत से होता हुआ 16-17 दिसंबर. 1398 को दिल्ली पहुँचा। तैमूर जहाँ से भी गुजरा हर तरफ रक्त, आगजनी, लूट और बलात्कार का नजारा था। हरियाणा में जगह-जगह तैमर को विरोध का सामना करना पड़ा।

तैमूर का विरोध करने वालों में अहीर, जाट, गुज्जर आदि प्रमुख थे। परन्तु, असंगठित जनता तैमर की वहशी सेना के सामने टिक नहीं पाई। तैमूर ने लूट-पाट की और लौट गया। सुलतान महमूद नासिरूद्दीन मुहम्मद ने तैमूर की लूट के आगे सिर झुका दिया। तैमूर के जाने के उपरान्त चारों ओर अराजकता फैल गई सुलतान केवल नाम मात्र का सुलतान रह गया था। इस अराजकता का हरियाणावासियों ने पूरा लाभ उठाया और लगभग हर क्षेत्र में वे स्वतंत्र हो गए।

हरियाणा में सैयद वंश

सैयद वंश के प्रमुख शासक

  • खिज्र खां
  • मुबारकशाह (1421-34 ई०)
  • सैय्यद शासक मुहम्मदशाह (1434-43 ई०)
  • अलाउद्दीन आलमशाह (1443-51 ई०)

खिज्र खां

तैमूर के आक्रमण ने तुगलक साम्राज्य की कमर तोड़ दी। तुगलक साम्राज्य एक बालू की दीवार थी-अब गिरी, अब गिरी। इस अराजकता का हरियाणावासियों ने पूरा लाभ उठाया। लगभग हर क्षेत्र में विद्रोह हुए और कई स्वतंत्र इक्ते अस्तित्व में आ गए। सुलतान नासिरूद्दीन तुगलक केवल नाम का सुलतान रह गया था और सल्तनत दिल्ली के साथ लगते कुछ क्षेत्र तक सिमट गई थी। मेवात तो स्वतंत्र ही था (मेवात पर तैमूर ने भी आक्रमण नहीं किया था)। उत्तर में कलायत (कैथल परगना) में भी मोहनसिंह मंढार ने स्वतंत्र ध्वज फहरा दिया। इस अफरातफरी का लाभ एक सैयद सरदार खिज्र खाँ ने उठाया। तैमूर ने वापस जाते समय खिज्रखाँ से कहा था, “दिल्ली और अन्य सभी क्षेत्र जो मैने विजय किए हैं, मै खिज्र खाँ को देता हूँ।”

पहले प्लेग की बीमारी और उसके बाद आकाल के कारण खिज्र खाँ सल्तनत पर अधिकार नहीं जमा सका। परन्तु, वह एक सक्षम व्यक्ति था। 1413 ई० तक आते-आते उसने अपने रास्ते की तमाम बाधाओं को पार किया और सत्ता पर अधिकार जमा लिया। परन्तु उसकी बाधाएँ कभी खत्म नहीं हुई। उसके सत्ता सँभालते ही हरियाणा की जनता उठ खड़ी हुई। खिज्र खाँ को जगह-जगह विद्रोह का सामना करना पड़ा। 1421 ई० तक वह इन विद्रोहों को दबाने में ही लगा रहा।

मुबारकशाह (1421-34 ई०)

ने सत्ता सँभाली। उसने सैनिक गतिविधियों के द्वारा विद्रोहों को दबाने के भरपूर प्रयास किए परन्तु, उसी काल में उत्तर दिशा से जसरथ खोखर ने आक्रमण करने शुरू कर दिए और मुबारकशाह भी व्यवस्था स्थापित करने में असफल रहा। .

सैय्यद शासक मुहम्मदशाह (1434-43 ई०) और अलाउद्दीन आलमशाह (1443-51 ई०)

सैय्यद शासक मुहम्मदशाह और अलाउद्दीन आलमशाह भी निष्प्रभावी रहे। अनेक रजवाड़े अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने में सफल हो गए। लूटपाट से आया तैमूरी-सैयद वंश लगभग 37 वर्ष तक जूझता रहा परन्तु
कभी भी एक व्यवस्थित और स्थिर सत्ता नहीं दे पाया।

लोदी वंश  और हरियाणा

लोधी वंश के प्रमुख शासक

  • सिकन्दर लोदी
  • इब्राहिम लोदी

सिकन्दर लोदी

1451 ई. में एक लोदी सरदार, बहलोल ने सैयदों के हाथों डगमगाती दिल्ली सल्तनत की नैया अपने हाथों में ले| लोदी वंश…. ली। इस प्रकार हरियाणा पर लोदियों का प्रभुत्व कायम हो गया। बहलोल लोदी ने 1451 ई० से 1489 ई० तक शासन किया। हरियाणा की बहादुर जनता के साथ संघर्ष करने की बजाय उसने भी प्रशासनिक व्यवस्था को पहले संस्थापकजैसा ही बना रहने देने में भलाई समझी। उसके समय में भी प्रजा ने स्वतंत्र होने के अनेकों प्रयास किए। दिल्ली का सुलतान बनने के उपरान्त उसने गाजी की उपाधि धारण की। उसने ‘बहलोली’ नामक एक नया सिक्का जारी किया जो अकबर के समय तक प्रचलन में रहा।

बहलोल लोदी के समय कुछ मुक्तियों ने भी विद्रोह का झडा बुलंद किया। इन विद्रोहों को शहजादे निजाम खां ने बड़ी सख्ती से दबा दिया। 1489 में बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद शहजादा निजामखां ‘सिकन्दर लोदी’ के नाम से गद्दी पर बैठा। सिकन्दर शाह लोदी एक स्वर्णकार हिन्दू माता का पुत्र था। उसकी माता का पर शाह लादी एक स्वर्णकार हिन्दू माता का पुत्र था। उसकी माता का नाम ‘जयबन्द’ था। उसने भूमि पैमाइश सकन्दरा’ का प्रचलन करवाया। 1504 ई० में उसने आगरा शहर बसाया और राजपूतो पर नियंत्रण रखने के लिए आगरा को अपनी राजधानी बनाया। वह एक कट्टर शासक था। उसने मोहरर्म पर ‘ताजिये’ निकालने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया। ब्राह्मणों पर पुनः जजिया कर लगाया गया।

सिकन्दरशाह ने हरियाणा से हिन्दुओ का सफाया करके इसे दारूल-इस्लाम में परिवर्तित करने की कुत्सित नीति अपनाई। इस धर्मान्ध शासक ने हिन्दुओं के धार्मिक स्थल कुरुक्षेत्र को अपना पहला निशाना बनाने का निश्चय किया। इस अभियान से पूर्व जब उसने उलेमाओं से इस विषय पर चर्चा की तो उस समय के सबसे बड़े मौलवी मिंया अब्दल्ला जधानी ने उसे खरी-खोटी सुना दी। इससे इस धर्मांध शासक ने कुरुक्षेत्र को ध्वस्त करने का अभियान तो रद्द कर दिया परन्तु, वह अपनी धर्मान्धता से बाज नहीं आया। उसे जब भी अवसर मिलता वह हिन्दुओं पर अत्याचार करता रहता था। फलस्वरूप, हिन्दू भी उसके विरूद्ध संगठित होने लगे। कलायत-जीन्द के क्षेत्र के बहादुर मंढारों ने कई बार शाही सेनाओं से टक्कर ली परन्तु, ये बहादुर शाही सैनिकों के संख्या बल से मात खा जाते थे।

सिकन्दर लोदी के शासन काल में संगीत कला के श्रेष्ठ ग्रन्थ ‘लज्जत-ए-सिकन्दरशाही’ की रचना हुई। उसने ‘गुलरूखी’ उपनाम से फारसी भाषा में कविताएँ भी लिखी। प्रसिद्ध सन्त कबीरदास सिकन्दर लोदी के समकालीन थे। 21 सितंबर, 1517 को गले की बीमारी के कारण सिकन्दर लोदी की मृत्यु हो गई।

इब्राहिम लोदी

1517 ई० में सिकन्दर शाह लोदी की मृत्यु के उपरान्त इब्राहिम लोदी गद्दी पर बैठा। वह दिल्ली सल्तनत का अन्तिम सुलतान था। उसने आगरा में राज्याभिषेक के बाद ‘इब्राहिमशाह’ की उपाधि धारण की। 1517 ई० में उसने मानसिंह के पुत्र विक्रमजीत और घतौली के युद्ध में राणा सांगा को हराया । परन्तु, वह एक धमण्डी और नातजुर्बेकार शासक था। शीघ्र ही उसने अपने सगे-सबधियों और अमीरों का नाराज कर लिया। उसने अपने कुछ भाइयों को हांसी के किले में कैद कर दिया।

इन्द्री और करनाल के मुक्तियों से दुर्व्यवहार किया। फलस्वरूप, वे उसके खिलाफ हो गए। प्रजा भी उसकी नीतियों से नाराज थी। इस सबका दुष्परिणाम इब्राहिम लोदी को 1526 ई० में बाबर के साथ पानीपत की पहली लड़ाई में भुगतना पड़ा। बाबर को इब्राहिम लोदी पर आक्रमण के लिए इब्राहिम लोदी के चचेरे भाई दौलत खान लोदी (पंजाब का गवर्नर) और उसके चाचा आलम खान ने आमंत्रित किया था। 21 अप्रैल, 1526 को पानीपत के मैदान में बाबर की सेना ने इब्राहिमशाह लोदी को हरा दिया। इस युद्ध ने न केवल लोदी साम्राज्य का अन्त कर दिया बल्कि हिन्दुस्तान में दिल्ली सल्तनत का सूर्य भी अस्त हो गया।

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