हरियाणा का आधुनिक इतिहास एक नजर में

(Modern History of Haryana at a Glance)

1794 ई. में महादजी सिंधिया की मत्य के उपरांत उनके उत्तराधिकारी दौलतराव सिंधिया बने। बादशाह शाहआलम मराठों की कठपुतली थे| द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध में मराठों की पराजय के बाद 14 सितंबर 1803 को अंग्रेजों ने दिल्ली साम्राज्य का संचालन दौलतराव सिंधिया से छीन लिया। इस युद्ध में बल्लभगढ़ नरेश हीरा सिंह, रेवाड़ी के शासक राव तेजसिंह मराठों के साथ मिलकर लड़े थे। अब बादशाह शाह आलम इंडिया कंपनी के रहमोकरम पर आ गए थे।

30 दिसंबर, 1803 को दौलतराव सिंधिया और जनरल लेक के बीच सर्जीअंजन गाँव की संधि हई। इस संधि के अनुसार मराठों को हरियाणा और दिल्ली के आसपास का क्षेत्र अंग्रेजों को सौंपना पड़ा। इस नई व्यवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस क्षेत्र को प्रशासनिक सहूलियत हेतु दो भागों में बाँट दिया। एक भाग को ‘असाइंड टैरिटरी’ के नाम से सीधे अपने प्रशासनिक नियंत्रण में रख दिया। यह क्षेत्र यमुना नदी के दाएँ काठे (तट) के साथ-साथ दिल्ली से 60 किमी. उत्तर और 60 किमी. दक्षिण में संकरे से गलियारे के रूप में था।

उत्तर में पानीपत, समालखा, गन्नौर तथा पालम के परगने थे तथा दक्षिण में नूह, नगीना, हथीन, फिरोजपुर-झिरका, सोहना, टपकडा, भोडा तथा रेवाडी के परगने थे। इस क्षेत्र का प्रशासन सीधे गवर्नर-जनरल के हाथों में था जो ‘रेजिडेंट’ नाम के प्रशासनिक अधिकारी के माध्यम से अपनी शक्तियों का प्रयोग करते थे।

शेष क्षेत्र इन्होंने अपने विश्वासपात्र सामंत-सरदारों को जागीरों के रूप में बाँट दिया। फर्रूखनगर के नवाब तथा बल्लभगढ़ नरेश हीरासिंह को उनकी रियासतें वापिस मिल गईं। फैज तलब खाँ को पटौदी तथा अहमदबख्श खाँ को लोहारू और फिरोजपुर-झिरका का क्षेत्र जागीर के रूप में मिल गया। कुंजपुरा के नवाब, शामगढ़ के सरदार, थानेसर, लाडवा तथा जीन्द के राजाओं को उनकी जागीरें लौटा दी गई। रेवाड़ी नरेश राव तजासह का रेवाड़ी के 87 गाँव इस्तेमरारी जागीर के रूप में दिए गए।

होडल का परगना मुर्तजा खाँ तथा पलवल का परगना मुहम्मदअली खा अफरादा का मिल गया। सबसे मुश्किल परीक्षा का सामना गलाम कादिर रोहेला के भाई बम्ब खां को करना पड़ा। उसे रोहतक, महम, बेरी, हिसार, हासी, अग्रोहा, तोशाम, बरवाला तथा जमालपुर के परगने दिए गए। इस कुख्यात रोहेला सरदार का जनता ने प्रचण्ड विरोध किया। इस विधि के कारण शीघ्र ही उसे यह क्षेत्र छोड़ना पडा। तत्पश्चात ये परगने अलवर के राजा के वकील अहमदबख्श को दिए गए परन्त, जनविरोध के बाद उसे भी पीछे हटना पड़ा। अहमदबख्श, के उपरान्त एक अन्य मुस्लिम सरदार अब्दुल समद खाँ को इन परगनों का प्रशासक बनाया गया। परन्तु, वह भी इस क्षेत्र में व्यवस्था कायम करने में असफल रहा।

अंत में अंग्रेजों ने विवश होकर नवाब महम्मद अली खाँ को यह क्षेत्र सौंप दिया। इस बंदरबांट में सरधना की बेगम समरू के हिस्से में भी करनाल और गुड़गाँव के कुछ गाँव आए।

यद्याप, अग्रेजों ने हरियाणा का प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था परन्तु, उन्हें व्यवस्था कायम करने में लगभग एक दशक का समय लग गया। हरियाणा की स्वराज-प्रिय जनता ने अंग्रेजों का हर क्षेत्र में विरोध किया। उत्तरी हरियाणा में लाडवा के शासक गुरुदत्तसिंह तथा थानेसर नरेश भंगासिंह ने सिख शासकों का एक संघ बनाकर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया। इन सिख शासकों के साथ जनता का समर्थन भी था। ब्रिटिश कमाण्डर कर्नल बर्न तथा सिखों के बीच जमकर संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में बूड़िया का शासक शेरसिंह मारा गया। जीतने के बाद अंग्रेजों ने अधीनता स्वीकार करने की शर्त पर सिख सरदारों की आम माफी दे दी।

20 अप्रैल, 1805 को लाडवा के शासक गुरुदत्तसिंह और कर्नल बर्न के बीच करनाल में भयंकर संघर्ष हुआ। इस युद्ध में गुरुदत्तसिंह की हार हुई। अंग्रेजों ने उसे माफी देकर उसे अपने साथ मिला लिया। इस प्रकार सिखों के संघर्ष का अंत हो गया। दक्षिणी हरियाणा में भी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह भड़कता रहा। जनता ने कर देना बंद कर दिया तथा अंग्रेजी सेना पर गुरिल्ला हमले करते रहे।

मेवात के क्षेत्र पर नियंत्रण करने में अंग्रेजों को लगभग 7 वर्ष लग गए। उत्तरी हरियाणा के सिखों की तरह पश्चिम में सिरसा तथा फतेहाबाद के भट्टी शासकों (मुस्लिम राजपूत)-फतेहाबाद के शासक बहादुर खां तथा सिरसा के शासक जाबिता खां ने अंग्रेजों की अधीनता मानने से इंकार कर दिया। अंग्रेजों ने मिर्जा इलाही बेग नामक एक सैन्य सरदार के नेतृत्व में हांसी में एक सैन्य छावनी बना दी। परन्तु, भट्टियों के साथ संघर्ष में वह मारा गया। तत्पश्चात् विद्रोहियों को काबू करने के लिए सेना का एक बड़ा जत्था लेकर कर्नल ब्राउनिंग को भेजा गया। परन्तु, सिरसा के निकट भट्टियों के साथ संघर्ष में वह भी मारा गया।

भट्टियों पर नियंत्रण करने में सफलता दिसंबर 1809 में कर्नल एडम्स को ही मिल पाई। कर्नल एडम्स की सेनाओं के साथ भयंकर संघर्ष के उपरान्त 3 दिसंबर, 1809 को पहले फतेहाबाद के शासक खान बहादुर खां ने आत्मसमर्पण कर दिया तथा उसके बाद 21 दिसंबर, 1803 को सिरसा के शासक जाबिता खां ने समर्पण कर दिया। अंग्रेजों ने जाबिता खां को माफी देकर उसकी जागीर (सिरसा तथा रानिया) लौटा दी परन्तु, बहादुर खां से फतेहाबाद की रियासत छीनकर उसे 1000 रु प्रतिमाह की पेंशन पर भेज दिया।

मध्य क्षेत्र में रोहतक, झज्जर, सोनीपत, भिवानी तथा हिसार का पूर्वी क्षेत्र सम्मिलित था। यहाँ की जनता ने विद्रोह करके सर्वप्रथम बंब खां. उसके पश्चात अहमदबख्श खां और अब्दुससमद खां नामक सैन्य सरदारों को भगा दिया। भिवानी में हुए संघर्ष में अब्दुससमद खां का पुत्र तथा बोहर में उसका दामाद मारा गया। तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड मिंटो के आदेश पर कर्नल बाल और दिल्ली के रेजीडेंट के सहायक गार्डनर के नेतत्व में अंग्रेजी सेना ने मार्च 1809 में बेरी, डीघल, काहनौर, निगाना में तबाही मचा दी।

4 मई, 1809 को सेना ने 2000 विद्रोहियों के साथ संघर्ष में बलियाली (भिवानी) गाँव में भयंकर नरसंहार किया। तत्पश्चात् अगस्त, 1809 में सेना ने भिवानी में सख्ती दिखाई। विद्रोही जनता बहादुरी से लड़ी परन्तु, सशस्त्र अंग्रेजी फौज से नहीं जीत पाई। भिवानी में सैंकड़ों लोग वीरगति को प्राप्त हुए।

19वीं सदी के कुछ प्रमुख विद्रोह एवं बगावत

छछरौली (जगाधरी) का विद्रोह

छछरौली कस्बा वर्तमान यमुनानगर जिले में है। 19वीं सदी के प्रथम दशक में इस रियासत पर करोडसिंधिया मिसल के राजा बुंगेलसिंह का शासन था। 1809 ई. में बुंगेलसिंह की नि:संतान मृत्यु के उपरान्त इस रियासत पर कलसिया रियासत के शासक और करोड़सिंधिया मिसल के सबसे बड़े सरदार जोधसिंह ने कब्जा कर लिया। बुंगेलसिंह की विधवा रानी रामकौर ने इसका विरोध किया और अंग्रेजों से सहायता याचना की। जोधसिंह अंग्रेजों की आँखों में खटकता था। इसलिए दिल्ली के अंग्रेज रेजिडेंट डेविड ऑक्टर लोनी के आदेश पर अंग्रेजी सेनाओं ने छछरौली पर आक्रमण कर दिया। जोधसिंह को छछरौली छोडनी पडी।

अंग्रेजों ने छछरौली का शासन रानी रामकौर को सौंप दिया परन्तु, रानी रामकौर एक अयोग्य शासक सिद्ध हुई। 1818 ई. में छछरौली की जनता के सहयोग से जोधसिंह ने छछरौली पर अधिकार कर लिया। अंग्रेज रेजीडेंट ने ब्रिगेडियर-जनरल आर्नोल्ट के नेतृत्व में सेना छछरौली भेजी। जोधसिंह छछरौली की जनता के साथ मिलकर बहादुरी से लड़े, परन्तु हार गए। अंग्रेजों ने छछरौली रियासत को जोधसिंह से छीनकर अपने राज्य में विलय कर लिया।

रानिया की बगावत

दिसंबर 1809 में अंग्रेजी सेनाओं द्वारा जाबिता खाँ को हराए जाने के बाद उसने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली। अंग्रेजों ने उसे सिरसा तथा रानियाँ की रियासत लौटा दी। कुछ दिन उसने अंग्रेजों की आज्ञा का पालन किया परन्तु, शीघ्र ही जाबिता खां ने अंग्रेजों को आँखें दिखा दीं। 1818 ई. में अंग्रेज रेजिडेंट ने भट्टी शासक जाबिता खां के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई करवा दी। भट्टी बहादुरी से लड़े परन्तु, अंग्रेजों की अनुशासित और सशक्त सेना के सामने टिक नहीं पाए। अंग्रेजों ने सिरसा रियासत को हड़प लिया।

कैथल का विद्रोह

कैथल रियासत की स्थापना 1763 ई. में भाई गुरुबख्शसिंह ने की थी। 1823 ई. में भाई उदयसिंह गद्दी पर बैठे। 1843 ई. को उनकी मृत्य हो गई। मृत्यु के समय महाराज उदय सिंह निःसंतान थे। फुलकियां मिसल के अन्य राजाओं की सहायता से अर्नोली रियासत के शासक गुलाबसिंह ने कैथल पर अपना हक जताया। परन्तु, अंग्रेज कैथल को हड़पना चाहते थे।

उदयसिंह की माँ साहिब कौर तथा रानी सूरजकौर रियासत का अस्तित्व बचाकर रखना चाहती थी। 23 मार्च, 1843 को अंग्रेजों ने रियासत का प्रशासन ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपने के आदेश दे दिए। 10 अप्रैल, 1843 को अंग्रेज अधिकारी क्लार्क के आदेश पर अंग्रेजी सेना ने कैथल को घेर लिया। छः दिन संघर्ष चला। जनता ने विधवा रानी साहिब कौर और सूरजकौर का खुलकर साथ दिया। परन्तु, 16 अप्रैल, 1843 को पटियाला, जीन्द और नाभा के शासकों की मदद से अंग्रेजों ने कैथल नगर और किले पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् अंग्रेजों ने कैथल का विलय कर लिया।

लाडवा का विद्रोह

लाडवा रियासत की नींव 1763 ई. में सरदारसिंह द्वारा डाली गई थी। 19वीं सदी के प्रथम दशक में लाडवा रियासत के तत्कालीन शासक गुरुदत्तसिंह ने लगातार अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। उनके उत्तराधिकारी राजा अजीतसिंह भी गुरुदत्तसिंह की ही तरह स्वतंत्र प्रकृति के व्यक्ति थे। यही कारण था कि राजा अजीतसिंह को अंग्रेज अपने रास्ते का रोड़ा मानते थे। 1845 ई. में अंग्रेजों ने राजा अजीतसिंह पर अव्यवस्था का आरोप लगाकर अजीत सिंह को सहारनपुर में नजरबन्द कर दिया परन्तु, वह यहाँ से भी भाग निकला।

अंग्रेजों से बचकर अजीतसिंह सतलुज पार करके लुधियाना पहुँच गया और प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध में सिख सेनाओं के साथ मिल गया। जनवरी 1846 ई. में उसने पहले लुधियाना छावनी को जलाकर नष्ट कर दिया तथा उसके बाद बदोवल में हेनरी स्मिथ की सेनाओं को समर्पण के लिए मजबूर कर दिया। अजीत सिंह आजीवन अंग्रेजों से लड़ता रहा। आंग्ल-सिख युद्ध के उपरान्त भी वह अंग्रेजों से संघर्ष करता रहा और अंत में वीरगति को प्राप्त हुआ। लाडवा रियासत को अंग्रेजों ने हड़पकर अपने राज्य में विलय कर लिया।

 

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