भारत की भौगोलिक पृष्ठभूमि

किसी भी देश के इतिहास का अध्ययन उसके भौगोलिक अध्ययन के बिना अधूरा है। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैला भारतीय महाद्वीप हिन्दुओं में भारतवर्ष के नाम से ज्ञात है जिसे ‘भारत की भूमि’ या ‘भारत का देश’ भी कहा जाता है। देश का यह नामकरण (भारत) ऋग्वैदिक काल के प्रमुख जन ‘भरत’ के नाम पर किया गया। आर्यों का निवास स्थल होने के कारण इसका नामकरण आर्यावर्त के रूप में हुआ। कुछ लोग इसे ‘जम्बू द्वीप’ का एक भाग मानते हैं। बौद्ध ग्रंथों में जम्व द्वीप उस भू-भाग को कहा गया है, जहाँ पर ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में महान मौर्य वंश का शासन था। यूनानियों ने भारतवर्ष के लिए ‘इण्डिया’ शब्द का प्रयोग किया जबकि मध्यकालीन लेखकों ने इस देश को ‘हिन्द’ अथवा ‘हिन्दस्तान’ नाम से सम्बोधित किया। ध्यातव्य है कि ‘हिन्दू’ शब्द की उत्पत्ति महान सिन्धु नदी से हुई है।

पुरातन साहित्य में भारत का भौगोलिक विभाजन 5 भागों में किया गया है। ये हैं:-

  • उत्तर (उदीच्य)
  • मध्य (मज्झिम देश)
  • पूर्व (प्राच्य–सिकन्दर कालीन इतिहासकारों ने पूर्व को ‘प्रासी’ कहा)
  • पश्चिम (अपरान्त या प्रतीच्य)
  • दक्षिण (दक्षिणापथ)।

भारत को स्पष्ट रूप से मुख्यतः 4 भागों में विभाजित किया जा सकता है:

उत्तर के पर्वतीय प्रदेश

उत्तर के पर्वतीय प्रदेश, जो तराई के जंगलों से प्रारम्भ होकर हिमालय के शिखर तक फैले हुए हैं। इस भाग में वर्तमान कश्मीर, शिवालिक, टेहरी, कांगड़ाकुमायूँ, नेपाल, सिक्किम एवं भूटान स्थित हैं। इस भाग को पुराणों में ‘पर्वताश्रयिन्’ नाम मे सम्बोधित किया गया है। यह पर्वतीय प्रदेश लगभग 1500 मील लम्बा एवं 160 मे 200 मील तक चौड़ा है।

उत्तर का मैदान

उत्तर का मैदान, जो अपनी उपजाऊ भूमि एवं अधिक पैदावार के लिए प्रसिद्ध है। इस मैदानी भाग की सिंचाई सिन्धु, गंगा एवं उनकी सहायक नदियों द्वारा होती है। गजपूताने का रेगिस्तान भी इसी भाग में सम्मिलित है।

मध्य भारत एवं दक्षिण के पठारी भाग

मध्य भारत एवं दक्षिण के पठारी भाग में वहने वाली नदियाँ नर्मदा एवं ताप्ती पूर्व से पश्चिम की ओर वहती हैं, शेष नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर वहती हैं। इस भाग में स्थित विन्ध्याचल पर्वतमालायें जो पूर्व से पश्चिम की ओर फैली हुई हैं, भारत को दो भागों, उत्तर एवं दक्षिण में विभाजित करती हैं। इस भाग में वहने वाली नदियाँ प्रायः शुष्क मौसम में सूख जाती है ।

दक्षिण के लम्वे एवं संकरे समद्री मैदानी भाग

दक्षिण के लम्वे एवं संकरे समद्री मैदानी भाग में कोंकण एवं मालावार तट के मम्पन्न वन्दरगाह स्थित है। इसी भाग में कृष्णा, कावेरी एवं गोदावरी के अत्यधिक उपजाऊ डेल्टा भी सम्मिलित है। दक्षिण का यह समुद्री मैदान करीव 1,000 मील लम्वा है।

भारत के इतिहास पर भूगोल का प्रभाव

भारतवर्ष के भूगोल का इसके इतिहास पर प्रभाव प्रत्येक स्थल एवं घटनाओं में अंकित है। उत्तर में स्थित हिमालय पर्वत महान प्रहरी के रूप में भारत की रक्षा विदेशी आक्रमणों से करता रहता है। हिमालय के समान अभेद्य सीमा, प्रकृति ने किसी और देश को प्रदान नहीं किया है। कालिदास ने हिमालय के विषय में कहा है कि-‘पर्वतों का राजा हिमालय अध्यात्मवाद को धारण किये हुए दो समुद्रों के बीच ऐसे खड़ा है जैसे कि पृथ्वी को नापने वाला इण्डा हो ।

हिमालय के उत्तर-पश्चिम में स्थित मुलेमान एवं हिन्दुकुश जैसे कम ऊंचे पर्वतों में कई ऐसे दर्रे हैं जिनसे होकर ग्रीक, शक, कुषाण, हूण, अरवी, तुर्क, मंगोल, अफगान एवं मुगल भारत पर आक्रमण किये। इस भाग के मुख्य पे खैवर, कुर्रम, बोलन, टोची, गोमल आदि हैं।

हिमालय के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित पहाड़ी दर्रे को पार करना अत्यन्त कठिन है। इन दुर्गम पहाड़ी दर्रे को पार कर वर्मा पर अधिकार करने का प्रयास कभी किसी भारतीय शासक ने नहीं किया। दूसरे विश्व युद्ध में, भारतीय सेनाओं ने इन दर्रों को पार करने का प्रयास किया, परिणामस्वरूप काफी लोग मार्ग में ही काल कलवित हो गये। सिन्धु एवं गंगा के मैदान चूँकि बहुत ही उपजाऊ एवं समृद्धिशाली थे इसलिए इसी भाग में बड़े- बड़े साम्राज्यों की स्थापना हुई। भारत के इसी प्रदेश से अनेक राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं दार्शनिक विचार उद्भूत हुए। यहीं पर बौद्ध एवं जैन धर्मों का विकास हुआ और यहीं पर सारनाथ, तक्षशिला, नालंदा जैसे महान शिक्षा के केन्द्रों की स्थापना हुई। इस भू-भाग में बहने वाली नदियाँ चूंकि संचार के सरल साधन के रूप में उपलब्ध थी इस कारण पाटलिपुत्र, वाराणसी, प्रयाग, आगरा. दिल्ली. मुल्तान एवं लाहौर जैसे बड़े नगरों की स्थापना इस प्रदेश में हुई। सतलुज एवं यमुना नदियों के मध्य का क्षेत्र जो शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी से करुक्षेत्र एवं राजपताना तक फैला हुआ है, पर कब्जा करने के लिए महाभारत एवं पानीपत की महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ लड़ी गयीं।

उत्तर भारत की राजनीतिक उथल-पुथल का दक्षिण भारत पर जरा-सा भी प्रभाव नहीं पड़ा। जिस समय उत्तर भारत में आर्य लोग निवास कर रहे थे. उस समय दक्षिण द्रविड़ संस्कृति के प्रचार-प्रसार का केन्द्र बना हुआ था। ऐसा माना जाता है कि दक्षिण में आर्य संस्कृति अगस्त्य ऋषि द्वारा लायी गयी। जब भी भारतीय संस्कृति को विदेशी आक्रान्ताओं ने अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने का प्रयास किया, ऐसे कठिन क्षणों में दक्षिण ने अपने दामन में इस संस्कृति को छिपा कर इसकी रक्षा की। जिस समय बौद्ध मत उत्तर भारत में अपने चरमोत्कर्ष पर था उस समय दक्षिण ने हिन्दू मत को पनाह देकर उसकी रक्षा की। कालान्तर में जैन मतावलम्बियों को भी दक्षिण में ही शरण मिली। दक्षिण भारत के समुद्री तटों पर स्थित बन्दरगाहों से भारत का विदेशी व्यापार फला-फूला।

विविधता में एकता

विशाल क्षेत्रफल वाला देश भारत, रूस के विना यूरोप महाद्वीप जैसा है। यहाँ की जनसंख्या के विषय में ई0 पू0 पाँचवीं सदी में इतिहास के जनक हेरोडोटस ने कहा है कि–’हमारे ज्ञात राष्ट्रों में सबसे अधिक जनसंख्या भारत की ही है।’ विशाल जन समूह वाले इस देश में विभिन्न जातियों एवं धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं। इनके द्वारा लगभग 220 भाषायें बोली जाती हैं। ‘भारतवर्ष’ एवं ‘भारत सन्तति’ में भारतवर्ष की मूलभूत एकता दृष्टिगोचर होती है।

महाकाव्यों एवं पुराणों में भी इन शब्दों का उल्लेख मिलता है-

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।

(विष्णु पुराण)

वह देश जो समुद्र के उत्तर तथा हिमालय पर्वत के दक्षिण में स्थित है भारत वर्ष कहा जाता है, जहाँ की सन्तान भारती कहलाती है।

धर्मशास्त्रियों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों एवं कवियों के मन में भारतवर्ष के प्रति एकता की एक ऐसी भावना घर किये हुए थी।
कौटिल्यीय ‘अर्थशास्त्र’ ने हिमालय से लेकर समुद्र तक फैली हुई सहस्रों योजन – भूमि को एक ही चक्रवर्ती सम्राट के राज्य के योग्य वताया है।’ एक चक्रवर्ती सम्राट से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह अपने राज्य को उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में सेतुवन्ध रामेश्वर तथा पूर्व में ब्रह्मपुत्र की तराई से लेकर पश्चिम में सात मुखों वाली सिन्धु नदी की भूमि तक फैलायें । ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी तक सारे भारतीय उपमहाद्वीप में एकमात्र भाषा प्राकृत का प्रयोग किया जाता था पर कालांतर में यह सम्मान संस्कृत भाषा को प्राप्त हुआ।

रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों को देश के हर कोने में सम्मान मिला हुआ था। जाति प्रथा, ब्राह्मण, गायों एवं वेदों को पूरे देश में सम्मान प्राप्त था। पूरे भारत में करीव-करीव एक ही तरह के त्यौहार एवं उत्सव मनाये जाते थे। एक ही ईश्वर की पूजा विभिन्न नामों से देश के कोने-कोने में की जाती थी। तीर्थ स्थल उत्तर में हो या फिर दक्षिण में, सभी दर्शनार्थी इनकी यात्रा पर जाया करते थे। इस प्रकार तमाम विसंगतियों के बाद भी भारत की एकता अक्षुण्ण रही।

काल की दृष्टि से भारतीय इतिहास को तीन भागों में बांटा जा सकता है। ये भाग हैं-

  • प्राचीन भारत 
  • मध्यकालीन भारत 
  • आधुनिक भारत

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