समाज निर्माण में लैंगिक मुद्दे

Gender Issues in Social Construct

लैंगिक भेदभाव की प्रवृत्ति भारत में प्राचीन काल से ही रही है, जो काफी सुधार के बाद भी आधुनिक समय में अपना अस्तित्व बनाए हुए है। पितृप्रधान समाज होने के कारण पुरुषवादी मानसिकता आज भी व्याप्त है, जो महिलाओं के पक्ष में उचित नहीं है। लिंग सम्बन्धी विषमता को दर करने के लिए पूर्वधारणा एवं रूढिबद्ध धारणा जैसे विचारों का परित्याग, केन्द्र एवं राज्य सरकार की अग्रोन्मुखी भूमिका तथा जनजागरूकता इत्यादि की आवश्यकता है। इस प्रकार के भेदभाव को दूर करने में परिवार, समाज, विद्यालय तथा आधुनिक सोच महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

लैंगिक मुद्दे(Gender issues)

लैंगिक असमानता का आधार स्त्री और पुरुष की जैविक बनावट नहीं, बल्कि इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और स्वीकृत सामाजिक मान्यताएँ हैं।

लड़के और लड़कियों के पालन-पोषण के क्रम में यह मान्यता उनके मन में बैठा दी जाती है कि महिलाओं की मुख्य जिम्मेदारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है। यह तथ्य अधिकतर परिवारों के श्रम के लैंगिक विभाजन से झलकता है।

महिलाएँ घरेलू कार्य करती हैं; जैसे-खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना आदि, जबकि पुरुष घर के बाहर का काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि पुरुष ये सारे काम नहीं कर सकते। दरअसल वे सोचते हैं कि ऐसे कामों को करना महिलाओं की जिम्मेदारी है।

फेमिनिस्ट विद्वानों के अनुसार, “लिंग को स्त्री-पुरुष विभेद के सामाजिक संगठन अथवा स्त्री-पुरुष के मध्य असमान सम्बन्धों की व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

पेपनेक के अनुसार, “लिंग स्त्री तथा पुरुष से सम्बन्धित है, जो स्त्री-पुरुष की भूमिकाओं को सांस्कृतिक आधार पर परिभाषित करने का प्रयास करता है एवं स्त्री-पुरुष के विशेषाधिकारों से सम्बन्धित है। सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक आधार पर लिंग सामान्यतया शक्ति सम्बन्धों का कार्य तथा असमानता का सामाजिक संगठन है।” प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक गैरीजन का कथन है कि “शरीर सम्बन्धी दृष्टिकोण व्यक्ति के विभिन्न अंगों के विकास में सामंजस्य और परस्पर सम्बन्ध पर बल देता है।”

सामाजिक लिंग की अवधारणा(Concept of social gender)

  • भारत में पितृसत्तात्मक समाज प्रचलित होने के कारण महिलाओं के साथ प्रत्येक क्षेत्र में असमानतापूर्ण व्यवहार किया जाता है। प्रायः सभी कार्य-क्षेत्रों में, जैसे-पारिश्रमिक के क्षेत्र में,अध्ययन के क्षेत्र में एवं पारिस्थितिकी आदि के क्षेत्र में उनको निम्न स्थान ही प्राप्त है।
  • आधुनिक युग में लिंग सम्बन्धी विभिन्न अध्ययनों द्वारा समाज में व्याप्त असमानता को कम अथवा समाप्त करने का एक साहसिक प्रयास किया जा रहा है, ताकि एक सन्तुलित समाज की स्थापना की जा सके तथा देश के सभी नागरिक स्वतन्त्र रूप से देश के विकास में अपनी भूमिका निभा सकें।

समाज रचना में लिंग की भूमिका(Role of Gender in Society)

अनेक शोध अध्ययनों ने यह सिद्ध कर दिया है कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों के बीच सामान्य योग्यता उपलब्धि तथा अभिक्षमता सम्बन्धी भेद पाए जाते हैं।

  • मूढ़ या निर्बुद्धि कहे जाने वाले बच्चों का जन्म सभी प्रकार के सामाजिक-आर्थिक स्तर के परिवारों में हुआ है, परन्तु इनकी संख्या आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न परिवारों में बहुत कम है। आर्थिक स्तर का मापन करते समय इनका सहसम्बन्ध बौद्धिक सम्पन्नता से भी जोड़ा जा सकता है।
  • कुछ अध्ययनों से पता चला है कि जब व्यवसायों का सम्बन्ध सम्मानजनक पदों से जोड़ा जाता है, तो इनके कोटि क्रम में भिन्नता पाई जाती है। • यद्यपि इस प्रकार के अध्ययन सामाजिक स्तर पर बौद्धिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं, परन्तु शिशुओं के वर्ग के सन्दर्भ में यह कथन सिद्ध नहीं होता है।
  • दूसरी विचारधारा के विचारकों की धारणा है कि बच्चों को अल्पावस्था से ही बौद्धिक विकास के अवसर प्रदान किए जाएँ।

लिंग के आधार पर श्रम का विभाजन(Division of labor on the basis of gender)

  • यह काम के बँटवारे का वह तरीका है, जिसमें घर के अन्दर के सारे काम परिवार की महिलायें करती हैं या अपनी देख-रेख में घरेलू नौकरों/नौकरानियों से कराती हैं।
  • पहले महिलाओं को सार्वजनिक जीवन के बहुत-से अधिकार प्राप्त नहीं थे। दुनिया के अलग-अलग भागों में महिलाओं ने अपने संगठन बनाए और बराबरी के अधिकार हासिल करने के लिए आन्दोलन किए। विभिन्न देशों में महिलाओं को मतदान का अधिकार प्रदान करने के लिए आन्दोलन हुए। इन आन्दोलनों में महिलाओं के राजनीतिक और वैधानिक दर्जे को ऊँचा उठाने और उनके लिए शिक्षा तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने की माँग की गई।
  • हमारे देश में आजादी के बाद से महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है पर वे अभी भी पुरुषों से काफी पीछे हैं। हमारा समाज अभी भी पितृ-प्रधान है।
  • महिलाओं के साथ अभी भी कई तरह के भेदभाव होते हैं, उनका शोषण होता है। महिलाओं में साक्षरता की दर अब भी मात्र 65% है, जबकि पुरुषों में 82% । इसी प्रकार स्कूल पास करने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या ही उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ा पाती है।

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