विद्यालय में लैंगिक भेदभाव

Gender discrimination in school

  • विद्यालय में भी लैंगिक भेदभाव दिखाई पड़ता है, जोकि शिक्षकों के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण को दर्शाता है। इस प्रकार का पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण संविधान के मानवीय एवं नैतिक दृष्टिकोण से भी पूर्णत: गलत है। विद्यालय में लैंगिक भेदभाव न हो इसके लिए यह आवश्यक है कि शिक्षकों को लिंग-पक्षपातपूर्ण व्यवहारों का अधिसंज्ञान हो अर्थात् उन्हें लिंग-भेद से सम्बन्धित विभिन्न पूर्वाग्रहों एवं रूढिबद्धता का ज्ञान हो, तभी वे इस प्रकार के व्यवहार को हतोत्साहित कर सकते हैं।
  • शिक्षकों को रूढिबद्ध धारणाओं से बचना चाहिए एवं लड़कों व लड़कियों से समान व्यवहार करना चाहिए।
  • शिक्षकों को लैगिक पूर्वाग्रह एवं रूढिबद्धता से ऊपर उठकर सभी छात्र एवं छात्राओं को पढ़ाई, खेल-कूद, विद्यालय समारोह आदि में समान अवसर उपलब्ध कराना चाहिए।
  • समाज से लैंगिक पूर्वाग्रह एवं रूढिबद्धता को समाप्त  करने के लिए शिक्षकों का यह दायित्व है कि वह उदाहरण देकर छात्र-छात्राओं को यह समझाएँ कि लड़कियाँ भी घर के बाहर का कार्य करती हैं, जैसे कि आजकल लड़कियाँ सेना, खेल-कूद, जैसे क्षेत्रों में भी अच्छे प्रदर्शन कर रही हैं। इसी प्रकार घरेलू कार्य में लड़कों को भी सहयोग करना चाहिए। इस प्रकार के विचारों के प्रसार में शुरुआत में थोड़ी कठिनाई अवश्य हो सकती है, किन्तु इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
  • समाज से लैंगिक पूर्वाग्रह एवं रूढिबद्धता को समाप्त करने के लिए विद्यालय परिसर में लगे बुलेटिन-बोर्डों में पुरुषों को घर का काम करते हुए एवं बच्चों की देखभाल करते हुए चित्र तथा स्त्रियों को घर के बाहर के काम जैसे- मोटरसाइकिल एवं ट्रेन चलाते हुए तथा ऑफिस के कार्य सँभालते हुए चित्र दर्शाना चाहिए।
  • कई बार यह भी देखने को मिलता है कि लड़कियों को जीवविज्ञान या गृहविज्ञान (Home science) के क्षेत्र में करियर बनाने की सलाह दी जाती है, भले ही उसकी रुचि भौतिकशास्त्र एवं गणित में क्यों न हो। इस प्रकार का निर्देशन एवं परामर्श पूर्णत: गलत है। कल्पना चावला एवं सुनीता विलियम्स ने इस बात का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है कि गणित, भौतिकशास्त्र एवं अभियान्त्रिकी में लड़कियाँ भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
  • अध्यापकों को एक ऐसा वातावरण स्थापित करना चाहिए, जिससे कि कला में दोनों वर्गों को समान रखा जाए।

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