भारत में हरियाणा के त्योहार(Festivals of Haryana in India)

भारतवर्ष में अनादि काल से त्योहारों तथा उत्सवों की निरन्तर परंपरा रही है। हरियाणा की सतरंगी संस्कृति म ता त्याहार का शव स्थान है। हरियाणा में तो कहावत भी है-खाइए त्योहार अर चलिये व्योहार। ऐसी मान्यता है कि व्रत, पर्व और त्योहार एक हा हा कल उपासका को संख्या तथा साधना में भेद के कारण इनके स्वरूप में अन्तर आ जाता है। उत्सव शब्द की व्यत्पत्ति ‘उत्’ उपसर्ग तथा ‘सु’ धातु से मानी जाती है। जिसका भाव है-उफान मारता प्रवाह जो आनंद का अतिरेक है। ‘पर्व’ का शाब्दिक अर्थ है-संधि स्थान जस गाठ इत्याद, ह का अवसर, किसी विशेष धार्मिक अनष्ठान का समय। ‘पर्व’ एक प्रकार से जोडने का पर्याय हैं। हमारे उत्सव-त्योहार, बिना किसा भदभाव के समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़े रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस सन्दर्भ में डॉ. पूर्णचन्द शर्मा लिखते हैं-“शास्त्रानुबंधी पक्ष ‘पर्व’ कहलाते हैं तथा लोकानुबंधी अनरंजनात्मक कर्म जो शास्त्र विधि के प्रतिकल न जाएँ ‘उत्सव’ कहलाते हैं।” पर्व के बिना उत्सव नारस ह तथा उत्सव के बिना पर्व निरर्थक। यही कारण है कि दोनों को मिलाकर शास्त्रों में ‘पर्वोत्सव’ की संज्ञा दी गई है। हरियाणा में मनाए जाने वाले कुछ प्रमुख त्योहारों तथा उत्सवों का संक्षिप्त विवरण यहां दिया गया है। ये उत्सव प्रदेश की सतरंगी संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते है।

भारत का त्योहार तीज(Teej festival of India)

तीज का त्योहार श्रावण मास की शुक्ला तृतीया को मनाया जाता है। इस त्योहार पर हरियाणा, पंजाब तथा राजस्थान में विशेष धम होती है। तीज का असली नाम ‘मधश्रवा तीज’ है। जिसका भाव है-‘शहद का टपकना’। इस दिन को स्वर्ण गौरी व्रत’ की संज्ञा भी प्राप्त है। इस दिन महिलाएँ हाथों में मेहन्दी लगाती हैं तथा श्रृंगार करके गीत गाती हुई झूला झूलती हैं। घरों में गुड़ के मीठे पकवान बनाए जाते हैं तथा शाम को गाँवों में कश्ती प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। कुछ दशक पूर्व तक तीज के अवसर पर रागणियों तथा सांग का आयोजन भी किया जाता था।

भारत का त्योहार मातृ-देवी पूजन(Festival of India Mother-Goddess Worship)

हरियाणा प्रदेश में सभी पर्व तथा त्योहार विक्रमी संवत् के आधार पर मनाए जाते हैं। चैत्र मास के प्रथम पक्ष में मातृ-पूजन तथा दूसरे पक्ष के आरंभ में देवी-पूजन शुरू हो जाता है। मातृ-पूजन का इतिहास सदियों पुराना है। इसके विषय में अनेकों दंत कथाएँ मिलती हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष से ही मातृ-पूजा आरंभ हो जाती हैं कहीं-कहीं ‘सीली सात्तम’ (शीतला सप्तमी) से इसका आरंभ होता है। यह कार्यक्रम लगभग पूरे महीने चलता है क्योंकि कई माताओं जैसे-रंढाणी-मंढाणी, शीतला, पहाड़न आदि की पूजा होती है। मीठे चावल, दलिया, पूड़े आदि से माता के पूजन के लिए महिलाएँ गीत-गाती हुई जाती हैं। इसके पश्चात् सात बहनों की पूजा का विधान होता है। नवरात्रों में देवी पूजा का विधान है। लोग व्रत रखते हैं। बेरी, बास, बनभौरी के प्रख्यात देवी मन्दिरों में सप्तमी-अष्टमी को श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है।

भारत का त्योहार शिवरात्रि(Shivaratri, festival of India)

शिवरात्रि का पर्व भगवान शिव को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि शिवरात्रि को भगवान शिव ने अपने परम् ज्योतिर्मय रूप को प्रकट करके ब्रह्म और विष्णु के अहं का दमन किया था। दूसरी मान्यता है कि फाल्गुन मास के कष्ण पक्ष की चतर्दशी को शिव-पार्वती विवाह-बंधन में बंधे थे। इस दिन शिवभक्त व्रत रखते हैं तथा शिवालय में जलाभिषेक करते हैं। कावड़िये हरिद्वार से कावड़ लाकर शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं।

भारत का त्योहार रक्षाबंधन(Rakshabandhan, the festival of India )

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में बूढ़ी तीज तथा रक्षाबंधन के उत्सव मनाए जाते हैं। रक्षा बंधन को ‘सलमण’ भी कहते हैं। यह त्योहार भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है। श्रावण मास की पूर्णिमा को ‘श्रावणी’ भी कहते हैं। इस दिन बालकों को गुरुकुल भेजने की परंपरा थी। रक्षा बंधन के दिन पुरोहित अपने यजमान के हाथ में रक्षा-सूत्र बाँधते थे। इस दिन बहनें अपने भाइयों को राखी बाँधती हैं तथा भाई अपनी बहनों की रक्षा का प्रण लेते हैं। श्रावणी का उपकर्म और बहनों की राखी इसके दो पक्ष हैं। रक्षाबंधन के तीन दिन पश्चात् बूढ़ी तीज का त्योहार मनाया जाता है।

भारत का त्योहार श्रीकष्ण जन्माष्टमी(Festival of India shrikash Janmashtami)

जन्माष्टमी का पर्व पूरे देश में भादों मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इस पर्व में व्रत एवं उत्सव का समन्वय मिलता है। दिन भर मन्दिरों में भजन-कीर्तन का कार्यक्रम होता है। प्राचीनकाल में इस दिन रात्रि में सांग का आयोजन होता था। आजकल मन्दिरों के प्रांगण में कृष्णलीला का मंचन किया जाता है। इस दिन महिलाएँ तथा परुष व्रत रखते हैं।

भारत का त्योहार गुग्गा नवमी(Festival of India Gugga Navami)

गुग्गा (गोगा) पीर के पूजा स्थल को हरियाणा में ‘गूग्गा की मैड़ी’ कहा जाता है। गूग्गा नवमी के दिन प्रदेश में अनक स्थानों पर मेले लगते हैं। गोगा पीर के भक्त उनके चार रूपों को मानते हैं-‘गुग्गा पीर’ (मसलमान भक्त ‘ गणा’ (हिन्दू भक्त), ‘जाहिर पीर’ तथा ‘बागड़ वाला पीर’। राजस्थान और हरियाणा के अनेक भागों में गोगा जी को ‘सांपों का देवता’ माना जाता है। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार, “मध्यकाल में जो लोग अपने प्राणों की बाजी लगाकर गऊओं की रक्षा करते थे, उन्हें ‘गोगा’ कहा जाता थ। गौ-रक्षक होने के कारण ही कालान्तर में वे गोगा से गुग्गा कहलाए।” जन्माष्टमी की संध्या को घरों में स्त्रियाँ ‘बासड़ा’ (चने की दाल मिली मीठी तथा नमकीन पूरियाँ) बनाती हैं। गृह-स्वामिनी बासड़ का कुछ भाग पीर के नाम पर ‘मनस’ देती हैं। शाम को गूग्गा की मैड़ी पर मेला लगता है। गुग्गा के भक्त मोर पंखों से सजी छड़ा लेकर पूजा के लिए अन्न तथा धान एकत्रित करते हैं। भादों मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को ‘गो का श्राद्ध’ संपन्न किया जाता है। इस रात ‘जागरणोत्सव’ मनाया जाता है। डेरू वाले गुग्गा की प्रशंसा के गीत गाते हैं तथा गग्गा के भक्त उन्मादी नत्य करते हैं।

 

भारत का त्योहार दशहरा((Dussehra festival of India)

दशहरा का त्योहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। इस त्योहार को अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। दशहरा को कई नामों से संबोधित किया जाता है जैसे ‘दुशहरा’-दुष्टों को हराकर मनाया जाने वाला त्योहार, ‘दशहरा’-आशापूर्ति का दिन, ‘दशहरा’-दस सिरों वाले को हराकर मनाया जाने वाला पर्व आदि। मान्यता के अनुसार इस दिन सन्ध्याकाल को जब तारे थोड़े-थोड़े दिखने लगते हैं, उस काल को ‘विजया’ कहा जाता है। इस समय जिस कार्य को शुरू किया जाता है उसमें सफलता निश्चित होती है। आश्विन मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को ‘जौ’ बोए जाते हैं। इस दिन तक आते-आते ये ‘जौ’ हरे-भरे हो जाते हैं। दशहरे से दस दिन पहले महिलाएँ घरों की दीवार पर ‘सांझी’ डालती हैं। ‘सांझी’ के सभी संस्कारों के उपरान्त दशहरे के दिन सांयकाल को तालाब में सांझी को प्रस्थित किया जाता है। दशहरे के दिन गोबर के दस उपले थाप कर, घर में उगाए गए जौ उनमें टांक कर ‘दशहरा’ पूजन होता है।

भारत का त्योहार कार्तिक स्नान(Festival of india karthik bath)

कार्तिक मास में सूर्योदय से पूर्व प्रतिदिन स्नान का विशेष महत्त्व है। कन्याएँ और महिलाएँ प्रतिदिन तालाब तथा कुएँ पर गीत गाती हुई जाती हैं तथा स्नान करती हैं। प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में ‘पथवारी पूजन’ का भी विधान है।

भारत का त्योहार करवा चौथ(Festival of India Karva Chauth)

विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु तथा मंगल कामना हेतु करवा चौथ का उपवास रखती हैं। रात को ‘चन्द्र दर्शन’ के उपरान्त व्रत खोलने का उपक्रम होता है। करवा-चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि को रखा जाता है।

भारत का त्योहार अहोई(Festival of India Ahoi)

अहोई अष्टमी, अहोई आ3-जैसे नामों से प्रसिद्ध यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दीपावली से सात दिन पूर्व मनाया जाता है। बाल कल्याण की भावना से प्रेरित इस पर्व के अवसर पर महिलाएँ दिनभर उपवास रखती हैं। पूजन के उपरान्त, तारों को अर्घ्य देकर महिलाएँ अपना व्रत खोलती हैं। यह पर्व अहोई माता के विकराल रूप का प्रतीक है। इस अवसर पर पूजन किसी मूर्ति का ना होकर दीवार पर बने ‘अहोई’ के भित्ति-चित्र का होता है। दोपहर को महिलाएँ घर की बुजुर्ग महिलाओं से अहोई से संबंधित कहानियां सुनती हैं तथा उन्हें वस्त्र आदि भेंट देती है।

भारत का त्योहार दीवाली/दीपावली(Festival of India Diwali / Deepawali)

दीपावली एक महान् ज्योति पर्व है। इस त्योहार को केवल भारत ही नहीं पूरी दुनिया में बसे हिन्दू पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। इस दिन धन-वैभव के देवता कुबेर तथा माता लक्ष्मी की पूजा का विधान है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान रामचन्द्र अपना 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर अयोध्या वापिस लौटे थे। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि कार्तिक मास में भगवान विष्णु के सम्मुख दीप प्रजलन से तीनों लोगों के पाप नष्ट हो जाते हैं। दीपावली का संबंध अनेक पौराणिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं से बताया जाता है। दीपावली का त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन बाजारों में बड़ी धूम रहती है। लोग अपने मित्रों तथा सगे-संबंधियों को मिठाई, वस्त्र तथा अन्य वस्तुएँ भेंट देकर अपने हृदय के उल्लास को प्रकट करते हैं। रात्रि को घरों, चौपालों, दुकानों तथा सभी सार्वजनिक स्थलों पर दिए जलाकर यह प्रकाश-पर्व मनाया जाता है। शाम को गाँवों में युवक ‘हीड़ो’ में बिनौले तथा तेल डालकर गलियों में प्रकाश करते हैं। लड़कियाँ भी ‘तूमड़ी’ में दीपक जलाकर प्रकाश पर्व मनाती हैं। दीवाली से एक दिन पूर्व ‘छोटी दीवाली’ मनाई जाती है। हरियाणा में इसे “गिरड़ी’ भी कहा जाता है। इस दिन ‘यमदीवा’ या ‘मोरी दीवा’ का भी आयोजन होता है। दीवाली से अगले दिन, कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ‘गोवर्धन पूजा की जाती है। महिलाएँ गोबर से गोवर्धन की मानवाकार प्रतिमा बनाती हैं। इसके ऊपर वनस्पति के प्रतीक के रूप में घास के तिनके तथा रुई के फाये रखे जाते हैं। घी का दीपक जलाकर, खील-बताशे आदि से गोवर्धन पूजा की जाती है।

भारत का त्योहार देवोत्थान एकादशी(India’s festival Devotthan Ekadashi)

यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। ‘देवोठान’ शब्द ‘देवोत्थान’ का ही अपभ्रंश रूप है। वैसे तो एक वर्ष में चौबीस एकादशियां आती हैं, परन्तु इनमें से तीन का विशेष महत्त्व होता है। आषाढ़ शुदि एकादशी को ‘देवशयनी एकादशी’ भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन हेतु चले जाते हैं। सभी देवता भी उनका अनुसरण करते हैं। कार्तिक मास की ‘देवोत्थान एकादशी’ या ‘देवउठनी ग्यारस’ देव जागरण की बोधक है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन देव पुनः जागृत हो जाते हैं। ‘देवशयनी एकादशी’ तथा ‘देवोत्थान एकादशी’ के मध्य के काल में विवाह तथा अन्य मांगलिक कार्यों का निषेध होता है। देवोत्थान एकादशी के दिन थापे के निकट, किसी परात या तसले के नीचे देव-मूत्तियों के रूप में लकीरें खींचकर गेहूँ, धान, गुड, गन्ना आदि रख दिए जाते हैं। देव जागरण का कार्य घर की कन्याओं द्वारा गीत गाकर किया जाता है तथा परात के नीचे रखी गई सामग्री भी उन्हीं की होती है।

भारत का त्योहार मकर संक्रान्ति(Festival of India, Makar Sankranti)

हरियाणा में ‘मकर संक्रान्ति’ के पर्व का विशेष महत्त्व है। माघ मास की प्रथम तिथि को मकर-संक्रान्ति का पर्व मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान सूर्यदेव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन सूर्य मकर रेखा के ऊपर होता है तथा इसके उपरान्त सूर्य की उत्तर की ओर यात्रा आरंभ होती है। सूर्य के उत्तरायण को पुराणों में बहुत ही पावन बताया गया है। हरियाणवी भाषा में इसे ‘संक्रान्त’ या ‘संकरांत’ भी कहा जाता है। इस पर्व के अवसर पर तीर्थ-स्नान का विशेष महत्त्व है। श्रद्धालु कुरुक्षेत्र, पेहोवा, पाण्डु-पिंडारा आदि तीर्थ स्थलों पर स्नान करके पुण्य प्राप्त करते हैं। गृहणियाँ प्रात:काल घर के द्वार पर अग्नि प्रज्वलित करती हैं जो ऊर्जा का प्रतीक है। अग्नि में तिल यज्ञ का भी विधान है। संक्रान्ति के अवसर पर दान कार्य का भी विशेष महत्त्व है। संक्रांति

के अवसर पर लोग अन्न, तिल, वस्त्र आदि का दान करते हैं। इस पर्व के अवसर पर नववधू अपनी ससुराल पक्ष के सगे-संबंधियों को उपहार भेंट करती हैं जिसे ‘तेवर’ कहा जाता है। संक्रान्ति से एक दिन पूर्व लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है। लोहड़ी के अवसर पर लोग अग्नि जलाकर नृत्य करते हैं तथा गीत गाते हैं। इस दिन मूंगफलियाँ और रेवड़ी बांटने का भी प्रचलन है।

भारत का त्योहार बसन्त पंचमी(Festival of India Basant Panchami)

चैत्र तथा वैशाख बसन्त के महीने हैं। बसंत पंचमी का पर्व माघशुदि पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन कामदेव का जन्मोत्सव मनाया जाता है। बसन्त ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है। इस पर्व पर चारों ओर खेतों में सरसों के पीले फूल खिल जाते हैं। परंपरागत रूप से पुरुष पीली पगड़ियाँ पहनते हैं तथा महिलाएँ पीली चुनरी या पीली साड़ी पहनती हैं। कुछ दशक पूर्व तक इस अवसर पर पिन्नीयाँ बनाने और बांटने का प्रचलन था जो अब लुप्तप्राय है। बसंत पंचमी के दिन हरियाणा सहित पूरे उत्तर भारत में पतंग-प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।

भारत का त्योहार होली तथा फाग(India’s festival of Holi and Phag)

फाल्गुन की मस्ती का अन्त होलिका दहन तथा उसके अगले दिन फाग या दुलहण्डी से होता है। रंगों का यह त्योहार हरियाणा सहित पूरे विश्व में मनाया जाता है। होलिका दहन के साथ प्रहलाद भक्त और हिरण्यकश्यपु की पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। होलिका दहन से लगभग 40 दिन पूर्व बसंत पंचमी के दिन हरियाणा के कई भागों में ‘होली का डण्डा’ स्थापित करने की परंपरा है। इसके आस-पास प्रतिदिन लोग लकड़ियाँ तथा झाड़ियाँ इकट्ठी करते रहते हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा तक आते-आते इस दहन-सामग्री का एक ढेर बन जाता है। इस ढेर के बीच में स्थापित डंडा प्रहलाद का प्रतीक है। होलिका दहन के दिन दोपहर बाद महिलाएँ बच्चों सहित होलिका पूजन के लिए जाती हैं। कन्याएँ “ढाल-बुड़कलों’ को सूत की रस्सी से पिरो लेती हैं। यह माला ‘जेली’ कहलाती है। महिलाएँ तथा कन्याएँ नए वस्त्र पहनकर कच्चा सूत तथा पूजा सामग्री लेकर पूजा स्थल पर जाती हैं। ईंधन के ढेर पर सूत लपेटकर ‘जेली’ भेंट करती हैं तथा सात बार ढेर की परिक्रमा करती हैं। प्रहलाद् का डण्डा निकाल लिया जाता है तथा होलिका दहन किया जाता है। ‘होलिका दहन’ को हरियाणा में ‘होली मंगालना’ भी कहा जाता है। होलिका दहन से अगले दिन फाग (दुलहैंडी) का त्योहार मनाया जाता है। फाग रंगों का त्योहार है तथा होली के हुड़दंग का ही एक भाग है। सभी लोग पूरा दिन पूरे उत्साह के साथ फाग खेलते हैं तथा एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। भाभियाँ अपने देवर को कोड़े मारती हैं तथा देवर अपना बचाव करते हैं। इस दिन पुरुष धमाल नृत्य का आयोजन करते हैं तथा कई जगह स्वांग का आयोजन भी किया जाता है।

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