प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी चौधरी मातूराम

प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी चौ. मातूराम का जन्म 1865 ई. में वर्तमान रोहतक जिले के सांघी गाँव में चौ. बख्तावर सिंह के घर हुआ था। इनका परिवार एक प्रतिष्ठित परिवार था। पिता चौ. बख्तावर सिंह की मृत्यु के उपरात उन्हें पढ़ाई छोड़कर परिवार की जिम्मेदारी संभालनी पडी। इनकी चार संतानें हुईं जिनमें से चौ. रणबीर सिंह हुड्डा देश को सविधान सभा के सदस्य रहे हैं। दिसंबर, 1891 मे सरकार ने चौ. मातूराम जी को नंबरदार तथा 6 नवंबर, 1894 को सांघी जेल का जेलदार नियुक्त कर दिया। चौधरी मातृराम एक कट्टर आर्यसमाजी व्यक्ति थे। स्वामी दयानंद ने स्वयं अपने हाथों से उन्हें यज्ञोपवीत धारण करवाया था। ये खुद को ज्यादा समय तक स्वतंत्रता आन्दोलन से दूर नहीं रख पाए। स्वतंत्रता आंदोलन में चौ. मातूराम की सक्रिय भागीदारी से नाराज होकर 4 मई, 1907 को ब्रिटिश सरकार ने इनसे जेलदार का पद छीन लिया। इसके पश्चात् तो चौधरी साहब और भी सक्रिय होकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए।

1914 में तत्कालीन ले. गवर्नर इबटसन ने इन्हें ‘काला पानी’ भेजने के लिए सिफारिश की। परन्तु, जनता के दबाव में सरकार यह कदम नहीं उठा पाई। उन्होंने हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों से जनता को स्वतंत्रता आन्दोलन से जोड़ने के लिए अथाह परिश्रम किया। 1905-07 ई. में लाला लाजपतराय के सहयोग से सरदार अजीत सिंह ने जुझारू किसान आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन में चौ. मातूराम जी भी उनके साथ थे। चौ. मातूराम रोहतक कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। 16 फरवरी, 1921 को असहयोग आन्दोलन के दौरान चौ. मातूराम की अध्यक्षता में रोहतक में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया। इस सभा को संबोधित करने स्वयं गाँधी जी रोहतक आए थे। वह एक आदर्शवादी व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने नवंबर, 1923 में विधान परिषद् चुनाव लड़ा। परन्तु प्रतिपक्ष द्वारा अनैतिक साधनों के प्रयोग के कारण मातूराम जी यह चुनाव 554 वोटों से हार गए। उन्होंने लाला लाजपतराय की सहायता से इस चुनाव को न्यायालय में चुनौती दी। न्यायालय ने उनकी शिकायत को सही मानते हुए उपरोक्त चुनाव रद्द कर दिया।

चौधरी मातूराम रोहतक के क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार के लिए बेहद संजीदा थे। 1913 ई. में इनके अथक प्रयासों से रोहतक में ‘आर्य वैदिक संस्कृत हाईस्कूल’ की स्थापना हुई। चौ. मातूराम इस स्कूल के संस्थापक प्रधान बने। इसी वर्ष इस स्कूल का नाम बदलकर ‘जाट हीरोज मैमोरियल एंग्लो संस्कृत हाई स्कूल’ कर दिया गया। शिक्षा के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान के लिए रोहतक के तत्कालीन उपायुक्त किलवर्ट ने 18 दिसंबर, 1914 को इन्हें प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया था। 3 सितंबर, 1926 को ‘जाट हीरोज मेमोरियल स्कूल’ तथा ‘जाट एंग्लो-संस्कृत हाई स्कूल’ का विलय हो गया। इस प्रकार इन दोनों स्कूलों को मिलाकर ‘जाट हीरोज मेमोरियल एंग्लो-संस्कृत हाई स्कूल’ के नाम से एक नई शिक्षण संस्था अस्तित्व में आई। चौ. मातूराम इस संस्था के उपप्रधान बने।

1923 ई. में आर्य समाज के शिखर पुरुष स्वामी श्रद्धानंद जी ने अछूतोद्धार तथा दलितोत्थान कार्यक्रम चलाया। चौधरी साहब ने सामाजिक जागृति के अग्रदूत बनकर इस अभियान में बढ़-चढ़कर योगदान दिया। जुलाई 1942 तक इन्होंने गाँधी जी द्वारा आहूत सभी स्वतंत्रता आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। परन्तु, 14 जुलाई, 1942 को यह महात्मा इस संसार को छोड़कर विदा हो गए।

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