बाल विकास को प्रभिवात करने वाले कारक

बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को विद्वानों ने दो भागों में विभाजित किया है, जो निम्न प्रकार हैं

  • आन्तरिक कारक
  • बाह्य कारक

आन्तरिक कारक (Internal factor)

बाल विकास को आन्तरिक कारक बहुत हद तक प्रभावित करते हैं, जो कि उसके विकास के लिए महत्त्वपूर्ण आधार निर्मित करते हैं।

आन्तरिक कारक निम्न प्रकार से हैं

  • वंशानुगत कारक (Hereditary factor)
  • शारीरिक कारक (Physical factors)
  • बुद्धि (wisdom)
  • संवेगात्मक कारक (Emotional factor)
  • सामाजिक प्रकृति (Social nature)

वंशानुगत कारक (Hereditary factor)

बालक के रंग-रूप, आकार, शारीरिक गठन, ऊँचाई इत्यादि के निर्धारण में उसके आनुवंशिक गुणों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। बालक के आनुवंशिक गुण उसकी वृद्धि एवं विकास को भी प्रभावित करते हैं।

शारीरिक कारक (Physical factors)

जो बालक जन्म से ही दुबले-पतले, कमजोर, बीमार तथा किसी प्रकार की शारीरिक समस्या से पीड़ित रहते हैं, उनकी तुलना में सामान्य एवं स्वस्थ बच्चे का विकास अधिक होना स्वाभाविक ही है। शारीरिक कमियों का स्वास्थ्य पर ही नहीं अपितु वृद्धि एवं विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

बुद्धि (wisdom)

बुद्धि को अधिगम (सीखने) की योग्यता, समायोजन योग्यता (Adjustability), निर्णय लेने की क्षमता (Decision making ability) इत्यादि के रूप में परिभाषित किया जाता है। जिस प्रकार बालक के सीखने की गति अधिक होती है, उसका मानसिक विकास (Mental Development) भी तीव्र गति से होगा। बालक अपने परिवार, समाज एवं विद्यालय में अपने आपको किस तरह समायोजित (Adjustment) करता है, यह उसकी बुद्धि पर निर्भर करता है।

संवेगात्मक कारक (Emotional factor)

बालक में जिस प्रकार के संवेगों/भावों (Emotions) का जिस रूप में विकास होगा वह उसके सामाजिक, मानसिक, नैतिक, शारीरिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

सामाजिक प्रकृति (Social nature)

बच्चा जितना अधिक सामाजिक रूप से सन्तुलित होगा, उसका प्रभाव उसके शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, भौतिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास पर भी उतना ही अनुकूल पड़ेगा। सामाजिक दृष्टि से कुशल बालक अपने वातावरण से दूसरों की अपेक्षा अधिक सीखता है।

बाह्य कारक (External Factors)

बालक के विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने में उपरोक्त आन्तरिक कारकों के साथ ही निम्नलिखित बाह्य कारकों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है

  • गर्भावस्था के दौरान माता का स्वास्थ्य एवं परिवेश (Mother’s health and environment during pregnancy)
  • जीवन की घटनाएँ (Life events)
  • भौतिक वातावरण (Physical Environment)
  • सामाजिक-आर्थिक स्थिति (Socioeconomic Status)

गर्भावस्था के दौरान माता का स्वास्थ्य एवं परिवेश (Mother’s health and environment during pregnancy)

गर्भावस्था में माता को अच्छा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने की सलाह इसलिए दी जाती है कि उससे न केवल गर्भ के अन्दर बालक के विकास पर असर पड़ता है, बल्कि आगे के विकास की बुनियाद भी मजबूत होती है।

जीवन की घटनाएँ (Life events)

जीवन की घटनाओं का भी बालक के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। यदि बालक के साथ अच्छा व्यवहार हुआ है, तो उसके विकास की गति सही होगी अन्यथा उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। जिस बच्चे को उसकी माता ने बचपन में ही छोड़ दिया हो, वह माँ के प्यार से वंचित हो जाएगा। ऐसी स्थिति में उसका सर्वांगीण विकास प्रभावित होता है।

भौतिक वातावरण (Physical Environment)

बालक का जन्म किस परिवेश में हुआ, वह किस परिवेश में किन लोगों के साथ रह रहा है? इन सबका प्रभाव उसके विकास पर पड़ता है। परिवेश की कमियों, प्रदूषणों, भौतिक सुविधाओं का अभाव इत्यादि कारणों से भी बालक का विकास प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है।

सामाजिक-आर्थिक स्थिति (Socioeconomic Status)

बालक की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का प्रभाव भी उसके विकास पर पड़ता है। निर्धन परिवार के बच्चे को विकास के अधिक अवसर उपलब्ध नहीं होते। अच्छे विद्यालय में पढ़ने, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने इत्यादि का अवसर आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को नहीं मिलता, इसके कारण उनका विकास सन्तुलित नहीं होता। शहर के अमीर बच्चों को गाँवों के गरीब बच्चों की तुलना में बेहतर सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण मिलता है, जिसके कारण उनका मानसिक एवं सामाजिक विकास स्वाभाविक रूप से अधिक होता है।

 

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