आनुवंशिकता का प्रभाव

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने आनुवंशिकता के परिप्रेक्ष्य में अनेक परीक्षण एवं अध्ययन किए। इसके आधार पर इन्होंने सिद्ध किया की बालकों के व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू पर वंशानुक्रम का प्रभाव पड़ता है।

बालकों पर पड़ने वाले आनुवंशिकता के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रभावों का वर्णन निम्न प्रकार से किया जा रहा है

आनुवंशिकता का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव(Effect on physical symptoms)

शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव निम्न हैं

  • बालक के रंग-रूप, आकार, शारीरिक गठन, ऊँचाई इत्यादि के निर्धारण में उसके आनुवंशिक गुणों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।
  • अधिकांश जुड़वाँ भाई द्वि-युग्मक होते हैं, जो दो पृथक् युग्मजों (zygote) से विकसित होते हैं। यह भाइयों जैसे जुड़वाँ भाई और बहनों की तरह मिलते-जुलते होते हैं, परन्तु वे अनेक प्रकार से परस्पर एक-दूसरे से भिन्न भी होते हैं।
  • बालक के आनुवंशिक गुण उसकी वृद्धि एवं विकास को भी प्रभावित करते हैं।
  • शारीरिक लक्षणों के वाहक जीन प्रखर अथवा प्रतिगामी दोनों प्रकार के हो सकते हैं। यह एक ज्ञात सत्य है कि किन्हीं विशेष रंगों के लिए पुरुष और महिला में रंगों को पहचानने की अन्धता (कलर ब्लाइण्डनेस) अथवा किन्हीं विशिष्ट रंगों की संवेदना नारी में नर से अधिक हो सकती है।
  • एक दादी और माँ, स्वयं रंग-अन्धता से ग्रस्त हुए बिना किसी नर शिशु को यह स्थिति हस्तानान्तरित कर सकती हैं। ऐसी स्थिति इसलिए है, क्योंकि यह विकृति प्रखर होती है, परन्तु महिलाओं में यही प्रतिगामी (recessive) होती है।
  • जीन्स जोड़ों (pairs) में होते हैं। यदि किसी जोड़े में दोनों जीन प्रखर होंगे तो, उस व्यक्ति में वह विशिष्ट लक्षण दिखाई देगा (जैसे रंगों को पहचानने की अन्धता), यदि एक जीन प्रखर हो और दूसरा प्रतिगामी, तो जो प्रखर होगा वही अस्तित्व में रहेगा।
  • प्रतिगामी जीन आगे सम्प्रेषित हो जाएगा और यह अगली किसी पीढ़ी में अपने लक्षण प्रदर्शित कर सकता है। अत: किसी व्यक्ति में किसी विशिष्ट लक्षण के दिखाई देने के लिए प्रखर जीन ही जिम्मेदार होता है।
  • जो अभिलक्षण दिखाई देते हैं और प्रदर्शित होते हैं; जैसे आँखों का रंग, उन्हें समलक्षणी (phenotypic) कहते हैं।
  • प्रतिगामी जीन अपने लक्षण प्रदर्शित नहीं करते, जब तक कि वे अपने समान अन्य जीन के साथ जोड़े नहीं बना लेते, जो अभिलक्षण आनुवंशिक रूप से प्रतिगामी जीनों के रूप में आगे संचारित (transfer) हो जाते हैं, परन्तु वे प्रदर्शित नहीं होते, उन्हें समजीनोटाइप (genotype) कहते हैं।
  • मानव शरीर में क्रोमोजोम्स (Chromosome) की निश्चित संख्या होती है। इनकी संख्या प्रत्येक कोशिका के अन्दर 46 या 23 जोड़ी होती है। 23 क्रोमोजोम्स माँ में तथा 23 क्रोमोजोम्स पिता में पाए जाते हैं।

आनुवंशिकता का बुद्धि पर प्रभाव(Effect on intelligence)

. बुद्धि को अधिगम (Learning) की योग्यता, समायोजन योग्यता, निर्णय लेने की क्षमता इत्यादि के रूप में परिभाषित किया जाता है। जिस बालक के सीखने की गति अधिक होती है, उसका मानसिक विकास भी तीव्र गति से होगा। बालक अपने परिवार, समाज एवं विद्यालय में अपने आपको किस तरह समायोजित करता है यह उसकी बुद्धि पर निर्भर करता है।

  • गोडार्ड का मत है कि मन्दबुद्धि माता-पिता की सन्तान मन्दबुद्धि और तीव्रबुद्धि माता-पिता की सन्तान तीव्रबुद्धि वाली होती है।
  • मानसिक क्षमता के अनुकूल ही बालक में संवेगात्मक क्षमता का विकास होता है।
  • बालक में जिस प्रकार के संवेगों का जिस रूप में विकास होगा वह उसके सामाजिक, मानसिक, नैतिक, शारीरिक तथा भाषा सम्बन्धी विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
  • संवेगात्मक रूप से असन्तुलित बालक पढ़ाई में या किसी अन्य गम्भीर कार्यों में ध्यान नहीं दे पाते, फलस्वरूप उनका मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।

आनुवंशिकता का चरित्र पर प्रभाव(Impact on character)

  • डगडेल नामक मनोवैज्ञानिक ने अपने अनुसन्धान के आधार पर यह बताया कि माता-पिता के चरित्र का प्रभाव भी उसके बच्चे पर पड़ता है।
  • व्यक्ति के चरित्र में उसके वंशानुगत कारकों का प्रभाव स्पष्ट तौर पर देखा जाता है, इसलिए बच्चे पर उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। डगडेल ने 1877 ई. में ज्यूक नामक व्यक्ति के वंशजों का अध्ययन करके यह बात सिद्ध की।

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