अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों की शिक्षा

Education of Scheduled Castes and Tribes children

  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति दोनों ही ऐसे समुदाय हैं, जिन्हें ऐतिहासिक कारणों से औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर रखा गया। पहले को जाति के आधार पर विभाजित समाज में सबसे निचले पायदान पर होने के कारण एवं दूसरे को उनके भौगोलिक अलगाव, सांस्कृतिक अन्तरों तथा मुख्यधारा कहे जाने वाले प्रबल समुदाय ने अपने हित के लिए हाशिए पर रखा।
  • अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों की शिक्षा के खराब स्तर के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

विद्यालयों में अनुसूचित जनजाति के बालकों की कम संख्या

अध्यापकों में उनके शिक्षण के प्रति उदासीन रवैया

 पाठ्यपुस्तकों में उनकी स्थानीय बातों व उदाहरणों का न होना

 बौद्धिक क्षेत्र में उनका पिछड़ा होना

निर्धनता

इन वर्गों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार का अभाव

  • भारत की स्वतन्त्रता के बाद शिक्षा एवं अन्य अधिकारों से वंचित समुदायों के उद्धार के लिए भारतीय संविधान में विशेष प्रावधान किए गए ताकि इनका समुचित विकास हो सके।
  • भारतीय संविधान की धाराओं 15(4), 45 और 46 में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के बच्चों के लिए शिक्षा मुहैया कराने हेतु राज्यों की प्रतिबद्धता की बात कही गई है।

अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के लिए सुझाव

  • निर्धन वर्ग के परिवारों को अपने 6 से 14 वर्ष के बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहन देना।
  • जिला स्तर पर अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए छात्रावास की सुविधाएँ उपलब्ध करवाना।
  • स्कूल भवन एवं प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र इत्यादि का स्थान चयन करते समय एस. सी. एवं एस. टी. का विशेष ध्यान रखना। आदिवासी इलाकों में प्राथमिक विद्यालय खोलने को प्राथमिकता दी जाए।
  • आदिवासियों (ST) की अपनी सांस्कृतिक एवं सामाजिक विशेषता होती है, इनमें भाषा भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। पाठ्यक्रम निर्माण में तथा शिक्षण विधि में इनका ध्यान रखना चाहिए। व्यापक पैमाने पर आदिवासी क्षेत्रों में आवासीय विद्यालय खोले।
  • उच्च शिक्षा में दी जाने वाली छात्रवृत्तियों में तकनीकी एवं व्यावसायिक पढ़ाई को महत्त्व देना चाहिए।
  • आँगनबाड़ियाँ, प्रौढशिक्षा केन्द्र तथा अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र इत्यादि आदिवासी बहुल इलाकों में खोले जाएँ, जिससे उनका शैक्षिक विकास होगा।
  • विभिन्न सरकारी योजनाओं के सन्दर्भ में उन्हें जागरूक करना; जैसे-मिड-डे मील, सर्वशिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2011 इत्यादि
  • शैक्षणिक आरक्षण के माध्यम से इन्हें विकास की मुख्य धारा में लाया जाए, जिससे सामाजिक विषमता में कमी आएगी।

निर्धन एवं पिछड़े वर्ग के बच्चे एवं उनकी शिक्षा (Children of poor and backward classes and their education)

  • निर्धनता का तात्पर्य उस स्थिति से है, जिसमें व्यक्ति अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता है। रोटी, कपड़ा एवं मकान के साथ-साथ शिक्षा भी मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। निर्धन परिवार अपना पेट ही ठीक से नहीं भर पाता, तो अपने बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था कहाँ से करेगा? निर्धनता का कुप्रभाव इस वर्ग के बच्चों पर पड़ता है।
  • शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किए जाने के बाद से बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जा रही है, किन्तु निर्धनता के कारण अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय काम पर भेज देते हैं, जिससे उनके विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है।
  • पिछड़े, वंचित एवं अनुसूचित जाति व जनजाति के बच्चों की सामान्य पहचान यह है कि पारिवारिक निर्धनता एवं पिछड़ेपन के कारण सामान्यत: वे अभावजन्य जीवन व्यतीत करने को बाध्य होते हैं।
  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 सभी बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा पर जोर देता है। समाज के पिछड़े एवं निर्धन वर्ग की आवश्यकताओं को देखते हुए ही मध्याह्न भोजन स्कीम को लागू किया गया है ताकि भूख को शिक्षा से दूर रहने का बहाना न बनाया जाए एवं अभिभावक भी बच्चे को काम पर भेजने के बदले स्कूल में भेजें। • पिछड़े वर्ग के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए राज्य सरकारों द्वारा कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

 जिनमें से कुछ प्रमुख कार्यक्रम निम्न प्रकार हैं

 विद्यालयी शिक्षा की सभी अवस्थाओं के लिए मुफ्त किताबें एवं सामग्री

आश्रम, विद्यालयों और सरकारी अनुमोदन प्राप्त छात्रावासों के बच्चों को मुफ्त पोशाकें

सभी स्तरों पर नि:शुल्क शिक्षा

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